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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 607
    ऋषिः - गृत्समदः शौनकः देवता - अपांनपात् छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम - आरण्यं काण्डम्
    41

    स꣢म꣣न्या꣡ यन्त्युप꣢꣯यन्त्य꣣न्याः꣡ स꣢मा꣣न꣢मू꣣र्वं꣢ न꣣꣬द्य꣢꣯स्पृणन्ति । त꣢मू꣣ शु꣢चि꣣ꣳ शु꣡च꣢यो दीदि꣣वा꣡ꣳस꣢म꣣पा꣡न्नपा꣢꣯त꣣मु꣡प꣢ य꣣न्त्या꣡पः꣢ ॥६०७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स꣢म् । अ꣣न्याः꣢ । अ꣣न् । याः꣢ । य꣡न्ति꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । य꣣न्ति । अन्याः꣢ । अ꣣न् । याः꣢ । स꣣मान꣢म् । स꣣म् । आन꣢म् । ऊ꣣र्व꣢म् । न꣣द्यः꣢꣯ । पृ꣣णन्ति । त꣢म् । उ꣣ । शु꣡चि꣢꣯म् । शु꣡चयः꣢꣯ । दी꣣दिवाँ꣡स꣢म् । अ꣣पा꣢म् । न꣡पा꣢꣯तम् । उ꣡प꣢꣯ । य꣣न्ति । आ꣡पः꣢꣯ ॥६०७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    समन्या यन्त्युपयन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यस्पृणन्ति । तमू शुचिꣳ शुचयो दीदिवाꣳसमपान्नपातमुप यन्त्यापः ॥६०७॥


    स्वर रहित पद पाठ

    सम् । अन्याः । अन् । याः । यन्ति । उप । यन्ति । अन्याः । अन् । याः । समानम् । सम् । आनम् । ऊर्वम् । नद्यः । पृणन्ति । तम् । उ । शुचिम् । शुचयः । दीदिवाँसम् । अपाम् । नपातम् । उप । यन्ति । आपः ॥६०७॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 607
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 3; मन्त्र » 6
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 3;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में नदियों के दृष्टान्त से परमात्मा की महिमा वर्णित है।

    पदार्थ

    (अन्याः) कुछ नदियाँ (सं यन्ति) एक-दूसरी से मिलकर समुद्र को प्राप्त होती हैं, (अन्याः) और दूसरी कुछ नदियाँ (उपयन्ति) स्वतन्त्र रूप से पृथक्-पृथक् समुद्र में पहुँचती हैं। (नद्यः) वे सभी नदियाँ (समानम्) एक ही (ऊर्वम्) समुद्र की अग्नि को (पृणन्ति) तृप्त करती हैं। इसी प्रकार (तम् उ) उसी (शुचिम्) पवित्र (दीदिवांसम्) देदीप्यमान, (अपाम्) आप्त प्रजाओं को (नपातम्) पतित न करनेवाले, प्रत्युत उन्नत करनेवाले परमात्मारूप अग्नि को (आपः) आप्त प्रजाएँ (उपयन्ति) प्राप्त होती हैं ॥६॥ इस मन्त्र में व्यङ्ग्य-साम्यवाले दो वाक्यों में एक ही सामान्य धर्म ‘पृणन्ति’ और ‘उपयन्ति’ इन पृथक्-पृथक् शब्दों से वर्णित होने के कारण प्रतिवस्तूपमा अलङ्कार है। ‘सम, समा,’ ‘न्या, न्या,’ ‘यन्त्यु, यन्त्य,’ ‘पयन्त्य, पयन्त्या’ में छेकानुप्रास है ॥६॥

    भावार्थ

    जैसे व्याप्त नदियाँ एक ही समुद्र को भरती हैं, वैसे ही आप्त प्रजाएँ एक ही परमात्मा को प्राप्त होती हैं ॥६॥

