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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 56
ऋषिः - कण्वो घौरः
देवता - ब्रह्मणस्पतिः
छन्दः - बृहती
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
36
प्रै꣢तु꣣ ब्र꣡ह्म꣢ण꣣स्प꣢तिः꣣ प्र꣢ दे꣣꣬व्ये꣢꣯तु सू꣣नृ꣡ता꣢ । अ꣡च्छा꣢ वी꣣रं꣡ न꣢꣯र्यं प꣣ङ्क्ति꣡रा꣢धसं दे꣣वा꣢ य꣣ज्ञं꣡ न꣢यन्तु नः ॥५६॥
स्वर सहित पद पाठप्र꣢ । ए꣣तु । ब्रह्म꣢꣯णः प꣡तिः꣢꣯ । प्र । दे꣣वी꣢ । ए꣣तु । सूनृ꣡ता꣢ । सु꣣ । नृ꣡ता꣢꣯ । अ꣡च्छ꣢꣯ । वी꣣र꣢म् । न꣡र्य꣢꣯म् । प꣣ङ्क्ति꣡रा꣢धसम् । प꣣ङ्क्ति꣢म् । रा꣣धसम् । देवाः꣢ । य꣣ज्ञ꣢म् । न꣣यन्तु । नः ॥५६॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता । अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥५६॥
स्वर रहित पद पाठ
प्र । एतु । ब्रह्मणः पतिः । प्र । देवी । एतु । सूनृता । सु । नृता । अच्छ । वीरम् । नर्यम् । पङ्क्तिराधसम् । पङ्क्तिम् । राधसम् । देवाः । यज्ञम् । नयन्तु । नः ॥५६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 56
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 2
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 2
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6;
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भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
अगले मन्त्र का देवता ब्रह्मणस्पति है। हमें क्या-क्या प्राप्त हो, यह कहते हैं।
पदार्थ
(ब्रह्मणस्पतिः) वेद, ब्रह्माण्ड तथा सकल ऐश्वर्य का स्वामी जगदीश्वर (प्र एतु) हमें प्राप्त हो। (देवी) दिव्यगुणयुक्त (सूनृता) प्यारी सच्ची वाणी (प्र एतु) हमें प्राप्त हो। (देवाः) विद्वान् और विदुषियाँ (नः) हमारे (यज्ञम्) राष्ट्ररूप यज्ञ के (अच्छ) प्रति (नर्यम्) नरहितकारी, (पङ्क्तिराधसम्) धर्मात्मा वीर मनुष्यों की पंक्तियों के सेवक और पंक्तियों के हितार्थ अपने धन को लगानेवाले, (वीरम्) शरीर और आत्मा के पूर्ण बल से युक्त सन्तान को (नयन्तु) प्राप्त करायें ॥२॥
भावार्थ
वेद, ब्रह्माण्ड और सकल ऐश्वर्य का स्वामी जगदीश्वर, मधुर-प्रिय-सत्य वाणी और नरहितकर्ता, धर्मात्माओं का सेवक, सत्कार्यों में धन का दान करनेवाला पुत्र यदि प्राप्त हो जाता है तो निश्चय ही सभी सिद्धियाँ हाथ में आ जाती हैं ॥२॥
पदार्थ
(ब्रह्मणस्पतिः प्रैतु) वेदज्ञान एवं ब्रह्माण्ड का स्वामी परमात्मा मुझे अध्यात्म यज्ञ में प्रेरित करे—आगे बढ़ावे (सूनृता देवी प्र-एतु ‘प्रैतु’) दिव्या मन्त्रस्तुति भी मुझे अध्यात्म यज्ञ में प्रेरित करे (देवाः) मेरे प्राण “प्राणा वै देवाः” [श॰ ८.२.२.८] (नः) हमारे (वीरं नर्यम्) प्रगति देने वाले मानवहितकर (पंक्तिराधसम्) पाँच वाक् श्रोत्र नेत्र मन आत्मा के समर्पण द्वारा सिद्ध हुए (यज्ञम्) अध्यात्म यज्ञ को (अच्छ नयन्तु) व्याप्तरूप में निर्बाध आगे आगे जीवन में चलावें बढ़ावें।
