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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 645
ऋषिः - प्रजापतिः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - विराडनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम - 0
21
यो꣢꣯ मꣳहि꣢꣯ष्ठो मघोनामꣳशुर्न शोचिः । चि꣡कि꣢त्वो अ꣣भि꣡ नो꣢ न꣣ये꣡न्द्रो꣢ विदे꣢꣯ तमु꣢꣯ स्तुहि ॥६४५
स्वर सहित पद पाठयः꣢ । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठः । म꣣घो꣡ना꣢म् । अँ꣣शुः꣢ । न । शो꣣चिः꣢ । चि꣡कि꣢꣯त्वः । अ꣣भि꣢ । नः꣣ । नय । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । वि꣣दे꣢ । तम् । उ꣣ । स्तुहि ॥६४५॥
स्वर रहित मन्त्र
यो मꣳहिष्ठो मघोनामꣳशुर्न शोचिः । चिकित्वो अभि नो नयेन्द्रो विदे तमु स्तुहि ॥६४५
स्वर रहित पद पाठ
यः । मँहिष्ठः । मघोनाम् । अँशुः । न । शोचिः । चिकित्वः । अभि । नः । नय । इन्द्रः । विदे । तम् । उ । स्तुहि ॥६४५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 645
(कौथुम) महानाम्न्यार्चिकः » प्रपाठक » ; अर्ध-प्रपाठक » ; दशतिः » ; मन्त्र » 5
(राणानीय) महानाम्न्यार्चिकः » अध्याय » ; खण्ड » ;
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(कौथुम) महानाम्न्यार्चिकः » प्रपाठक » ; अर्ध-प्रपाठक » ; दशतिः » ; मन्त्र » 5
(राणानीय) महानाम्न्यार्चिकः » अध्याय » ; खण्ड » ;
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में परमात्मा का वर्णन करके उसकी स्तुति के लिए मनुष्यों को प्रेरणा दी गयी है।
पदार्थ
(यः) जो आप (मघोनाम्) धनियों में (मंहिष्ठः) सबसे अधिक दानी हैं और (अंशुः न) सूर्यकिरण के समान (शोचिः) तेजस्वी हैं, वह, हे (चिकित्वन्) ज्ञानी, जागरूक परमात्मन् ! आप (नः अभि) हमारी ओर भी (नय) इन दान, तेज, ज्ञान, जागरूकता आदि को लाइए। हे मनुष्य ! (इन्द्रः) परमेश्वर (विदे) उपकार करना जानता है, (तम् उ) उसी को (स्तुहि) स्तुति से सम्मानित कर ॥५॥ इस मन्त्र में ‘अंशुः न शोचिः’ में उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थ
जो जगदीश्वर परम दानी, परम तेजस्वी, परम विद्वान्, परम जागरूक और परम परोपकारी है, उसकी उपासना करके सबको दानी, तेजस्वी, विद्वान्, जागरूक और परोपकारी बनना चाहिए ॥५॥
पदार्थ
(मघोनां मंहिष्ठः-यः) धनवानों में अत्यन्त दानी जो परमात्मा है (अंशुः-न शोचिः) अंशुमान्—रश्मि वाले सूर्य के समान प्रकाशमान है (चिकित्वः) वह तू ज्ञानवन् परमात्मन् (नः-अभि नय) हमें ले चल (इन्द्रः-विदे) ऐश्वर्यवान् परमात्मा हमें ज्ञान दे—देता है अतः (तम्-उ स्तुहि) हे मन! तू उसकी स्तुति कर।
भावार्थ
धन वालों में अत्यन्त दानदाता परमात्मा ही है, जो भोग भी देता है, भोग के साधन भी देता है—सूर्य समान तेजस्वी या प्रकाशमान है। योगी के अन्दर उसका ही प्रकाश होता है। वह ज्ञानवान् हुआ हमें ले जाता है। “अग्ने नय” इस प्रकार हमें ले जाता है। उस ऐसे परमात्मा की रे मन स्तुति कर॥५॥
विशेष
<br>
विषय
दाता ही चमकता है
पदार्थ
(यः) = जो (मघोनाम्) = ऐश्वर्यशालियों में (मंहिष्ठः) = सर्वाधिक दान देनेवाला है, वही (अंशुः नः) = सूर्य-किरणों के समान (शोचिः) = चमकवाला होता है। धन स्वयं चमकीला है इसकी चमक से मनुष्य मुग्ध होकर इसे जुटाने में जुट जाता है। इसे जुटाकर वह अपनी चमक को मध्यम कर लेता है। उससे सत्य का स्वरूप छिप जाता है। कृपण धनी की क्या संसार में कोई शोभा रहती है? हाँ, धनी बनकर यदि वह खूब देनेवाला बनता है तो वह चमकने लगता है। ('जुहोत प्र च तिष्ठत )= दान दो और शोभा पाओ। दान के अनुपात में ही शोभा बढ़ती है। यह दातृतम बनता है और सूर्य - किरणों के समान चमकने लगता है।
अब यह प्रकृति के पीछे भागते रहने को ठीक नहीं समझता और प्रार्थना करता है कि हे (चिकित्वः) = ज्ञान - सम्पन्न गुरो ! (नः) = हमें (अभिनय) = धर्म के मार्ग की ओर ले चलो। इसकी इस प्रार्थना पर गुरु उसे कहते हैं कि (इन्द्रः) = प्रभु ही (विदे) = ज्ञानी हैं (तम् उ स्तुहि) = उसकी ही स्तुति करो। मुझे प्रभु जितना मार्ग दिखाएँगे, मैं तो उतना ही तुम्हारा पथप्रदर्शन कर पाऊँगा। अन्त में सभी के मार्ग-दर्शक वे प्रभु ही हैं।
भावार्थ
प्रभुकृपा से हम उत्तम मार्गदर्शक पाकर धनों की ममता से ऊपर उठें।
विषय
"Missing"
भावार्थ
( यः ) = जो ( मघोनां ) = समस्त ऐश्वर्य वालों में ( मंहिष्ठः ) = सबसे बड़ा दाता है वही ( अंशुः न ) = समस्त संसार में अपनी प्रसरणशील रश्मियों से व्यापक सूर्य के समान ( शोचिः ) = शुद्ध, कान्तिमान् है। हे ( चिकित्वः ) = सर्वज्ञ ! आप ( इन्द्र: ) = समस्त ऐश्वर्यशाली ( नः ) = हमें भी ( विदे ) = ज्ञान और बल को प्राप्त कराने के लिये ( अभि नय ) = आगे ले चलो। हे मनुष्य ! तू ( तम् ) = उसकी ही ( स्तुहि ) = स्तुति कर ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - प्रजापतिः।
देवता - इन्द्रस्त्रैलोक्यात्मा ।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ परमात्मानमुपवर्ण्य तत्स्तवनाय जनान् प्रेरयति।
पदार्थः
(यः) यस्त्वम्, (मघोनाम्) धनवताम् (मंहिष्ठः) दातृतमः असि, किञ्च (अंशुः न) सूर्यरश्मिः इव (शोचिः) शोचिष्मान् असि, सः हे (चिकित्वः) ज्ञानवन्, सदा जागरूक परमात्मन् ! त्वम् (नः अभि) अस्मान् प्रति (नय) दातृत्वतेजोज्ञानजागरूकत्वादिकं प्रापय। हे मनुष्य ! (इन्द्रः) परमेश्वरः (विदे) उपकर्तुं जानाति, (तम् उ) तमेव (स्तुहि) स्तुत्या सभाजय ॥ (शोचिः) अत्र मत्वर्थीयस्य लोपः। (चिकित्वः) कित ज्ञाने, लिटः क्वसुः सम्बुद्धौ ‘मतुवसो रु सम्बुद्धौ छन्दसि’ अ० ८।३।१ इति रुत्वम्। (विदे) विद ज्ञाने, आत्मनेपदं छान्दसम्, ‘वित्ते’ इति प्राप्ते ‘लोपस्त आत्मनेपदेषु’ अ० ७।१।४१ इति तलोपः ॥५॥ अत्र ‘अंशुर्न शोचिः’ इत्युपमालङ्कारः ॥५॥
भावार्थः
यो जगदीश्वरः परमो दाता, परमस्तेजस्वी, परमो विद्वान्, परमो जागरूकः, परमः परोपकर्ता च विद्यते तमुपास्य सर्वैर्दातृभिस्तेजस्विभिर्विद्भिर्जागरूकैः परोपकर्तृभिश्च भाव्यम् ॥५॥
इंग्लिश (2)
Meaning
He is most charitable amongst all the wealthy people. He is pure like the Sun. O Omniscient and Glorious God, lead us on for acquiring knowledge and strength. Praise Him alone, O man.
Meaning
Thus, O lord most potent, most adorable, wielder of the thunderbolt, destroyer of the wicked, thus do we celebrate and exalt you for gifts of wealth, honour and progress, thus do you too feel pleased. O lord most glorious of thunderous justice, listen, accept the sea do rations and be gracious to bless us.
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (मघोनां मंहिष्ठः यः) ધનવાનોમાં અત્યંત દાની જે પરમાત્મા છે (अंशुः न शोचिः) કિરણવાળા સૂર્યની સમાન પ્રકાશમાન છે. (चिकित्वः) તે તું જ્ઞાનવાન પરમાત્મન્ (नः अभि नय) અમને લઈને ચાલ (इन्द्रः विदे) ઐશ્વર્યવાન પરમાત્મા અમને જ્ઞાન પ્રદાન કર-આપે છે. તેથી (तम् उ स्तुहि) હે મન ! તું તેની સ્તુતિ કર. (૫)
भावार्थ
ભાવાર્થ : ધનવાનોમાં અત્યંત દાનદાતા પરમાત્મા જ છે, જે ભોગ પણ આપે છે અને ભોગના સાધનો પણ આપે છે-સૂર્ય સમાન તેજસ્વી અર્થાત્ પ્રકાશમાન જ છે. યોગીની અંદર તેનો જ પ્રકાશ થાય છે. તે જ્ઞાનવાન બનેલાં અમને લઈ જાય છે. "अग्ने नय" એ રીતે અમને લઈ જાય છે. તે એવા પરમાત્માની અરે મન સ્તુતિ કર. (૫)
उर्दू (1)
Mazmoon
اُس کی پُوجا نِت کِیا کر!
Lafzi Maana
جو اِندر پرمیشور بے کنار دھنوں کا مالک ہے، سُورج کی طرح دانی ہو کر چاروں طرف چمک رہا ہے۔ اے عابد! تُو اُس مہا دھنی پرمیشور کی پُوجا کیا کر، ہے عالمِ کُل اِیشور ہمیں اپنی طرف لے چل، جس سے ہم زندگی میں فیض یاب ہو سکیں!
Tashree
نُور کا دریا بہاتا دان کرتا اِیشور، ہے وہی معبود سب کا اُس کی تُو پُوجا کیا کر۔
मराठी (2)
भावार्थ
जो जगदीश्वर परम दानी, परम तेजस्वी, परम विद्वान, परम जागरूक व परम परोपकारी आहे, त्याची उपासना करून सर्वांनी दानी, तेजस्वी, विद्वान, जागरूक व परोपकारी बनले पाहिजे ॥५॥
विषय
परमेश्वराचे वर्णन करून नंतर त्याच्या स्तवनाविषयी प्रेरणा
शब्दार्थ
(यः) हे जे आपण (मघोनाम्) धनिकांपैकी (मंहिष्ठः) सर्वाहून श्रेष्ठ दानी आहात आणि (अंशुनः) सूर्याप्रमाणे (शोचिः) तेजस्वी आहात. असे हे (चिकित्वन्त) ज्ञानी, जागरूक परमेश्वर, आपण (नःअभि) आमच्याकडे (नय) दान, तेज, जागरूकपणा आदी वस्तू वा गुण आणा (आम्हास द्या) (पुढे मनुष्याला उपदेश केला आहे) हे मनुष्य, (इन्द्रः) परमेश्वर (विंदे) उपकार करणे जाणतो. तू (तम् उ) त्यालाच (स्तुहि) वंदन कर, त्याची स्तुती करून त्याला सम्मानित कर.।।५।।
भावार्थ
जो जगदीश्वर परम दानी, परम तेजस्वी, परम विद्वान, परम जागरूक आणि परम परोपकारी आहे, सर्वांनी त्याची उपासना करून त्याद्वारे दानी, तेजस्वी, विद्वान, जागरूक व परोपकारी व्हायला पाहिजे.।।
विशेष
या मंत्रात ङ्गअंशुः न शोचिःफ या कथनात उपमा अलंकार आहे.।।५।।
तमिल (1)
Word Meaning
எவன் ஐசுவரியங்களில் சூரினைப்போல் சோதியுள்ளவனா யிருக்கிறானோ (அவனை நாடுகிறோம்.) சர்வக்ஞனே ! இந்திரனான நீ ஞானத்தின் பொருட்டு முன் அழைத்துச் செல்லவும். அவனையே நீங்கள் துதிக்கவேண்டும்.
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