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    पदार्थ

    (समानम्-ऊर्वम्) समान—एक ही नदियों के आश्रयरूप आच्छादन या वरण करने वाले महानद समुद्र को “ऊर्वी उर्व्यः-नदीनाम” [निघं॰ १.१३] “उर्वी-ऊर्णोते वृणोतेरित्यौपमन्यवः” [निरु॰ २.२७] ‘छान्दसं रूपम्’ (नद्यः पृणन्ति) नदियाँ तृप्त करना चाहती हैं—भरना चाहती हैं ‘अन्तर्गत सन्नर्थः’ अथवा (नद्यः-स्पृणन्ति) नदियाँ समुद्र की ओर चलती हैं, जाती हैं “स्पृ प्रीतिचलनयोः” [स्वादि॰] ‘विकरण व्यत्ययेन श्ना’ परन्तु उनमें (अन्याः-उपयन्ति) सब नहीं विरली नदियाँ समुद्र को प्राप्त होती हैं। इसी प्रकार (शुचयः-आपः) पवित्र—पापरहित एवं ज्ञानवैराग्य से प्रकाशमान आध्यात्मिक आप्तमनुष्य “आपोऽक्षिति या इमा एषु लोकेषु याश्चेमा अध्यात्मम्” [कौ॰ ७.४] “मनुष्या वा आपश्चन्द्राः” [श॰ ७.३.१.२०] (तम्-उ) उस ही (शुचिं दीदिवांसम्) पवित्र—पापसम्पर्करहित सर्वज्ञ अत्यन्त प्रकाशमान—(अपान्नपातम्) आप्तजनों को न गिराने वाले परमात्मा को (उपयन्ति) प्राप्त होते हैं।

    भावार्थ

    जैसे अपने वरने वाले समानरूप समुद्र को नदियाँ भरना या प्राप्त होना चाहती हैं, परन्तु विरली नदियाँ समुद्र तक पहुँचती हैं, ऐसे ही पवित्र निष्पाप ज्ञानवैराग्य से प्रकाशमान आध्यात्मिक आप्त मनुष्य इस अपने इष्टदेव पवित्र निष्पाप सर्वज्ञ अत्यन्त प्रकाशमान आप्त मुमुक्षुओं को अपनाने वाले परमात्मा को प्राप्त करते हैं॥

    विशेष

    ऋषिः—गृत्समदः (स्तुतिकर्ता हर्षालु उपासक)॥ देवता—अग्निः (स्वप्रकाशस्वरूप परमात्मा)॥ छन्दः—त्रिष्टुप्॥<br>

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    विषय

    समान ऊर्व में निवास

    पदार्थ

    गत मन्त्र में मानव जीवन के विकास का उल्लेख था। उस विकास के मार्ग पर चलनेवाले मनुष्यों की संख्या विरल होती है। प्रस्तुत मन्त्र में 'अन्या:' शब्द का प्रयोग इसी भावना को द्योतित कर रहा है। (अन्याः) = कोई एक ही (आपः) = [आपो वै नरसूनवः] नर- सन्तान अर्थात् मनुष्य (संयन्ति) = प्रभु के आदेशानुसार मिलकर चलते हैं। ('सं गच्छध्वं सं वदध्वम्') = ऋग्वेद की समाप्ति पर प्रकृति का ज्ञान देने के पश्चात् प्रभु ने आदेश दिया था । 'मिलकर चलेंगे' तभी प्रकृति हमारा हित करेगी, 'फटकर चलेंगे' तो यह प्रकृति हमें फाड़ देगी। प्रकृति में न फँसेंगे तो हमारा परस्पर मेल होगा - तभी हम प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनेंगे। मन्त्र में आगे कहते हैं कि (अन्या:) = ऐसे विरल पुरुष ही (उपयन्ति) = उस प्रभु के समीप प्राप्त होते हैं। ये इहलोक में प्रभु के समीप रहते हैं- शरीर छोड़ने के बाद उस प्रभु के समीप पहुँच ही जाते हैं। ‘इस जीवन में वे प्रत्येक क्रिया करते हुए उस प्रभु का विस्मरण नहीं करते' यही प्रभु के समीप रहने की भावना है। सोते, खाते, पीते ये सदा उस प्रभु का नाम स्मरण करते हैं। (नद्यः) = सदा प्रभु के गुणों का गान करनेवाले [नद् स्तुतौ] ये उपासक (समानम्) = वृद्धि और क्षय से रहित सदा एकरस (ऊर्वम्) = अत्यन्त विस्तृत उस सर्वव्यापक प्रभु में (स्पृणन्ति) = [स्पृ-to live] निवास करते हैं। (तम्) = उस (शुचिम्) = पवित्र, निर्मल, अपापविद्ध प्रभु को (दीदिवांसम्) = ज्ञान की ज्योति से दीप्त होते हुए प्रभु को, (अपां न पातम्) = कर्मों को कभी न नष्ट होने देनेवाले प्रभु को, स्वाभाविकी ज्ञान, बल व क्रियावाले उस परमात्मा को उ निश्चय से (शुचय:) = पवित्र जीवनोवाले (आपः) = ज्ञान के द्वारा अपने जीवन को व्यापक - विशाल बनानेवाले [आप्-व्याप्तौ] कर्मशील [आप्=कर्म] व्यक्ति ही (उपयन्ति) = समीपता से प्राप्त होते हैं। 

