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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 615
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - अग्निः छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम - आरण्यं काण्डम्
    24

    भ्रा꣡ज꣢न्त्यग्ने समिधान दीदिवो जि꣣ह्वा꣡ च꣢रत्य꣣न्त꣢रा꣣स꣡नि꣢ । स꣡ त्वं नो꣢꣯ अग्ने꣣ प꣡य꣢सा वसु꣣वि꣢द्र꣣यिं꣡ वर्चो꣢꣯ दृ꣣शे꣡ऽदाः꣢ ॥६१५

    स्वर सहित पद पाठ

    भ्रा꣡ज꣢꣯न्ती। अ꣣ग्ने । समिधान । सम् । इधान । दीदिवः । जिह्वा꣢ । च꣣रति । अन्तः꣢ । आ꣣स꣡नि꣢ । सः । त्वम् । नः꣣ । अग्ने । प꣡य꣢꣯सा । व꣣सुवि꣢त् । व꣣सु । वि꣢त् । र꣣यि꣢म् । व꣡र्चः꣢꣯ । दृ꣣शे꣢ । दाः꣣ ॥६१५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    भ्राजन्त्यग्ने समिधान दीदिवो जिह्वा चरत्यन्तरासनि । स त्वं नो अग्ने पयसा वसुविद्रयिं वर्चो दृशेऽदाः ॥६१५


    स्वर रहित पद पाठ

    भ्राजन्ती। अग्ने । समिधान । सम् । इधान । दीदिवः । जिह्वा । चरति । अन्तः । आसनि । सः । त्वम् । नः । अग्ने । पयसा । वसुवित् । वसु । वित् । रयिम् । वर्चः । दृशे । दाः ॥६१५॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 615
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 4; मन्त्र » 1
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 4;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम ऋचा का अग्नि देवता है। अग्नि नाम से परमेश्वर, आचार्य और राजा को सम्बोधित किया गया है।