भावार्थ
अध्यात्मयज्ञ मानव का कल्याणसाधक है जिसे चलाने वाले प्राण हैं। ये बलिष्ठ होने चाहिएँ निर्बलप्राणों वाला मनुष्य स्वास्थ्यरूप भौतिक अमृत को नहीं पा सकता तब आध्यात्मिक अमृत का आस्वादन तो दूर ही रहेगा। अध्यात्मयज्ञ में मानव का सर्वाङ्गसमर्पण आवश्यक है, वाणी, कान, आँख, मन और आत्मा इन पाँचों को हुत हो जाना—लग जाना चाहिये। वाणी से स्तवन कीर्तन करना, श्रोत्र से गुणश्रवण करना, आँख से संसार में उसकी कला परखना, मन से मनन, और आत्मा से उसका भावन-अनुभव करना। साथ में विश्वात्मा ज्ञानदाता की दया उसमें पूर्ण श्रद्धा अपितु उसकी मन्त्रगत स्तुति भी प्रमुख साधन है॥२॥
विशेष
ऋषिः—कण्वः (मेधावी वक्ता प्रगतिशील उपासक)॥ देवता—ब्रह्मणस्पतिः (वेद एवं ब्रह्माण्ड का स्वामी परमात्मा)॥<br>
विषय
यज्ञ के विस्तार के लिए आवश्यक तीन बातें
पदार्थ
मानव-जीवन एक यज्ञ है। इस जीवन को यज्ञमय बनाना ही दोनों लोकों को सुखी बनाने का साधन है। 'हमारा जीवन यज्ञमय बना रहे' इसके लिए तीन बातें आवश्यक हैं१.
(ब्रह्मणस्पतिः) = ज्ञान का पति सर्वज्ञ प्रभु प्(र एतु) = हमें प्रकर्षेण प्राप्त हो । प्रातः - सायं तो हम उसका चिन्तन करें ही, दिन-रात में भी सभी क्रियाओं को करते हुए हम उसे स्मरण करें। प्रभु के स्मरण से हम भोग-विलास में न फँसेंगे और हमारा जीवन यज्ञमय बना रहेगा।
२. (सूनृता )= [सु ऊन् ऋत] उत्तम, दु:खों का परिहाण करनेवाला सत्यवाणीरूप देवी - दिव्य गुण प्र एतु हमें प्रकर्षेण प्राप्त हो। सत्य के साथ सभी उत्तम गुण हमारे जीवन का अङ्ग बनते हैं और हमारा जीवन यज्ञमय बना रहता है।
३. (देवा:) = सब प्राकृतिक शक्तियाँ व सब विद्वान् हमारे इस (यज्ञं अच्छ) = यज्ञिय जीवन में (वीरम्) = ऐसी सन्तान (नयन्तु) = प्राप्त कराएँ जो (नर्यम्) [नरहितम्]=लोकहित करनेवाली हो तथा (पङ्क्तिराधसम्) = ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र व निषाद पाँचों के हितकर कार्यों को सिद्ध करनेवाली हो। सन्तान की प्रतिकूलता में उस यज्ञ में कुछ शिथिलता आ जाना स्वाभाविक है।
हम पूर्ण प्रयत्न करके अपने इस जीवन को यज्ञिय बनाएँ, भोग-मार्ग धीरपुरुषों का मार्ग नहीं। यज्ञमय जीवनवाला धीरपुरुष ही इस मन्त्र का ऋषि ‘कण्व' = मेधावी होता है।
भावार्थ
हम प्रभु का स्मरण करें, सत्य को धारण करें व यज्ञिय प्रवृत्तिवाली सन्तान को प्राप्त करें, जिससे हमारा यह जीवन यज्ञमय बना रहे ।
पदार्थ