    ज्ञान से मनुष्य का दृष्टिकोण विशाल बनता है। इस समय इसके कर्म स्वार्थ की संकुचित दृष्टि से न किये जाकर सर्वभूतहित की दृष्टि से किये जाते हैं, अतः व्यापकता को लिये हुए होते हैं। ये व्यापक कर्म ही इसे प्रभु का सच्चा भक्त बनाते हैं। प्रकृति में विचरते हुए भी ये प्रकृति में नहीं उलझते, परिणामतः प्रकृति से सदा ऊपर उठे रहते हैं और उस प्रभु में जीवन-यापन करते हैं। यही जीवन्मुक्ति कहलाती है - यही सदेह होते हुए भी विदेह होना होता है। शरीर छोड़ने के पश्चात् ('सह ब्रह्मणा विपश्चिता') = ये उस ज्ञानी ब्रह्म के साथ विचरते हैं।

    यह प्रभु का सच्चा स्तोता होने से 'गृत्स' कहलाता है - मनः प्रसाद को अनुभव करता हुआ यह 'मद' होता है और गतिशील कर्मनिष्ठ होने से यह 'शौनक' है। 

    भावार्थ

    हम भी उन विरल व्यक्तियों में गिने जाएँ जो मिलकर चलते हैं, प्रभु के उपासक हैं, प्रभु में निवास करते हैं और अपने जीवन को पवित्र, ज्ञान से दीप्त व कर्मनिष्ठ बनाते हैं।

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = जिस प्रकार ( अन्याः नद्यः ) = भिन्न २ नदियां ( सं यन्ति ) = परस्पर मिल जाती हैं और ( अन्या: ) = भिन्न २ नदियां ( उपयन्ति ) = समीप देशों में गमन करती है और ( समानं  ) = समानरूप से एक ही ( ऊंर्व ) = विशाल समुद्र को ( पृणन्ति ) = भरा करती हैं, उसी प्रकार ( आपः ) = ईश्वर तक को प्राप्त कराने वाली ( नद्यः ) = समृद्ध स्तुति वाणियां अथवा प्रजाएं ( अन्याः ) = नाना प्रकार की प्राणधारी जीव प्रजाएं ( संयन्ति ) = एक साथ मिलजाती हैं और ( अन्याः उपयन्ति ) = बहुतसी समीप ही एक प्रकार के अर्थ का बोध कराती है और ( समानम् ऊर्वम् ) = समान ही रूप से उस विशाल महान् परमेश्वर को ( पृणन्ति ) = स्तुति करती हैं और वे ( आपः ) = ज्ञान और कर्म का उपदेश करने हारी वाणियां ( शुचयः ) = शुद्ध प्रकाश करनेहारी ( तम् उ शुचिम् ) = उसही शुद्ध पवित्र ( दीदिवासम् ) = देदीप्यमान ( अपां नपातम्१   ) = समस्त वेद के ज्ञानों और कर्मों के एकमात्र आश्रय ईश्वर को ( उपयन्ति ) = प्राप्त होती हैं। ( आप:= वाणियां, बुद्धियां, प्रजाएं, आप्तजन, लोक, नद्यः =स्तुतियां, वाणियां, नदियां )
     

    टिप्पणी

    ६०७ – 'अपां नपातं परितस्थुरापः' इति ऋ० ।
    १. नपात्-नेत्युपमार्थः । पतन्तीव यत्र स नपातु "नपात्" इति निपातः ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - वामदेव:। 

    देवता - अग्नि:। 

    छन्दः - त्रिष्टुप्।

    स्वरः - धैवतः। 

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ नदीदृष्टान्तेन परमात्मनो महिमानमाह।