    पदार्थ

    प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (समिधान) अतिशय प्रकाशयुक्त, (दीदिवः) सबको प्रकाशित करनेवाले (अग्ने) जगन्नायक परमात्मन् ! आपकी कृपा से (आसनि अन्तः) हमारे मुख के अन्दर (भ्राजन्ती) शोभित होती हुई (जिह्वा) जीभ (चरति)रसों का स्वाद लेती और शब्दों का उच्चारण करती है। (सः) वह (वसुवित्) ऐश्वर्यों को प्राप्त करानेवाले (त्वम्) आप, हे (अग्ने) परमात्मन् ! (नः) हमें (पयसा) जल, दूध, घी आदि रस के साथ (रयिम्) धन को, और (दृशे) कर्तव्याकर्तव्य के दर्शन के लिए (वर्चः) ज्ञान रूप तेज (दाः) प्रदान किये हुए हो ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। आचार्य रूप अग्नि में स्वयं को आहुत करने के लिए गुरुकुल में आये हुए समित्पाणि शिष्य कह रहे हैं—हे (समिधान) स्वयं ज्ञान से प्रदीप्त तथा (दीदिवः) शिष्यों को ज्ञान से प्रदीप्त करनेवाले (अग्ने) विद्वान् आचार्यप्रवर ! आपके (आसनि अन्तः) मुख के अन्दर (भ्राजन्ती) शास्त्रों का ज्ञान से उपदेश देने के कारण यश से जगमगाती हुई (जिह्वा) जीभ (चरति) शब्दों के उच्चारण के लिए तालु, दन्त आदि स्थानों में विचरती है। (सः) वह महिमाशाली, (वसुवित्) विविध विद्याधनों को प्राप्त करानेवाले (त्वम्) आप, हे (अग्ने) आचार्यवर ! (नः) हमारे (दृशे) कर्तव्य-दर्शन के लिए (पयसा) वेदज्ञान रूप दूध के साथ (रयिम्) सदाचार की सम्पदा को और (वर्चः) ब्रह्मवर्चस को (दाः) हमें प्रदान कीजिए ॥ तृतीय—राजा के पक्ष में। सिंहासन पर चढ़े हुए राजा के प्रति प्रजाजन कह रहे हैं—हे (समिधान) राजोचित प्रताप से देदीप्यमान, (दीदिवः) प्रजाओं को यश से प्रदीप्त करनेवाले (अग्ने) अग्रनायक राजन् ! (आसनि अन्तः) आपके धनुष् पर (भ्राजन्ती) दमकती हुई (जिह्वा) डोरी (चरति) चलती है अर्थात् खिंचती, छूटती और बाणों को फेंकती है। (सः) वह (वसुवित्) प्रजाओं को निवास प्राप्त करानेवाले (त्वम्) आप, हे (अग्ने) अग्नि के समान जाज्वल्यमान राष्ट्राधिपति ! (दृशे) राष्ट्र की ख्याति के लिए, प्रजा को (पयसा) दूध आदि रसों के साथ (रयिम्) धन, धान्य आदि सम्पदा और (वर्चः) ब्राह्म तेज (दाः) प्रदान कीजिए ॥ चतुर्थ—यज्ञाग्नि के पक्ष में। यजमान कह रहे हैं—हे (समिधान) प्रज्वलित, (दीदिवः) याज्ञिक को तेज से प्रज्वलित करनेवाले (अग्ने) यज्ञाग्नि ! (आसनि अन्तः) यज्ञकुण्ड रूप मुख के अन्दर (भ्राजन्ती) जगमगाती हुई (जिह्वा) तेरी ज्वाला रूप जीभ (चरति) लपलपाती है। (सः) वह (वसुवित्) हविरूप धन को प्राप्त करनेवाला (त्वम्) तू हे (अग्ने) यज्ञाग्नि ! (पयसा) वर्षाजल के साथ (रयिम्) सस्य-सम्पदा रूप तथा बल, बुद्धि, दीर्घायु आदि रूप धन को तथा (दृशे) देखने के लिए (वर्चः) प्रकाश को (दाः) प्रदान कर ॥ मुण्डक उपनिषद् के ऋषि ने अग्नि की जिह्वाएँ इस प्रकार वर्णित की हैं—काली, कराली, मन जैसे वेगवाली, अत्यन्त लाल, धुमैले रंग की, चिनगारियाँ छोड़नेवाली और सब रंगोंवाली ज्वालाएँ ये अग्नि की सात लपलपाती जिह्वाएँ हैं (मु० २।४)। अग्नि के मुख और जिह्वाओं का वर्णन करने के कारण यज्ञाग्निपरक अर्थ में असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे जगदीश्वर मनुष्यों को जल, दूध, घी, ज्ञान आदि और यज्ञाग्नि वृष्टि, जल, बल, बुद्धि, दीर्घायुष्य आदि देता है, वैसे ही आचार्य को शिष्यों के लिए वेदविद्या, सदाचार, ब्रह्मतेज आदि प्रदान करना चाहिए और राजा को राष्ट्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों की उन्नति द्वारा प्रजाओं को सुखी करना चाहिए ॥१॥

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    पदार्थ

    (समिधान दीदिवः-अग्ने) हे सम्यक् प्रकाशमान अन्यों को प्रकाशित करने वाले अग्रणायक परमात्मन्! (भ्राजन्ती जिह्वा) तेरे गुणों का प्रकाश करती हुई वाक्—वाणी “जिह्वा वाङ्नाम” [निघं॰ १.११] (आसनि-अन्तः-चरति) मुख के अन्दर प्राप्त है (सः-त्वम्) वह तू (वसुविद्-अग्ने) हे धन प्राप्त कराने वाले परमात्मन्! (दृशे) अपने दर्शनार्थ (नः) हमारे लिये (रयिं वर्चः पयसा) पुष्टि—स्वास्थ्य “पुष्टं वै रयिः” [श॰ २.३.४.१३] ब्रह्मवर्चस को प्राणशक्ति के साथ “प्राणः पयः” [श॰ ६.५.४.१५] (अदाः) प्रदान कर।

