Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 731
ऋषिः - त्रिशोकः काण्वः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
21
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ वृषभा सु꣣ते꣢ सु꣣त꣡ꣳ सृ꣢जामि पी꣣त꣡ये꣢ । तृ꣣म्पा꣡ व्य꣢श्नुही꣣ म꣡द꣢म् ॥७३१॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣भि꣢ । त्वा꣣ । वृषभ । सुते꣢ । सु꣣त꣢म् । सृ꣣जामि । पीत꣡ये꣢ । तृ꣣म्प꣢ । वि । अ꣣श्नुहि । म꣡दम्꣢꣯ ॥७३१॥
स्वर रहित मन्त्र
अभि त्वा वृषभा सुते सुतꣳ सृजामि पीतये । तृम्पा व्यश्नुही मदम् ॥७३१॥
स्वर रहित पद पाठ
अभि । त्वा । वृषभ । सुते । सुतम् । सृजामि । पीतये । तृम्प । वि । अश्नुहि । मदम् ॥७३१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 731
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 7; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 2; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 7; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 2; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
Acknowledgment
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क १६१ पर परमात्मा तथा गुरु-शिष्य के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ अपने अन्तरात्मा को सम्बोधन है।
पदार्थ
हे (वृषभ) शक्तिशाली मेरे अन्तरात्मन् ! (सुते) इस उपासना-यज्ञ के प्रवृत्त होने पर (त्वा अभि) तेरे प्रति (पीतये) पान करने के लिए (सुतम्) श्रद्धा-रस (सृजामि) उत्पन्न कर रहा हूँ। इससे तू (तृम्प)तृप्त हो, (मदम्) हर्ष को (व्यश्नुहि) प्राप्त कर ॥१॥
भावार्थ
सबको चाहिए कि अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर उसके अन्दर श्रद्धा-रस का सञ्चार करें ॥१॥
टिप्पणी
(देखो अर्थव्याख्या मन्त्र संख्या १६१)
विशेष
ऋषिः—काण्वस्त्रिशोकः (मेधावी से सम्बद्ध मन आत्मा परमात्मा ज्योतियों से सम्पन्न)॥ देवता—इन्द्रः (ऐश्वर्यवान् परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥<br>
विषय
त्रिशोक
पदार्थ
त्रिशोक ऋषि वह है जो मस्तिष्क, मन व शरीर तीनों को ही [त्रि] दीप्त [शोक- शुच दीप्तौ] बनाता है। यह प्रभु से कहता है कि हे (वृषभ) = सब सुखों की - उत्तम पदार्थों की वर्षा करनेवाले प्रभो ! (सुते) = इस उत्पन्न जगत् में (त्वा अभि) = मैं प्रत्येक कार्य करने से पूर्व आपको देखता हूँ। I Look up to You. आपकी स्वीकृति होने पर ही कार्य करता हूँ ।
१. मेरा मुख्य कार्य तो यह है कि मैं (पीतये) = रक्षा के लिए (सुतम्) = ज्ञान को (सृजामि) = उत्पन्न करता हूँ । जैसे कोई व्यक्ति किसी भी फल से रस को निकालता है, वह रस 'सुत' कहलाता है; इसी प्रकार ‘प्रणिपात, परिप्रश्न व सेवा' के द्वारा इस ज्ञान का भी सेवन हुआ करता है । ज्ञान आचार्य से शिष्य की ओर प्रवाहित होता है । इस सारी भावना को व्यक्त करने के लिए ही ज्ञान को 'सुत' कहा गया है। यह उत्पन्न ज्ञान मस्तिष्क को दीप्त करता है । यह वह ललाट-नेत्र होता है, जिसकी ज्योति में काम आदि वासनाओं का अन्धकार नष्ट हो जाता है।
। २. त्रिशोक अपने मन से कहता है कि (तृम्प) = तू तृप्त रह । तू सदा एक तृप्ति का मनुभव कर । मन में सन्तोष हो । असन्तोष मन को भटकाता है— मेरा मन भटके नहीं। ‘आत्मतृप्ति' महान् साधना है इसके होने पर मन निर्मल व प्रसादयुक्त होता है और मनुष्य के सब दुःखों की हानि हो जाती है।