    पदार्थः

    (अन्याः) काश्चन नद्यः (सं यन्ति) परस्परं संसृज्य समुद्रं गच्छन्ति, (अन्याः) इतराश्च (उप यन्ति) स्वतन्त्रतया पृथक् पृथक् समुद्रम् उपगच्छन्ति, (नद्यः) ताः सर्वा अपि सरितः (समानम्) एकमेव (ऊर्वम्) समुद्राग्निम् (पृणन्ति) प्रीणयन्ति। पृण प्रीणने, तुदादिः। तथैव (तम्) उ तमेव (शुचिम्) पवित्रम्, (दीदिवांसम्) देदीप्यमानम्। दिवुः दीप्यर्थः, लिटः क्वसुः। (अपाम्) आप्तानां प्रजानाम्२ (नपातम्) न पातयितारम् अग्निं परमात्मानम् (आपः) आप्ताः प्रजाः (उप यन्ति) उपगच्छन्ति ॥६॥ अत्र व्यङ्ग्यसाम्ययोर्द्वयोर्वाक्ययोरेकोऽपि सामान्यो धर्मः ‘पृणन्ति, उपयन्ति’ इति पृथक्शब्दाभ्यां निर्दिष्ट इति प्रतिवस्तूपमालङ्कारः३। ‘सम, समा’, ‘न्या, न्या’, ‘यन्त्यु, यन्त्य’, ‘शुचि, शुच’, ‘पयन्त्य, पयन्त्या’ इति च सर्वत्र छेकानुप्रासः ॥६॥

    भावार्थः

    यथा व्याप्ता नद्य एकमेव समुद्राग्निं प्रीणयन्ति तथैवाप्ताः प्रजा एकमेव परमात्माग्निं प्राप्नुवन्ति ॥६॥४

    टिप्पणीः

    १. ऋ० २।३५।३, ‘नद्यः पृणन्ति’, ‘परितस्थुरापः’ इति पाठः। २. ‘(आपः) आप्ताः प्रजाः’ इति य–० ६।२७ भाष्ये द०। ३. प्रतिवस्तूपमा सा स्याद् वाक्ययोर्गम्यसाम्ययोः। एकोऽपि धर्मः सामान्यो यत्र निर्दिश्यते पृथक् ॥ सा० द० १०।४९-५० इति तल्लक्षणात्। ४. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिरस्य मन्त्रस्य भावार्थमेवमाह—‘यथा नद्यः स्वयं समुद्रं प्राप्य स्थिरोदका जायन्ते, यथा आपो मेघमण्डलं प्राप्य दिव्या भवन्ति, तथा स्त्री अभीष्टं पतिं पतिरभीष्टां स्त्रियं च प्राप्य स्थिरमनस्कौ शुद्धभावौ भवतः’ इति।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, just as some waters mingle together, some exhaust themselves in reaching the ocean, and some fill the ocean in the form of streams, so do these holy Vedic words reach unto Thee, Most Brilliant, the Preserver of actions !

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    Meaning

    Some of these streams of water and currents of energy flow together. Some others flow close by them, and all of them together join and flow into the ocean to fullness. And these clear and purest streams of water and water energy all round abide by that pure, bright and blazing child of the waters, imperishable agni, fire and electric energy of the water power. (This mantra describes the dynamic circuit flow of energy and its imperishable form in the state of conservation. ) (Rg. 2-35-3)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (समानम् ऊर्वम्) એક જ નદીઓના આશ્રયરૂપ આચ્છાદન અથવા વરણ કરનાર મહાનદ સમુદ્રને (नद्यः पृणन्ति) નદીઓ તૃપ્ત કરવા ચાહે છે-ભરવા ઇચ્છે છે અથવા (नद्यः स्पृणन्ति) નદીઓ સમુદ્ર તરફ ગતિ કરે છે; જાય છે, પરંતુ તેમાં (अन्याः उपयन्ति) બધી નહિ પરન્તુ કોઈ વિરલ નદીઓ જ સમુદ્રને પ્રાપ્ત થાય છે. એવી રીતે (शुचयः आपः) પવિત્ર-પાપરહિત અને જ્ઞાન, વૈરાગ્યથી પ્રકાશમાન આધ્યાત્મિક આપ્ત મનુષ્યો (तम् उ) તેને જ (शुचिं दीदिवांसम्) પવિત્ર-પાપ સંપર્ક રહિત, સર્વજ્ઞ, અત્યંત પ્રકાશમાન; (अपान्नपातम्) આપ્તજનોને ન પડવા દેનાર એવા પરમાત્માને (उपयन्ति) પ્રાપ્ત થાય છે. (૬)
     