    भावार्थ

    हे स्वयं प्रकाशमान अन्यों को प्रकाशित करने वाले अग्रणायक परमात्मन्! तेरे गुणों का प्रकाश करती हुई वाणी मेरे मुख के अन्दर प्राप्त है। यह तेरी स्तुति करती रहती है, इस प्रतीकार में तू अपने दर्शनार्थ हमारे लिये पुष्टि स्वास्थ्य प्राणशक्ति और ब्रह्मवर्चस प्रदान कर॥१॥

    विशेष

    ऋषिः—वामदेवः (वननीय परमात्मदेव वाला)॥ देवता—अग्निः (ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा)॥ छन्दः—पंक्तिः॥<br>

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    विषय

    प्रभु दर्शन के लिए

    पदार्थ

    १. प्रभु - दर्शन के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमारी जिह्वा सदा प्रभु के नाम का जप करे। ‘तयपस्तदर्थभावनम्'=उसके नाम का जप और उस नाम के अर्थ का चिन्तन
     
    यही योग में ईश्वर-साक्षात्कार का प्रथम उपाय बताया है। मन्त्र में कहते हैं कि हे (समिधान) = तेज से प्रकाशमान प्रभो! (दीदिवः) = ज्ञान की ज्योति से देदीप्यमान (अग्ने) = सारे संसार को अग्रगति देनेवाले प्रभो! (भ्राजन्ती) = आपके नामस्मरण से चमकती हुई (जिह्वा) = सदा (अन्तः आसनि) = मुख में (चरति) = गतिशील होती है अर्थात् मैं मुख से सदा आपके नामों का उच्चारण करता हूँ। प्रभु के नामोच्चारण से मेरी जिह्वा सदा चमकती रहती है। अपशब्दों से वह मैली नहीं होती।

    २. हे अग्ने=प्रकाशस्वरुप प्रभो! (सः त्वम्) = वे आप (वसुवित्) = निवास के लिए आवश्यक सब साधनों को प्राप्त करानेवाले (न:) = हमें (पयसा) = [प्यायते:] आप्यायन-वृद्धि के दृष्टिकोण से (रयिम्) = धन तथा (वर्च:) = तेजस्विता (अदा:) = दीजिए जिससे हम (दृशे) = आपका दर्शन कर सकें। प्रभुदर्शन के लिए 'नमक, तेल, ईंधन' की चिन्ता से मुक्त होना भी आवश्यक है। ‘भूखे भजन न होई' । योगभ्रष्ट को प्रभु श्रीमताम् = धन-सम्पन्न घर में इसलिए जन्म देते हैं। धन के साथ शरीर की शक्ति भी आवश्यक है। निर्बलता से शरीर रोगाक्रान्त होकर ध्यान को विचलित करनेवाला हो जाता है। धन और स्वास्थ्य का लाभ करके ही हम अपना आप्यायन-वर्द्धन कर सकते हैं। एवं, जहाँ प्रभु के नाम का जप आवश्यक है। वहाँ धन व तेजस्विता भी प्रभु-दर्शन के लिए सहायक हैं। मैं धन प्राप्त करके धन में आसक्त न हो जाऊँ, परन्तु इतना निर्धन भी न होऊँ कि मेरी सारी शक्ति व समय पेट की व्यवस्था करने में ही समाप्त हो जाए।

    भावार्थ

    उचित धन व शक्ति के साथ प्रभु-स्मरण मनुष्य को 'वामदेव गोतम' = प्रशस्त गुणोंवाला, प्रशस्तेन्द्रिय बनाता है।

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा०  = हे ( अग्ने ) = ज्ञानवान् ! हे ( समिधान ) = प्रकाशमान ! हे ( दीदिवः ) = देदीप्यमान ! ( अन्तः आसनि ) = प्रत्येक आश्रय स्थान देह में, मुख में जीभ के समान ( भ्राजन्ती ) = प्रकाश स्वरूप, ज्ञानस्वरूप, चित्शक्तिरूप ( जिह्वा ) = ज्ञान ग्रहण करने हारी शक्ति ( चरति ) = विचर रही है । हे अग्ने ! ( स त्वं ) = वह तू ( वसुविद् ) = वास कराने हारे प्राणों या ऐश्वर्यमय लोकों को जानने या कर्मानुसार प्राप्त कराने हारा ( नः ) = हमें ( पवसा ) = अन्न, ज्ञान, पुष्टिकारक पदार्थ के साथ ( रयिं ) = जीवन और ( वर्च: ) = बल और कान्ति, रक्षा सामर्थ्य ( अदा:) = प्रदान कर । 