शब्दार्थ = ( ब्रह्मणस्पतिः ) = ब्रह्माण्ड वा वेदपति परमात्मा ( नः प्रैतु ) = हमको प्राप्त हो ( देवी सूनृता ) = वेदवाणी ( अच्छा ) = अच्छी तरह ( प्र एतु ) = हमें प्राप्त हो ( वीरं नर्यम् ) = फैलनेवाले मनुष्य के हितकारक ( पङ्क्तिराधसम् ) = १ यजमान २ ब्रह्मा ३ अध्वर्यु ४ होता ५ उद्गाता इन पांचों पुरुषों से सेवित ( यज्ञम् ) = यज्ञ को ( देवा नयन्तु ) = अग्नि वायु देवता ले जावें ।
भावार्थ
भावार्थ = हे ब्रह्माण्डपते! हम सबको तीन वस्तुओं की कामना करनी चाहिये—एक आप परब्रह्म की प्राप्ति, दूसरी वेदविद्या, तीसरी यज्ञ अथवा १. हम यजमानों को मन से ईश्वर का चिन्तन, २. वाणी से वेद-मन्त्रों का उच्चारण, ३. कर्म से अग्नि में आहुति छोड़ना ।
विषय
परमेश्वर की स्तुति
भावार्थ
भा० = ( ब्रह्मणस्पति:१ ) = ब्रह्म का पालक विद्वान् या ईश्वर ब्रह्मणस्पति ( प्र-एतु ) = हमारे पास आवे । ( सूनृता ) = वेदवाणी ( देवी ) = दिव्यगुणों से सम्पन्न ( प्र-एतु ) = उत्तम रूप से हमें प्राप्त हो । ( देवा: ) = विद्वान् या इन्द्रियगण ( नर्यं ) = मनुष्यों के हितकारक ( वीरम् ) = वीर्यसम्पन्न ( पंक्तिराधसम् ) = पंक्ति, दश से साधन योग्य या परिपक्व ज्ञान से प्राप्य ( यज्ञं ) = यज्ञ को ( नः ) = हमें ( अच्छा२ ) = भली प्रकार ( नयन्तु ) = प्राप्त करावें ।
टिप्पणी
१. ब्रह्मणस्पतिः- ब्रह्म अन्नं, तस्य पतिः । ब्रह्म वेदः, तस्य पतिः ।
२. अच्छ आप्तुं सम्भावयितुमिति मा० वि० ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - कण्व घौरः।
छन्दः - बृहती।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ ब्रह्मणस्पतिर्देवता। अस्मान् किं किं प्राप्नुयादित्याह।
पदार्थः
(ब्रह्मणस्पतिः) ब्रह्मणो वेदस्य ब्रह्माण्डस्य सकलैश्वर्यस्य वा स्वामी जगदीश्वरः२ (प्र एतु) अस्मान् प्राप्नोतु। (देवी) दिव्यगुणयुक्ता (सूनृता) प्रियसत्यात्मिका वाक् (प्र एतु) अस्मान् प्राप्नोतु। (देवाः) विद्वांसः विदुष्यश्च। देवाश्च देव्यश्च इति देवाः, अत्र एकशेषः। (नः) अस्माकम् (यज्ञम्) राष्ट्ररूपम् अध्वरम् (अच्छ) प्रति। संहितायां निपातस्य च। अ० ६।३।१३६ इति दीर्घः। (नर्यम्) नरेषु साधुम्, नरहितकारिणम् (पङ्क्तिराधसम्३) यः पङ्क्तीः धर्मात्मवीरमनुष्याणां श्रेणीः राध्नोति सेवते, यद्वा पङ्क्त्यर्थं राधो धनं यस्य तम्।४ राध संसिद्धौ। राध इति धननाम। निघं० २।१०। (वीरम्) पूर्णशरीरात्मबलयुक्तं सन्तानम् (नयन्तु) प्रापयन्तु ॥२॥५
भावार्थः
वेदस्य, ब्रह्माण्डस्य, सकलैश्वर्यस्य च स्वामी परमेश्वरः मधुरा प्रिया सत्या वाग्, नरहितकर्ता धर्मात्मनां सेवकः सत्कार्येषु धनस्य दाता पुत्रश्च यदि प्राप्यते, तर्हि नूनं सर्वा अपि सिद्धयो हस्तगता भवन्ति ॥२॥
टिप्पणीः