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : જેમ પોતાને પહોંચવા-વરવાવાળી સમાનરૂપ સમુદ્રને નદીઓ ભરવા અથવા પ્રાપ્ત કરવા ઇચ્છે છે, પરન્તુ કોઈ વિરલી નદીઓ જ સમુદ્ર સુધી પહોંચે છે, એ જ રીતે પવિત્ર, નિષ્પાપ, જ્ઞાનવૈરાગ્યથી પ્રકાશમાન, આધ્યાત્મિક આપ્ત પુરુષ, એ પોતાના ઇષ્ટદેવ પવિત્ર, નિષ્પાપ, સર્વજ્ઞ, અત્યંત પ્રકાશમાન, આપ્ત મુમુક્ષુઓને અપનાવનાર પરમાત્માને પ્રાપ્ત કરે છે. (૬)
     

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    آخر تو پیارے معبُود سے وِصال ہو ہی جاتا ہے!

    Lafzi Maana

    کئی ندیاں سفر کرتی ہوئیں اپنی منزل سمندر تک پہنچ جاتی ہیں تو کئی راستے میں رہ جاتی ہیں، اِسی طرح کئی پاکیزہ رُوحیں چلتی چلتی اپنی منزل مقصود بھگوان تک پہنچ جاتی ہیں، اور کئی عابدت وغیرہ حمد و ثنا تک رہ جاتی ہیں، لیکن یہ دونوں ندیاں اور پِوتر آتمائیں سچے دِل سے اپنے آپ کو سمندر یا پرم پتا پرمیشور کو سونپی جا چکی ہوتی ہیں۔ دریں چہ شک، مسلسل موت اور پھر جنم کے بعد آخر تو اپنے پیارے معبود سے وصال ہو ہی جاتا ہے!

    Tashree

    اِدھر اُدھر سے چلتی ندیاں رہ جاتیں ساگر میں ملتیں، اِسی طرح پاکیزہ رُوحیں اِیشور کوہیں پالیتیں۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    जशा काही नद्या परस्पर तर काही नद्या पृथक् अशा एकाच समुद्राला मिळतात, तशीच आप्त (विद्वान) प्रजा एकाच परमात्म्याला प्राप्त होतात - मिळतात ॥६॥

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    विषय

    नदीच्या दृष्टान्तावरून परमेश्वराच्या महत्तेचे वर्णन

    शब्दार्थ

    (अन्याः) काही नद्या (संयन्ति) इतरांशी दुसऱ्या नद्यांशी मिळून समुद्रापर्यंत जातात, तर (अन्याः) काही नद्या (उपयन्ति) सर्वांशी वेगळे राहून, स्वतंत्ररूपाने समुद्रापर्यंत जातात. (नद्यः) या सर्वच नद्या (समानम्) समानरूपाने एकाच (ऊर्वम्) समुद्राच्या अग्नीला (पृणन्ति) तृप्त करतात. याचप्रकारे (तम् उ) त्याच (शुचिम्) पवित्र (दीदिवांसम्) देदीप्यमान (अपाम्) आप्त प्रजेला (नपातम्) पतित न करणाऱ्या, नव्हे, त्या प्रजेला (उपासकांना) उन्नत करणाऱ्या परमात्मरूप अग्नीला (आपः) आप्त प्रजाजन/उपासक (उपयन्ति) प्राप्त करतात.।।६।।

    भावार्थ

    जसे नद्या एकाच समुद्रास भरतात, तद्वत आप्त उपासक एकाच परमेश्वराला मानतात.।।६।।

    विशेष

    या मंत्रात ण्यंग्डत्र व साम्य असणाऱ्या दोन वाक्यांमधे एकच सामान्य धर्म ‘प्रणन्ति’ व ‘उपयन्ति’ या दोन वेगवेगळ्या शब्दाद्वारे व्यक्त केला आहे, त्यामुळे येथे प्रतिवस्तूपमा अलंकार आहे. ‘सम, समा’ ‘न्या, न्या’ ‘यन्तु, यन्त्य’ पयन्त्म, पयन्त्या’ या शब्दांमुळे छ्लेकानुप्रास आहे.।।६।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    வர்ஷித்த சலங்கள் ஒன்று சேர்கின்றன; வேறு சலங்களும் அவ ற்றோடு ஒன்றாகின்றன; சலமுடனான நதிகள் எல்லாம் சமான வடிவமான ஒரு சமுத்திரத்தில் நிறைகின்றன. எல்லா பக்கங்களிலும் சோதியுடனான சலம் சலங்களின் ஒளியுடனான மகனை சூழ்ந்து கொள்ளுகிறது

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