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - वामदेव:।

    देवता - अग्निः।

    छन्दः - पङ्क्तिः।

    स्वरः - पञ्चमः। 

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    तत्राद्याया अग्निर्देवता। अग्निनाम्ना परमेश्वर आचार्यो राजा च सम्बोध्यते।

    पदार्थः

    प्रथमः—परमात्मपक्षे। हे (समिधान) अतिशयप्रकाशमान, (दीदिवः१) सर्वप्रकाशक अग्ने जगन्नायक परमात्मन् ! त्वत्कृपया (आसनि अन्तः) अस्माकं मुखाभ्यन्तरे (भ्राजन्ती) शोभमाना (जिह्वा) रसना (चरति) रसानास्वादयति शब्दानुच्चारयति च। चर गतौ भक्षणे च, भ्वादिः। (सः) तथाविधः (वसुवित्) ऐश्वर्याणां लम्भकः (त्वम्), हे (अग्ने) परमात्मन् ! (नः) अस्मभ्यम् (पयसा) जलदुग्धघृतादिरसेन सह (रयिम्) धनम्, (दृशे) दर्शनाय। अत्र दृश् धातोः ‘दृशे विख्ये च। अ० ३।४।११’ इति तुमर्थे के प्रत्ययः। (वर्चः) ज्ञानरूपं तेजश्च (दाः) अदाः, प्रत्तवानसि ॥ अथ द्वितीयः—आचार्यपक्षे। आचार्याग्नौ स्वात्मानं होतुं गुरुकुलमागताः समित्पाणयः शिष्या ब्रुवते—हे (समिधान) ज्ञानेन प्रदीप्त, (दीदिवः) ज्ञानेन प्रदीपयितः (अग्ने) विद्वन् आचार्यवर ! तव (आसनि अन्तः) मुखाभ्यन्तरे (भ्राजन्ती) शास्त्रोपदेशप्रदानेन यशोमयी (जिह्वा) रसना (चरति) शब्दोच्चारणाय तालुदन्तादिषु स्थानेषु विचरति। (सः) तादृशो महामहिमशाली, (वसुवित्) विविधविद्याधनप्रदः (त्वम्) हे (अग्ने) आचार्यवर ! (नः) अस्माकम् (दृशे) कर्तव्यदर्शनाय (पयसा) वेदज्ञानरूपदुग्धेन सह (रयिम्) सदाचारसम्पत्तिम् (वर्चः) ब्रह्मवर्चसं च (दाः) प्रदेहि ॥ अथ तृतीयः—राजपक्षे। सिंहासनारूढं राजानं प्रति प्रजानां वचनमिदम्। हे (समिधान) राजोचितप्रतापेन दीप्यमान, (दीदिवः) यशसा प्रजाः प्रदीपयितः (अग्ने) अग्रणीः राजन् ! (आसनि अन्तः) तव शरासने (भ्राजन्ती) भ्राजमाना (जिह्वा) प्रत्यञ्चा (चरति) चलति, आकृष्यते मुच्यते शरानस्यति च। (सः) तादृशः (वसुवित्) प्रजानां निवासप्रदायकः (त्वम्), हे (अग्ने) अग्निवज्जाज्वल्यमान राष्ट्राधिपते ! (दृशे) राष्ट्रस्य ख्यातये (पयसा) दुग्धादिना रसेन सह (रयिम्) धनधान्यादिसम्पदम्, (वर्चः) ब्राह्मं तेजश्च (दाः) देहि ॥ अथ चतुर्थः—यज्ञाग्निपक्षे। यजमाना आहुः—हे (समिधान) प्रदीप्यमान, (दीदिवः) तेजसा प्रदीपयितः (अग्ने) यज्ञवह्ने ! (आसनि अन्तः) यज्ञकुण्डरूपमुखाभ्यन्तरे (राजन्ती) भ्राजमाना (जिह्वा) तव ज्वाला (चरति) लेलायते। (सः) तादृशः (वसुवित्) वसु हविर्धनं विन्दते प्राप्नोतीति तथाविधः (त्वम्), हे अग्ने यज्ञवह्ने ! (पयसा) वृष्टिजलेन सह (रयिम्) सस्यसम्पद्रूपं बलबुद्धिदीर्घायुष्यादिरूपं च धनम्, (दृशे) दर्शनाय (वर्चः) प्रकाशं च (दाः) देहि। यज्ञाग्नौ हवींषि प्रयच्छन्तो वयं वृष्टिं सस्यसम्पदं बलबुद्धिस्वास्थ्यदीर्घायुष्यादिकं च लभेमहीति भावः ॥ उपनिषत्कारेण ऋषिणा वह्नेर्जिह्वा एवं प्रोक्ताः—काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ मु० २।४ इति। वह्नेर्मुख- जिह्वावर्णनाद् असम्बन्धे सम्बन्धरूपोऽतिशयोक्तिरलङ्कारः ॥१॥