१. ऋ० १।४०।३ देवता बृहस्पतिः। य० ३३।८९ देवता विश्वेदेवाः। २. अयमर्थः ऋ० ७।४१।१ इत्यस्य दयानन्दभाष्याद् गृहीतः। ३. धाना करम्भः परीवापः पुरोडाशः पयः इत्येषा हविः—पङ्क्तिः। द्विनाराशंसं प्रातःसवनं, द्विनाराशंसं माध्यन्दिनं सवनं, सकृन्नाराशंसं तृतीयसवनम् एषा नाराशंसपङ्क्तिः। पशुरुपवसथ्यः त्रीणि सवनानि, पशुरनूवन्ध्य इत्येषा सवनपङ्क्तिः। एताभिः पङ्क्तिभिः यः साध्यते एता वा साधयति स पङ्क्तिराधाः तं पङ्क्तिराधसम्—इति वि०। पङ्क्तिराधसं पङ्क्तिभिः हविष्पङ्क्त्यादिभिः आराधनीयं समर्थनीयं यज्ञम्—इति भ०। ४. अयमर्थः ऋ० १।४०।३ इत्यस्य दयानन्दभाष्याद् गृहीतः। ५. एष मन्त्रो दयानन्दर्षिणा ऋग्भाष्ये यजुर्भाष्ये च ये विदुषः, सत्यां वाचं, सर्वोपकारान् वीरांश्च प्राप्नुयुस्ते सम्यक् सुखोन्नतिं कुर्युः इत्यादिविषये व्याख्यातः।
इंग्लिश (3)
Meaning
May we attain to God and His righteous Vedic speech. May divine forces rightly guide the Yajna of our life, the Yajna which secures us heroic offspring, is beneficial to humanity, and is performed by five.
Translator Comment
Five means either five organs of perception or five organs of action Some commentators say five refers to the worshipper, Hota, Adhwaryu, Udgata and Brahman.^Griffith makes fire to refer to the oblations of grain, gruel, curdled milk, rice-cake and curds. Griffith takes the yajna in the physical and not spiritual sense.
Meaning
May the lord of divine knowledge move forward. May the lady scholar of divine truth and law move forward. May the generous and brilliant men of yajna carry and conduct our yajnas of the achievement of manly heroes for five-fold gifts of wealth and well- being. (Rg. 1-40-3)
Translation
May the high preceptor come to us. May brilliant divine virtue come to us. May Nature's bounties lead us to glory and drive away every adversary, and help us in the cause, beneficial to man, and measures leading to respectable prosperity. (Cf. Rv I.40.3)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (ब्रह्मणस्पतिः प्रैतुः વેદજ્ઞાન અને બ્રહ્માંડના સ્વામી પરમાત્મા મને અધ્યાત્મયજ્ઞમાં પ્રેરિત કરે - આગળ ધપાવે (सूनृता देवी प्र-एतु ‘‘प्रेतु'') દિવ્ય મંત્ર સ્તુતિ પણ મને અધ્યાત્મયજ્ઞમાં પ્રેરિત કરે (देवाः) મારા પ્રાણ (नः) અમારા (वीर नर्यम्) પ્રગતિકારક માનવ હિતકર (पंक्तिराधसम्) વાણી, શ્રોત્ર, નેત્ર, મન અને આત્મા એ પાંચેયથી સમર્પણ સિદ્ધ થયેલ (यज्ञम्) અધ્યાત્મયજ્ઞને (अच्छ नयन्तु) વ્યાપ્ત રૂપમાં અવરોધ વિના જીવનમાં આગળને આગળ ચલાવે-વધારે. (૨)
भावार्थ
ભાવાર્થ : અધ્યાત્મયજ્ઞ માનવ જીવનનો કલ્યાણસાધક છે. જેને ચલાવનાર પ્રાણ છે. તે બળવાન હોવો જોઈએ. જો નિર્બળ પ્રાણવાળો મનુષ્ય સ્વાસ્થ્યરૂપ ભૌતિક અમૃતને પ્રાપ્ત કરી શકતો નથી, તો આધ્યાત્મિક અમૃતના સ્વાદથી તો દૂર રહેશે.
