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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 744
    ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    24

    अ꣡नु꣢ प्र꣣त्न꣡स्यौक꣢꣯सो हु꣣वे꣡ तु꣢विप्र꣣तिं꣡ नर꣢꣯म् । यं꣢ ते꣣ पू꣡र्वं꣢ पि꣣ता꣢ हु꣣वे꣢ ॥७४४॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ꣣नु꣢꣯ । प्र꣣त्न꣡स्य꣢ । ओ꣡क꣢꣯सः । हु꣣वे꣢ । तु꣣विप्रति꣢म् । तु꣣वि । प्रति꣢म् । न꣡र꣢꣯म् । यम् । ते꣣ । पू꣡र्व꣢꣯म् । पि꣣ता꣢ । हु꣣वे꣢ ॥७४४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम् । यं ते पूर्वं पिता हुवे ॥७४४॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अनु । प्रत्नस्य । ओकसः । हुवे । तुविप्रतिम् । तुवि । प्रतिम् । नरम् । यम् । ते । पूर्वम् । पिता । हुवे ॥७४४॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 744
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 3; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में परमेश्वर की स्तुति तथा गुरु-शिष्य का विषय है।

    पदार्थ

    प्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। मैं उपासक (प्रत्नस्य) चिरकाल से बने हुए (ओकसः) ब्रह्माण्डरूप घर के (नरम्) नेता, (तुविप्रतिम्) बहुत से पदार्थों का निर्माण करनेवाले तुझ (इन्द्र) जगदीश्वर को (अनुहुवे) अनुकूल करने के लिए पुकारता हूँ, (यं ते) जिस तुझ जगदीश को (पूर्वम्) पहले (पिता) मेरा पिता (हुवे) पुकारा करता था ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। हे बालक ! मैं तेरा चाचा आदि (तुविप्रतिम्) बहुत सी विद्याओं की प्रतिमूर्ति, (प्रत्नस्य) पुरातन (ओकसः) विद्यागृह के (नरम्) नेता आचार्य को (अनु) अनुकूल करके, तेरे पढ़ाने तथा सदाचार सिखाने के लिए (हुवे) पुकारता हूँ, (यम्) जिस आचार्य को (पूर्वम्) पहले (ते) तेरा (पिता) पिता अन्य बालकों को पढ़ाने के लिए (हुवे) पुकारता रहा है ॥२॥

    भावार्थ

    सब मनुष्यों को परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए और बालकों के संरक्षक पिता, चाचा आदि को चाहिए कि विद्या पढ़ने के लिए बालकों को सुयोग्य गुरु के पास भेजें, जिससे वे विद्वान् होकर कुशल नागरिक बनें ॥२॥

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    पदार्थ

    (प्रत्नस्य-ओकसः) दिव् स्थान “असौ वै द्युलोकः प्रत्नम्” [मै॰ १.५.५] “त्रिपादस्यामृतं दिवि” [ऋ॰ १०.९०.३] मोक्ष स्थान के (अनु) ऊपर वर्तमान (तुविप्रतिम्) बहुतों के प्रतिपालक—बहुतेरे मुक्तात्माओं को स्वानन्द से पूरण करनेवाले—(नरम्) नेता—स्वामी परमात्मा को (हुवे) मैं आमन्त्रित करता हूँ (यं ते पूर्वं पिता हुवे) जिस “ते-त्वाम् विभक्तिव्यत्ययः” तुझ परमात्मा को पहले भी मेरा पिता आमन्त्रित करता रहा।

    भावार्थ

    मोक्षधाम पर शासक परमात्मा जोकि बहुतेरे मुक्तात्माओं को स्वानन्द से पूरण करनेवाला है उस नेता को उपासक अपने हृदय में आमन्त्रित करें और परम्परा से अपने पूर्वज ब्रह्मा आदि भी आमन्त्रित करते रहे हैं। परम्परा का आदर्श आचरण अथवा हेतु ग्राह्य है “स पूर्वेभिरृषिभिरीड्यो नूतनैरुत” [ऋ॰ १.१.२]॥२॥

    विशेष

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    विषय

    उसी को पुकारें

    पदार्थ

    इस समय हम संसार में भटक रहे हैं । भटकते-भटकते बड़ी देर हो गयी है, अतः घर तो कुछ पुराना-सा हो गया है, परन्तु उस सनातन घर में पहुँचना तो है ही । (प्रत्नस्य ओकसः अनु) = उस सनातन घर का लक्ष्य करके, अर्थात् संसार - यात्रा को पूर्ण करके प्रभु की गोद में पहुँचनेरूप मोक्ष को लक्ष्य करके मैं उस प्रभु को (हुवे) = पुकारता हूँ, जो (तुविप्रतिम्) = महान् पूरण करनेवाले हैं [तुवि=महान्, प्रा= = पूरणे], (नरम्) = जो हमारा पूरण करके निरन्तर हमें आगे और आगे ले जानेवाले हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह सदा प्रभु का आह्वान करे, जिससे उसकी न्यूनताएँ दूर हों और वह आगे बढ़ सके। संसार प्रलोभनों से भरा है, हम इसमें भटक जाते हैं और भटकते ही रहते हैं, घर वापस पहुँचने का ध्यान ही नहीं रहता, अतः मनुष्य को प्रेरणा देते हैं कि हे मनुष्य ! तू उसी प्रभु को पुकार (यम्) = जिसे ते (पिता) = तुम्हारे पिता (पूर्वम्) = तुमसे पहले (हुवे) = पुकारते रहे हैं। अपनी पैतृक संस्कृति को नष्ट क्यों होने देना! पूर्वजों की उत्तम कुल-रीतियों को चलाते चलना ही ठीक है।

    भावार्थ

    अपने पूर्वजों के पदचिह्नों पर चलता हुआ मैं प्रभु का स्मरण करूँ और मोक्ष को अपना लक्ष्य बनाऊँ ।

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = ( २ ) ( प्रत्नस्य ) = बहुत प्राचीन ( ओकस: ) = परम आश्रयरूप मोक्ष के प्रति ( नरं ) = लेजाने वाले ( तुविप्रतिं ) = बहुतों की कामना पूर्ण करने हारे परमेश्वर को ( अनु हुवे ) = पुन:२ प्रतिदिन स्मरण करता हूं । ( यं ) = जिस ( ते ) = तुझको ( पिता ) = हमारे पालन करनेहारे साक्षात गुरु, आचार्य आदि ( पूर्व ) = हमसे पहले ( हुवे ) = स्तुति करते रहे ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - शुन:शेप:। देवता - इन्द्र:। छन्द: - गायत्री। स्वरः - षड्ज: ।

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ परमेश्वरस्तुतिं गुरुशिष्यविषयं चाह।

    पदार्थः

    प्रथमः—परमेश्वरपरः। अहम् उपासकः (प्रत्नस्य) चिरन्तनस्य (ओकसः२) ब्रह्माण्ड-गृहस्य (नरम्) नेतारम्, (तुविप्रतिम्३) बहूनां पदार्थानां प्रतिमातारम् इन्द्रं जगदीश्वरं त्वाम् (अनुहुवे) अनुकूलयितुम् आह्वयामि, (यं ते) यं त्वाम् (पूर्वम्) प्राक् (पिता) मम जनकः (हुवे) आह्वयति (स्म) ॥ द्वितीयः—आचार्यपरः। हे बालक ! अहं त्वदीयः पितृव्यादिः (तुविप्रतिम्) बह्वीनां विद्यानां प्रतिकृतिभूतम्, (प्रत्नस्य) पुरातनस्य (ओकसः) विद्यागृहस्य (नरम्) नेतारम् आचार्यम् (अनु) अनुकूल्य, तवाध्यापनाय सदाचारशिक्षणाय च (हुवे) आह्वयामि, (यम्) आचार्यम् (पूर्वम्) प्राक् (ते) तव (पिता) जनकः, अन्येषां बालकानामध्यापनाय (हुवे) आह्वयति स्म ॥२॥४

    भावार्थः

    सर्वैर्मनुष्यैः परमेश्वर उपासनीयः। किञ्च बालकानां संरक्षकैः पितृपितृव्यादिभिर्विद्याध्ययनाय बालकाः सुयोग्यस्य गुरोः समीपं प्रेषणीयाः, येन ते विद्वांसो भूत्वा कुशला नागरिका भवेयुः ॥२॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० १।३०।९, अथ० २०।२६।३। २. ओकसः गृहस्य उदकस्य बलस्यान्नस्य वा—इति वि०। ३. (तुविप्रतिम्) तुवीनां बहूनां पदार्थानां प्रतिमातारम्। अत्रैकदेशेन प्रतिशब्देन प्रतिमातृशब्दार्थो गृह्यते इति ऋ० १।३०।९ भाष्ये द०। ४. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिर्मन्त्रमिमम् ईश्वरपक्षे सभाध्यक्षपक्षे च व्याख्यातवान्।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    I remember again and again, God, the Fulfiller of the desires of many, the Bestower of immemorial salvation. Thee whom my sire invoked of old.

    Translator Comment

    Sire means parents, and preceptors.

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    Meaning

    I invoke and call upon the Primeval Man, eternal father, who creates this multitudinous existence from the eternal womb of nature, the same whom our original forefathers invoked and worshipped. (Rg. 1-30-9)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (प्रत्नस्य ओकसः) દિવ્ સ્થાન મોક્ષ સ્થાનના (अनु) ઉપર વિદ્યમાન (तुविप्रतिम्) અનેકોના પ્રતિપાલક-અનેક મોક્ષ આત્માઓને પોતાના આનંદથી પૂરણ કરનાર, (नरम्) નેતા-સ્વામી પરમાત્માને (हुवे) હું આમંત્રિત કરું છું (यं ते पूर्वं पिता हुवे) જે તને પરમાત્માને પહેલાં પણ મારા પિતા આમંત્રિત કરતાં રહ્યાં છે. (૨)


     

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : મોક્ષધામની ઉપર શાસક પરમાત્મા જે અનેક મુક્ત આત્માઓને પોતાના આનંદથી પૂરણ કરનાર, તે નેતાને ઉપાસક પોતાના હૃદયમાં આમંત્રિત કરે અને પરંપરાથી પોતાના પૂર્વજો બ્રહ્મા આદિ પણ આમંત્રિત કરતાં રહ્યાં છે. પરંપરાનું આદર્શ આચરણ અથવા હેતુ ગ્રાહ્ય છે. (૨)

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    सर्व माणसांनी परमेश्वराची उपासना केली पाहिजे व बालकांचे संरक्षण असलेले पिता, काका इत्यादींनी विद्याध्ययनासाठी बालकांना सुयोग्य गुरूजवळ पाठवावे, ज्यामुळे ते विद्वान बनावेत व कुशल नागरिक व्हावेत. ॥२॥

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    विषय

    पुढच्या मंत्रात ईश स्तुती आणि गुरु शिष्याविषयी काही सांगितले आहे.

    शब्दार्थ

    प्रथम अर्थ (परमेश्वरपक्षी) मी, एक उपासक, (प्रलस्य) प्रदीर्घ काळापासून निर्मित असलेल्या या (ओकस:) ब्रह्माण्यरूप घराच्या (नरम्) नेता असलेल्या आणि (सुविप्रतिम्) अनेक पदार्थांचा निर्माता असलेल्या इन्द्रनाम जगदीश्वराला (अनुहुव) मला अनुकूल होण्यासाठी हाक मारत आहे. (यं ते) ज्या तुज जगदीश्वराला (पूर्वम्) पूर्वी (पिता) माझा पिता (हुवे) हाक मारत होता (जसे माझा पिता संकटकाळी जत्मा जगत्पित्याला हाक मारत होता, मीही त्याप्रमाणे त्या परमेश्वराला साह्यासाठी बोलवावे. ।।२।। द्वितीय अर्थ : (आचार्य पक्षी) हे बालक, मी तुझा काका, (मामा, वा आजोबा) (तू विप्रतिम्) अनेक विद्यांची प्रतिमूर्ती असलेल्या (प्रत्नस्य प्राचीन (ओकस:) विद्या गृहाचा (नरम्) नेता असलेल्या आचार्याला (अनु) तुझ्यापर कृपा करणारे करून तुला अध्यापन व सदाचार शिक्षण देण्यासाठी (हुवे) आवाहन करीत आहे. ज्याप्रमाणे (यम्) ज्या आचार्याला (पूर्वम्) पूर्वी (ते) (पिता) तुझा पिता अन्य बालकांना अध्यापन करण्यासाठी बोलावित होता, मीही त्याप्रमाणे इतर बालकांना या आचार्यांकडे येण्यासाठी प्रवृत्त करीत आहे. ।।२।।

    भावार्थ

    सर्व लोकांनी परमेश्वराची उपासना केली पाहिजे. तसेच बालकांचे संरक्षक असलेल्या पिता, काका आदी पालकांचे कर्तव्य आहे की त्यांनी बालकाला विद्याध्ययनासाठी सुयोग्य गुरूकडे पाठवावे. की ज्यामुळे बालक विद्यावान होऊन सुजाण नागरिक होतील. ।।२।।

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