    भावार्थः

    यथा जगदीश्वरो मनुष्येभ्यो जलदुग्धघृतज्ञानादिकं यज्ञाग्निश्च वृष्टिजलबलबुद्धिदीर्घायुष्यादिकं प्रयच्छति तथैवाचार्येण शिष्येभ्यो वेदविद्यासदाचारब्रह्मवर्चसादिकं प्रदेयम्, नृपेण च राष्ट्रे ब्रह्मक्षत्रविशामुत्कर्षेण प्रजाः सुखयितव्याः ॥१॥

    टिप्पणीः

    १. दीदिवः प्रकाशमयानन्दप्रद। अत्र दिवु धातोः ‘छन्दसि लिट्’। अ० ३।२।१०५ इति लिट्, ‘क्वसुश्च’। अ० ३।२।१०७ इति लिटः स्थाने क्वसुः, छन्दस्युभयथा। अ० ३।४।११७ इति लिडादेशस्य क्वसोः सार्वधातुकत्वादिडभावः, ‘तुजादीनां दीर्घोऽभ्यासस्य’। अ० ६।१।७ इत्यभ्यासदीर्घः, ‘मतुवसो रु सम्बुद्धौ छन्दसि’। अ० ८।३।१ इति रुरादेशश्च—इति य० ३।२६ भाष्ये द०।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O Wise, Refulgent, Lustrous God, like the tongue in the mouth, mental power, the recipient of knowledge, acts in every body. Thou alone, the Bestower of riches, grandest us, for our guidance, life, strength, glory, along with knowledge and invigorating food !

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    Meaning

    Agni, self-refulgent light and splendour of the world, your flames in the vedi, like tongue in the mouth, rise, roll and blaze. O radiant Agni, lord of the worlds wealth and excellence, bring us wealth, honour and excellence with the nutriments of life and the light of life that we may see the world and the life divine.

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (समिधान दीदिवः अग्ने) હે સમ્યક્ પ્રકાશમાન અન્યોને પ્રકાશિત કરનાર અગ્રણી પરમાત્મન્ ! (भ्राजन्ती जिह्वा) તારા ગુણોનો પ્રકાશ કરતી વાક્-વાણી (आसनि अन्तः चरति) મુખમાં પ્રાપ્ત છે (सः त्वम्) તે તું (वसुविद् अग्ने) હે ધન પ્રાપ્ત કરાવનાર પરમાત્મન્ ! (दृशे) તારા દર્શન માટે (नः) અમારે માટે (रयिं वर्चः पयसा) પુષ્ટિ-સ્વાસ્થ્ય બ્રહ્મવર્ચસને પ્રાણશક્તિની સાથે (अदाः) પ્રદાન કર. (૧)
     

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : હે સ્વયં પ્રકાશમાન તથા અન્યોને પ્રકાશિત કરનાર અગ્નિ-અગ્રણી પરમાત્મન્ ! તારા ગુણોને પ્રકાશિત કરતી વાણી મારા મુખમાં પ્રાપ્ત છે. તે તારી સ્તુતિ કરતી રહે છે; એના બદલામાં તું તારા દર્શન માટે અમારે માટે પુષ્ટિ, સ્વાસ્થ્ય, પ્રાણશક્તિ અને બ્રહ્મવર્ચસ (બ્રહ્મજ્ઞાનથી ઉત્પન્ન થતું તેજ) પ્રદાન કર. (૧)
     

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    تاکہ ہم آپ کا درشن کر سکیں!