અધ્યાત્મયજ્ઞમાં મનુષ્યનું સર્વાંગ સમર્પણ જરૂરી છે, વાણી, કાન, નેત્ર, મન અને આત્મા એ પાંચેયનુ આહુત થઈ જવું-લાગી જવું જોઈએ. વાણીથી સ્તવન કીર્તન કરવું, કાનથી ગુણ શ્રવણ કરવા, નેત્રથી સંસારમાં તેની કલા જોવી, મનથી મનન કરવું અને આત્માથી તેનું ભાવન-અનુભવ કરવો. સાથે વિશ્વાત્મા જ્ઞાનદાતાની દયા તેમાં પૂર્ણ શ્રદ્ધા તેમજ તેની મંત્રગત સ્તુતિ પણ મુખ્ય સાધન છે. (૨)
उर्दू (1)
Mazmoon
اِیشور پراپتی سَتیہ بانی اوریگیہ سُپتر چاہیئے
Lafzi Maana
(برہمنپتی) ویدوں کاپتی جگت کا مہان ادھی پتی، گورو، آچاریہ، پرمیشور (پرئیتو) ہمیں پراپت ہو (دئیوسی سُونرِتا پرایتُو) گیان کا پرکاش دینے والی پریہ اورستیہ بانی ہمیں پراپت ہو (دیوا نہ اچھ نینتُو) ہماری دِویہ بھا ونائیں پراکر تک دیوی شکتیاں اور وِدروانوں کی آشیرواد ہمیں ایسا پُتر پر دان کرے جو (ویرم نریم) ویرہو، نرناریوں کاہِت کرنے والا ہو (نیکتی را دہسم) براہمن کھشتری وَیش شودر اور اتی شودریا نشاد، اِن پانچوں کی سیوا کرنے والا ہو اور بانی، آنکھ، کان، من اور آتما اِن پانچوں کو دشی بھوت کرنے والا (یگیم) یگیہ مئے جیون والا ہو۔
Tashree
بانی سے ایشور کاگُن کیرتن، انکھ سے سنسار کی ہر ایک پدارتھ میں بھگوان کے کلاکوشل کو دیکھنا، کانوں سے اُس پرمیشور کی مہما کو شرون کرنا، من سے بار بار اوس کا سنن اور آتما میں ہر سمے اُس کے دھیان سے اُس کی انوبھوتی ہوتی رہے۔ ایسی سنتان ہو بگھوان! تب ہمارے جیون بھی یگیہ مئے ہی بنے رہیں گے۔
बंगाली (1)
পদার্থ
প্রৈতু ব্রহ্মণস্পতিঃ প্র দেব্যেতু সূনৃতা ।
অচ্ছা বীরং নর্যং পঙ্ক্তিরাধসং, দেবা যজ্ঞং নয়ন্তু নঃ।।১৪।।
(সাম ৫৬)
পদার্থঃ (ব্রহ্মণস্পতিঃ) ব্রহ্মাণ্ডপতি অথবা বেদের পতি পরমাত্মা (নঃ প্রৈতু) আমাদের দ্বারা প্রাপ্ত হোক। (দেবী সূনৃতা) বেদবাণী (অচ্ছা) উত্তম প্রকারে (প্র এতু) আমাদের প্রাপ্ত হোক। (বীরং নর্যম্) সর্বত্র সঞ্চারণ হওয়ার যোগ্য, মনুষ্যদের জন্য হিতকর, (পঙ্ক্তিরাধসম্) যজমান, ব্রহ্মা, অধ্বর্যু, হোতা ও উদ্গাতা এই পাঁচ ঋত্বিক দ্বারা সেবিত (যজ্ঞম্) যজ্ঞকে (দেবা নয়ন্তু) অগ্নি বায়ু আদি ভৌতিক দেবতা নিয়ে গিয়ে সর্বত্র ছড়িয়ে দিক।
ভাবার্থ
