Loading...

सामवेद के मन्त्र

  • सामवेद का मुख्य पृष्ठ
  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 737
    ऋषिः - विश्वामित्रो गाथिनः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    30

    इ꣣द꣡ꣳ ह्यन्वोज꣢꣯सा सु꣣त꣡ꣳ रा꣢धानां पते । पि꣢बा꣣ त्वा꣢३स्य꣡ गि꣢र्वणः ॥७३७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ꣣द꣢म् । हि । अ꣡नु꣢꣯ । ओ꣡ज꣢꣯सा । सु꣣त꣢म् । रा꣣धानाम् । पते । पि꣡ब꣢꣯ । तु । अ꣣स्य꣢ । गि꣣र्व꣡णः । गिः । वनः ॥७३७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इदꣳ ह्यन्वोजसा सुतꣳ राधानां पते । पिबा त्वा३स्य गिर्वणः ॥७३७॥


    स्वर रहित पद पाठ

    इदम् । हि । अनु । ओजसा । सुतम् । राधानाम् । पते । पिब । तु । अस्य । गिर्वणः । गिः । वनः ॥७३७॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 737
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 9; मन्त्र » 1
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क १६५ पर परमात्मा के विषय में की गयी थी। यहाँ अपने अन्तरात्मा को सम्बोधन है।

    पदार्थ

    हे (राधानां पते) सदिच्छा, महत्वाकांक्षा, सत्प्रयत्न, सुख, ज्ञान आदि के स्वामी मेरे अन्तरात्मन् ! (इदं हि) यह ब्रह्मानन्द-रस (ओजसा) बल और वेग के साथ (अनु सुतम्) अनुकूल रूप में अभिषुत हुआ है। हे (गिर्वणः) वाणियों से प्रभुभक्ति में संलग्न आत्मन् ! तू (अस्य) इस ब्रह्मानन्दरूप सोमरस को (तु) शीघ्र (पिब) पान कर ले ॥१॥

    भावार्थ

    योग का अनुष्ठान करने से ब्रह्मानन्द के रस की धारा जब आत्मा को व्याप लेती है, तब योगी कृतकृत्य हो जाता है ॥१॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    टिप्पणी

    (देखो अर्थव्याख्या मन्त्र संख्या १६५)

    विशेष

    ऋषिः—विश्वामित्रः (सब का मित्र उपासक)॥ देवता—इन्द्रः (ऐश्वर्यवान् परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥<br>

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    राधा-पति

    पदार्थ

    प्रभु कहते हैं कि (इदम्) = यह सोम [वीर्य-शक्ति] (हि) = निश्चय से (ओजसा) = ओज के दृष्टिकोण

    से (अनुसुतम्) = रस-रुधिरादि के क्रम से तेरे शरीर में उत्पन्न की गयी है। (राधानां पते) = हे सफलताओं के स्वामिन्! [राध्=-सिद्धि] (पिब तु अस्य) = निश्चय से तू इसका पान कर। इसका पान ही तुझे संसार में सफल बनाएगा । जीव को 'राधानां पते' शब्द से सम्बोधन करना उसे प्रेरणा देने के लिए है कि तूने सफल बनना है। इसे सफल बनाने का साधन सोम का पान है।

    सोम के पान के लिए साधना का संकेत 'गिर्वणः' शब्द में है । 'गिर्वणः' का अर्थ है कि गिराओं से—वेद-वाणियों से अथवा गिरा से - वाणी से प्रभु का सम्भजन करनेवाला । प्रभु के नाम का जप मनुष्य के मन को विषयों की प्रवृत्ति से रोकता - बचाता है और इस प्रकार उसे सोम-पान के योग्य बनाता है ।

    एवं, सोमपान का साधन तो प्रभु के नाम का जप व वेदवाणियों का सेवन है और इसका साध्य 'सफलता' है।

    भावार्थ

    मैं प्रभु के नाम के जप व वेदवाणियों के सेवन द्वारा सोम-पान करता हुआ सदा राधा=सिद्धि का पति बनँञ ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = (१) व्याख्या देखो अवि० सं० [१६५] पृ० ९२।।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - विश्वामित्र:। देवता - इन्द्र:। स्वरः - षड्ज: ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    विषयः

    तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके १६५ क्रमाङ्के परमात्मविषये व्याख्याता। अत्र स्वात्मानं सम्बोधयति।

    पदार्थः

    हे (राधानां पते) सदिच्छामहत्त्वाकाङ्क्षासत्प्रयत्नसुखज्ञानादीनां स्वामिन् मदीय अन्तरात्मन् ! (इदं हि) एष खलु ब्रह्मानन्दरसः (ओजसा) बलेन वेगेन च (अनु सुतम्) आनुकूल्येन अभिषुतः अस्ति। हे (गिर्वणः) गीर्भिः प्रभुभक्तिपरायण आत्मन् ! [गीर्भिः वनति संभजते यः स गिर्वणाः, तत्सम्बुद्धौ।] त्वम् (अस्य) एतं ब्रह्मानन्दरूपं सोमरसम् (तु) शीघ्रम् (पिब) आस्वादय ॥१॥२

    भावार्थः

    योगानुष्ठानेन ब्रह्मानन्दरसप्रवाहसन्ततिर्यदाऽऽत्मानं व्याप्नोति तदा योगी कृतकृत्यो जायते ॥१॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ३।५१।१०, साम० १६५। २. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिणा मन्त्रोऽयं राजविषये व्याख्यातः।

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O King, the lord of riches, worthy of praise drink this Soma juice, prepared with exertion !

    इस भाष्य को एडिट करें

    Meaning

    O lord and ruler of wealth, power and potential, drink the exciting soma of this generous yajamana, elaborately distilled with vigour and splendour and offered with the voice of homage and reverence. (Rg. 3-51-10)

    इस भाष्य को एडिट करें

    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (गिर्वणः राधानां पते) હે સ્તુતિ વચનો દ્વારા વનનીય-સમ્માનીય, સેવનીય તથા અમારી સમસ્ત આરાધનાઓના પાલક-કોઈપણ આરાધનાને વ્યર્થ ન જવા દેનાર પરમાત્મન્ ! (अनु ओजसा हि सुतम् इदम्) અનુક્રમપૂર્વક-શ્રવણ, મનન કરીને પુનઃ નિદિધ્યાસન બળથી ઉપાસનારસને ઉત્પન્ન કરેલ છે. (अस्य तु पिब) એનું તું અવશ્ય પાન કર-એનો સ્વીકાર કર. (૧)

     

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : પરમાત્માન્ ! તું ઉપાસકોની સમસ્ત આરાધનાઓનું પાલન સ્વાગત કરે છે, કોઈની પણ ઉપેક્ષા કરતો નથી, વ્યર્થ જવા દેતો નથી તથા સ્તુતિ દ્વારા સન્માનીય સેવનીય છે, અમે તારું સ્તુતિ દ્વારા જ સેવન કરી શકીએ છીએ, અન્ય ભૌતિક પદાર્થો તો તારા જ આપેલા છે, તેની તને શું ભેટ આપવી, તને તેની જરૂરત પણ નથી, તેથી જે અમે શ્રવણ, મનન અને ફરી નિદિધ્યાસન રૂપથી પૂર્ણ પ્રયત્નબળ દ્વારા ઉપાસનારસ સંપન્ન કરેલ છે, તેનું અવશ્ય પાન કર-સ્વીકાર કર, એવી પ્રાર્થના છે. (૧)
     

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (2)

    भावार्थ

    योगाचे अनुष्ठान करून ब्रह्मानंदाच्या रसाची धारा जेव्हा आत्म्याला व्यापते तेव्हा योगी कृतकृत्य होतो ॥१॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    प्रथम ऋचेची व्याख्या पूर्वार्चिक भागात क्र. १६५ वर केली आहे. तिथे या ऋचेचा अर्थ परमात्मपर केला आहे. इथे साधक आपल्या अंत:करणाला उद्देशून म्हणत आहे.

    शब्दार्थ

    (राधानां पते) सदिच्छा, महत्वाकांक्षा, सत्ययत्न, सुख, ज्ञान आदींचा स्वामी असलेल्या हे माझ्या अंतरात्मा (इदं हि) हा ब्रह्मानंद रस (ओजसा) शक्तीने आणि वेगाने (अनुसुतम्) आपणास पाहिजे त्या रूपात अभिषुत झाला आहे (माझ्या हृदयात ते ब्रह्मज्ञान उदित झाले आहे) गिर्वण: वाणीद्वारे प्रभु भक्तीचे गायन करणाऱ्या हे माझ्या अंत:करणा तू (अस्य) या ब्रह्मानंद रूप सोमरसाचा शीघ्र पान कर, पी ।।१।।

    भावार्थ

    योग अनुष्ठानात जेव्हा ब्रह्मानंदाची धारा आत्म्यास व्यापून घेते, तेव्हा योगी कृतकृत्य होतो (धन्य होतो वा आनंदित होतो) ।।१।।

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top