    Lafzi Maana

    چاروں طرف روشنی پھیلائے ہوئے نُور جہاں اگنی پرماتما! ہماری زبانیں آپ کی عظمت گاتی ہوئیں ہمیں سُکھی کر دیتی ہیں۔ آپ تو دُنیا کے والی اور بسانے والے اوصاف حمیدہ کے بھنڈار ہیں، اِس لئے انسانی جامہ پہنا کر روحانی دودھ امرت دھن اور برہم تیج ہمیں دے دیا ہے تاکہ ہم آپ کا درشن کر سکیں!

    Tashree

    اگنی دیو یہ زباں ہماری گاتی آپ کی مہما نیاری، امرت دھن پانے کا جامہ دیکر کی بخشش ہے بھاری۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    जसा जगदीश्वर माणसांना जल, दूध, तूप, ज्ञान इत्यादी व यज्ञाग्नी वृष्टी, जल, बल, बुद्धी, दीर्घायुष्य इत्यादी देतो, तसेच आचार्यांनी ही शिष्यांना वेदविद्या, सदाचार, ब्रह्मतेज इत्यादी प्रदान केले पाहिजे व राजाने राष्ट्रात ब्राह्मण क्षत्रिय व वैश्यांची उन्नती करून प्रजेला सुखी केले पाहिजे ॥१॥

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    विषय

    अग्नी देवता। अग्नी नावाने परमेश्वर, आचार्यन राजा यांची प्रार्थना

    शब्दार्थ

    (प्रथम अर्थ) परमात्मपर) (समिधान) अतिशय प्रकाशवान (कीर्तिवान) (दीदिवः) सर्वांना प्रकाशित करणारे (प्रेरणा व उत्साह देणारे) हे (अग्ने) जगन्नायक परमेश्वर, तुमच्या कृपेने (आसनिअन्तः) आमच्या मुखात (भ्राजन्ती) शोभित होणारी (जिह्वा) जीभ (चरति) विविध रसांचा आस्वाद घेत आहे आणि शब्दांचे उच्चारण करीत आहे. (वसुविव्) ऐश्वर्य देणारे (सः) (त्वम्त) असे तुम्ही, हे (अग्ने) परमेश्वर, (नः) आम्हाला (पयसा) दूध, जल, घृत आदींनी संयुक्त असे (रयिम्) धन सः देत आहात आणि (दृशे) कर्तव्य अरूर्तव्यचा निर्णय करण्यासाठी (वर्चः) ज्ञानरूप तेज (दाः) देत आहात वा दिलेले आहा.।। द्वितीय अर्थ - (आचर्यपर) अग्निरूप आचार्यात स्वतःला झोकून देण्यासाठी (विद्या-प्राप्तीसाठी) गुरूकुलात देणारे सश्रद्ध शिष्य हाती समिधा धरून आचार्यास विनंती करीत आहेत. (समिधान) स्वतः ज्ञानाने प्रदीप्त आणि (दीदिवः) शिष्यांना ज्ञानाने प्रदीप्त करणाऱ्या हे (अग्ने) विद्वान, आचार्यप्रवर, तुमच्या (आसानि अन्तः) मुखात (भ्राजन्ती) शास्त्रांचा उपदेश करणारी म्हणूनच कीर्तीने चमकणारी (जिह्वा) जिह्वा (चरति) शब्दोच्चारणासाठी ताल, दंत आदी स्थानांत संचार करते. (सः) असे महिमावान (वसुवित्) आम्हाला विविध विद्याधन देणारे (त्वम्) तुम्ही हे आचार्यप्रवर, (नः) आम्हा शिष्यांना (दृशे) कर्तव्य जाणून घेण्यासाठी (वयस्त) वेदज्ञानरूप दुधासह (रयिम्) सदाचाररूप संपदा आणि (वर्चः) ब्रह्मवर्चस्व (दाः) द्या.।। तृतीय अर्थ - (राजापर) सिंहासनावर आसीन राजाला उद्देशून प्रजाजन म्हणत आहेत- (समिधान) राजोचित प्रतापाने देदीप्यमान तसेच (दीदिवः) प्रजेला आपल्या यशाने प्रदीप्त करणारे हे (अग्ने) अग्रनायक राजा, (आस नि अन्तः) तुमच्या धनुष्यावर (भ्राजन्ती) चमकणारी (जिह्वा) दोरर (चरति) चालते म्हणजे ओढली जाते सुटते आणि बाण फेकते. (सः) असे ते (वसुवित्) प्रजाननांना निवासस्थान देणारे (त्वम्) तुम्ही (अग्ने) अग्निसम तळपणारे हे जाज्वल्यवान राष्ट्राधिपती, (दृशे) राष्ट्राच्या ख्यातीसाठी प्रजेला (पयसा) दूध आदी रसांसह (रयिम्) धन, धान्य आदी संपत्ती आणि (वर्चः) ब्राह्म तेज (दाः) प्रदान करा.।। चतुर्थ अर्थ - (यज्ञाग्नीपर) यजमान म्हणत आहेत- (समिधान) प्रज्वलित व (दीदिवः) याज्ञिकाला तेजाने प्रज्वलित (उत्साहित) करणारी हे (अग्ने) यज्ञाग्नी, (आसनि अन्तः) यज्ञकुंडरूप मुखात (भ्राजन्ती) दीप्तिमान असणारी (जिह्वा) तुझी ज्वालारूप जीभ (चरति) फडफड करीत आहे. (सः) ती (वसुवित्) हविरूप धन प्राप्त करणारी (त्वम्) तू हे (अग्ने) यज्ञाग्नी, (पयसा) वृष्टिजलासह (रयिम्) धान्य-संपदा तसेच शक्ती, बुद्धी, दीर्घायू आदी रूप धन आम्हाला दे आणि (दृशे) पाहण्यासाठी (वर्चः) प्रकाश (दाः) दे.।। मुण्डक उपनिषदाच्या ऋषीने अग्नीच्या विविध जिह्वा याप्रकारे सांगितल्या आहेत- काली, कराली, मनवत, वेगवती, अत्यंत लाल, धुरकट रंगाच्या ठिणग्या सोडणारी आणि सर्व रंगाच्या ज्वाळा, या सात जिह्वा अग्नीच्या आहेत. (मुण्डक २/४) अग्नीच मुख आणि जिह्वा यांचे वर्णन असल्यामुळे येथे यज्ञाग्नीपर अर्थ करताना असं वेधात संबंध दाखविला आहे. त्यामुळे येथे अतिशयोक्ती अलंकार आहे.।।१।।

    भावार्थ

    ज्याप्रमाणे जगदीश्वर मनुष्यांना जल, दूध, घृत, ज्ञान आदी देतो आणि यज्ञाग्नी मनुष्यांना वृष्टी, जल, बल, बुद्धी व दीर्घायुष्य आदी देतो, तद्वत आचार्याने शिष्यांना वेदविद्या, सदाचार ब्रह्मतेज आदी दिले पाहिजेत आणि राजाने राष्ट्रात ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्यांची उन्नती घडवीत सर्व प्रजेला आनंदी केले पाहिजे.।।१।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    அக்கினியே! ருக்குக்களால் எழுச்சியாகும் சோதியாயுள்ளவனே ! நடுவிலே பிரகாசமாய் [1]நாக்கு சஞ்சரிக்கிறது. ஐசுவரியங்களைக் காணும் நீ எங்களுக்கு புஷ்டியோடான ஐசுவர்யத்தை பலத்தை அளிக்கவும்.

    FootNotes

    [1]நாக்கு சஞ்சரிக்கிறது- வாணியான வேதம் விளங்குகிறான்

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