ভাবার্থঃ হে ব্রহ্মাণ্ডের পতি! আমরা সবাই তোমার কাছে তিনটি বস্তুর কামনা করছিঃ ১. পরমব্রহ্ম অর্থাৎ তোমাকে প্রাপ্তি, ২. বেদ বিদ্যা প্রাপ্তি এবং ৩. জ্ঞান প্রাপ্তি। অথবা আমরা যজমানগণ মন থেকে ঈশ্বরের কাছে এই তিনটি আকাঙ্ক্ষা করছিঃ ১. আমাদের মন দ্বারা যেন সর্বদা ঈশ্বরের চিন্তন, ২. বাণী দ্বারা যেন বেদ মন্ত্র সমূহ উচ্চারণ এবং ৩. যজ্ঞ কর্মের দ্বারা যেন অগ্নিতে আহুতি প্রদান করতে পারি।।১৪।।
मराठी (2)
भावार्थ
वेद, ब्रह्मांड व संपूर्ण ऐश्वर्याचा स्वामी जगदीश्वर, मधुर-प्रिय-सत्यवाणी व नरहितकर्ता धर्मात्म्यांचा सेवक, सत्कार्यामध्ये धनाचे दान करणारा पुत्र झालेला असेल तर निश्चयाने सर्व सिद्धी प्राप्त होतात. ॥२॥
शब्दार्थ
(ब्रह्मणस्पति) वेद, ब्रह्मांड आणि समस्त ऐश्वर्याचा स्वामी जगदीश्वर (प्र एतु) आम्हा उपासकांना प्राप्त होवो. (देवी) दिव्यगुणयुक्त आणि (सूमृक्ष) मधुर सत्यवाणी (प्र एतु) आम्हास प्राप्त व्हावी. (देवा:) विद्वान आणि विदुषी गण यांनी (न:) आमच्या (यज्ञम्) राष्ट्ररूप यज्ञा (अच्छ) प्रत (वर्यम्) नरहितकारी आणि (पडक्तिधसम्) धर्मात्मा वीर मनुष्यांच्या पंक्तीची समुहाची सेवा करणारी संताने प्राप्त करावी. तसेच राष्ट्रयज्ञासाठी त्या विद्वान विदुषींनी वीरसमुहासाठी आपले धन देणारी आणि (वीरम्) शारीरिक आध्यात्मिक शक्ती असणारी संताने आम्हास (नमलु) प्रदान करावीत. (विद्वानांनी अशी सुसंस्कृत वीर संताने होण्यासाठी आम्हा राष्ट्र नागरिकांना मार्गदर्शन करावे.) ।।२।।
भावार्थ
वेद, ब्रह्मांड व समस्त ऐश्वर्यांचा स्वामी परमेश्वर तसेच मधुर, प्रिय सत्य वाणी ज्यास प्राप्त होते तो सर्वसिद्धीधारी होतो. तसेच नरहितकर्ता, धर्माकाजनांचा सेवक आणि सत्कार्यासाठी दान देणारा पुत्र ज्याला प्राप्त होतो, सर्व सिद्धी त्यास निश्चयाने प्राप्त होतात. ।।२।।
तमिल (1)
Word Meaning
[1] (பிரமணஸ்பதி) வரட்டும், (தேவப்)பிரியரான சத்தியமென்னும் சொல் சீமாட்டி வரட்டும், மனிதர்களுக்கும் ஹிதமான (வீரனை), [2]ஐந்து வகை ஐஸ்வர்யங்களை தேவர்கள் அளிக்கும் எங்கள் யக்ஞத்திற்கு கொண்டு வரட்டும்.
FootNotes
[1] பிரமணஸ்பதி - அறிஞரின் தலைவன்
[2] ஐந்து வகை ஐஸ்வர்யங்களை - பக்குவமான, ஐந்து அற்புத ஞானேந்திரியங்கள்.
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