३. (व्यश्नुहि मदम्) = यह त्रिशोक अपने प्राणमयकोश से कहता है कि तू मद से व्याप्त हो । [अश्=व्याप्तौ] वीर्य की सुरक्षा वैदिक साहित्य में 'इन्द्र का सोमपान' कहलाती है और यह एक अद्भुत मद पैदा करती है । इसके जीवन में एक मस्ती आ जाती है ।
एवं, यह त्रिशोक अपने सूक्ष्म शरीर के तीनों कोशों को क्रमशः ज्ञान, सन्तोष व उत्कृष्ट मद से भरकर, तीन दीप्तियोंवाला होकर 'त्रिशोक' इस नाम को अन्वर्थक बनाता है ।
भावार्थ
मस्तिष्क, मन व प्राण को ज्ञान, सन्तोष व मद से पूर्ण करके हम 'त्रिशोक' बनें ।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = (१) व्याख्या देखो अवि० सं० [१६१] पृ०[८९] ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - त्रिशोक:। देवता - इन्द्र। स्वरः - षड्ज: ।
संस्कृत (1)
विषयः
तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके १६१ क्रमाङ्के परमात्मपक्षे गुरुशिष्यपक्षे च व्याख्याता। अत्र स्वान्तरात्मानमाह।
पदार्थः
हे (वृषभ) शक्तिशालिन् ममान्तरात्मन् ! (सुते) प्रवृत्तेऽस्मिन् उपासनायज्ञे (त्वा अभि) त्वां प्रति (पीतये) पानाय (सुतम्)श्रद्धारसम् (सृजामि) उत्पादयामि। एतेन त्वम् (तृम्प) तृप्तिं लभस्व, (मदम्) हर्षम् (व्यश्नुहि) प्राप्नुहि ॥१॥
भावार्थः
सर्वैः स्वान्तरात्मानमुद्बोध्य तस्मिन् श्रद्धासः सञ्चारणीयः ॥१॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ८।४५।२२, अथ० २०।२२।१, साम० १६१।
इंग्लिश (2)
Meaning
O rain-pouring Sun, on the Soma being prepared, for thy gratification, I pour its juice in oblations. Sate thee and drink it deep I
Translator Comment
The Sun receives the Sama in its rarefied farm after the performance of Homa. It returns it in the shape of rain. This verse is the same as 161.
Meaning
Lord of generous and creative power, when the yajna is on and soma is distilled, I prepare the cup and offer you the drink. Pray accept, drink to your hearts content and enjoy the ecstasy of bliss divine. (Rg. 8- 45-22)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (वृषभ) હે સુખોની વર્ષા કરનાર પરમાત્મન્ ! (सुते) ઉપાસનારસ ઉત્પન્ન થતાં (पीतये) પાન કરવા - સ્વીકાર કરવા માટે (सुतम्) ઉત્પન્ન ઉપાસનારસને (त्वा) તારા પ્રત્યે (अभिसृजामि) ભેટ ધરું છું, (तृम्प) મને તૃપ્ત કર, (मदं व्यश्नुहि) મને હર્ષ-આનંદને પ્રાપ્ત કરાવ. (૭)
भावार्थ
ભાવાર્થ : સુખોની વર્ષા કરનાર પરમાત્મન્ ! ઉપાસનાથી ઉત્પન્ન રસનો સ્વીકાર કરવા માટે તારા પ્રત્યે ભેટ ધરું છું, નિઃસંદેહ તું પણ મને તૃપ્ત કરે છે, તારો આનંદ પ્રાપ્ત કરાવે છે. (૭)
मराठी (2)
भावार्थ
सर्वांनी आपल्या अंतरात्म्याला उद्बोधन करून त्यात श्रद्धा-रसाचा संचार करावा ॥१॥
विषय
प्रथम ऋचेची पूर्वार्चिक भागातील क्र. १६१ वर परमेश्वर आणि गुरुशिष्याविषयी केली आहे. इथे उपलब्ध आपल्या अंतरात्म्याला उद्देशून सांगत आहे -
शब्दार्थ
हे (वृषभ) शक्तीमान अशा माझ्या अंतरात्मा, (सुते) हा उपासना यज्ञ करीत असता मी (उपासक) (त्वा अभि) तुझ्यासाठी (पीतये) आस्वाद घेण्याकरीता (सुतम्) हा श्रद्धा रूप रस उत्पन्न करीत आहे. तू हा रस पिऊन (तृभ्य) तृप्त हो आणि (मदम्) हर्ष (व्यश्वुहि) प्राप्त कर. ।।१।।
भावार्थ
सर्वांनी आपल्या अंतरात्म्याला नेहमी उद्बोधन देत राहावे. (मनात उत्साह, आशा, कार्यप्रवणत्य यांना जागृत ठेवावे.) तसेच आत्म्यात श्रद्धाभाव उत्पन्न होऊ द्यावा. ।।१।।
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal