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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 751
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - उषाः
छन्दः - प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम -
15
प्र꣡त्यु꣢ अदर्श्याय꣣त्यू꣢३꣱च्छ꣡न्ती꣢ दुहि꣣ता꣢ दि꣣वः꣢ । अ꣡पो꣢ म꣣ही꣡ वृ꣢णुते꣣ च꣡क्षु꣢षा꣣ त꣢मो꣣ ज्यो꣡ति꣢ष्कृणोति सू꣣न꣡री꣢ ॥७५१॥
स्वर सहित पद पाठप्र꣡ति꣢꣯ । उ꣣ । अदर्शि । आयती꣢ । आ꣣ । यती꣢ । उ꣣च्छ꣡न्ती꣢ । दु꣣हिता꣢ । दि꣣वः꣢ । अ꣡प꣢꣯ । उ꣣ । मही꣢ । वृ꣣णुते । च꣡क्षुषा꣢꣯ । त꣡मः꣢꣯ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । कृ꣣णोति । सून꣡री꣢ । सु꣣ । न꣡री꣢꣯ ॥७५१॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रत्यु अदर्श्यायत्यू३च्छन्ती दुहिता दिवः । अपो मही वृणुते चक्षुषा तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी ॥७५१॥
स्वर रहित पद पाठ
प्रति । उ । अदर्शि । आयती । आ । यती । उच्छन्ती । दुहिता । दिवः । अप । उ । मही । वृणुते । चक्षुषा । तमः । ज्योतिः । कृणोति । सूनरी । सु । नरी ॥७५१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 751
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 4; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 4; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ३०३ पर प्राकृतिक उषा के पक्ष में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ आध्यात्मिक उषा का वर्णन करते हैं।
पदार्थ
(आयती) आती हुई, (उच्छन्ती) हृदय-प्राङ्गण में उदित होती हुई, (दिवः दुहिता) तेजस्वी परमात्मा की पुत्री के समान विद्यमान अध्यात्मप्रभा (चक्षुषा) अपने दिव्य प्रकाश से (तमः) मोहरूप अन्धकार को (अप उ वृणुते) दूर कर रही है। (सूनरी) उत्कृष्ट नेतृत्व करनेवाली यह अध्यात्मप्रभारूप उषा (ज्योतिः) विवेकख्यातिरूप ज्योति को (कृणोति) उत्पन्न कर रही है ॥१॥
भावार्थ
परमात्मा की उपासना से हृदय में प्रकट होती हुई दिव्यप्रभा समस्त तामसिकता के जाल को विच्छिन्न करके अन्तःकरण को निर्मल बना देती है ॥१॥
टिप्पणी
(देखो अर्थव्याख्या मन्त्र संख्या ३०३)
विशेष
ऋषिः—वसिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त बसने वाला)॥ देवता—उषाः (परमात्मा की आभा)॥ छन्दः—बृहती॥<br>
विषय
पत्नी व उषा
पदार्थ
इस मन्त्र की देवता ‘उषा’ है। इस उषा के विषय में कहते हैं कि- (प्रति आयती अदर्शि) = प्रत्येक के अभिमुख आती हुई दिखाई देती है । उषा उदित न हो ऐसी बात नहीं होती । इसी प्रकार गृहपत्नी भी उषा के समान सभी के लिए उदित हो । पक्षपात की गन्धमात्र भी पत्नी में न हो ।
यह उषा आती है, क्या करती हुई ? (उच्छन्ती) = विवासन करती हुई, सभी को विशेषरूप से निवास देती हुई । रात्रि के अन्धकार में होनेवाला राक्षसों, रक्ष: कृमियों और रोगादि का भय उषा के आते ही दूर-सा हो जाता है । वस्तुतः रात्रि में जीवन-क्रिया समाप्त-सी हो जाती है । उषा होते ही जीवन-यात्रा फिर से चालू हो उठती है। पत्नी का भी कर्त्तव्य है कि सब गृहसभ्यों के उत्तम निवास का प्रबन्ध करे। सबकी आवश्यकता पूर्ति का उसे ध्यान हो ।
उषा निकलती है—(दिवः) = प्रकाश को (दुहिता) = पूरण करनेवाली होती है। सब दिशाओं में प्रकाशही- प्रकाश भर देती है | गृहपत्नी = = माता भी बच्चों में प्रारम्भ से ही प्रकाश भरनेवाली बनें | गोदी के बच्चे को लोरियों में भी उत्तमोत्तम श्लोक व मन्त्र सुनाएँ । ।
(मही) = यह महनीय (उषा उ) = निश्चय से (चक्षुषा) = अपने दर्शन 'उपस्थान' से (तमः) = अन्धकार को (अपवृणुते) = दूर भगा देती है । उषा निकली, अँधेरा गया । इसी प्रकार माता भी सबपर इस प्रकार दृष्टिपात करे कि उनका हृदयान्धकार दूर हो जाए । वह अपनी प्रेम व उत्साहभरी दृष्टि से सभी को उत्साहित करे ।
यह महनीय उषा चारों ओर (ज्योतिः कृणोति) = प्रकाश-ही- प्रकाश कर देती है । उत्तम गृहिणी भी अपनी व्यवहार दक्षता से सारे घर में (प्रसाद) = आह्लाद भरे रखती है। =
उषा प्रकाश करके (‘सूनरी') = उत्तम गति देनेवाली होती है । उषा हुई और सभी पशु-पक्षी भी
अपने मार्ग पर बढ़े। गृहपत्नी भी उत्तम व्यवस्था से सारे घर को आगे ले-चलनेवाली होती है । यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि घर की यह उत्तम स्थिति होती वहीं है जहाँ, ('यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:') = नारियों का आदर होता है, परन्तु जहाँ वह 'साम्राज्ञी' न रहकर दासीमात्र हो जाती है, वहाँ ('यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रिया:') = सब क्रियाएँ निष्फल होकर अवनति-ही-अवनति होती चलती है । मन्त्र में इसी उद्देश्य से 'मही' शब्द का प्रयोग है कि इनको महनीय समझा जाए । ये उत्तम-अर्ध 'better half' हैं, इस बात को भूला न जाए ।
भावार्थ
आर्यगृहों की गृहणियाँ उषा को अपना आदर्श बनाएँ ।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = ( १ ) व्याख्या देखो अविकल सं० [३०३] पृ० १५५ ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - वसिष्ठ:। देवता - उषा:। छन्द: - वृहती । स्वरः - मध्यम: ।
संस्कृत (1)
विषयः
तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके ३०३ क्रमाङ्के प्राकृतिक्या उषसः पक्षे व्याख्याता। अत्राध्यात्मिकी उषा वर्ण्यते।
पदार्थः
(आयती) आगच्छन्ती (उच्छन्ती) हृदयप्राङ्गणे उदयं भजमाना (दिवः दुहिता) द्योतमानस्य परमात्मनः पुत्रीव विद्यमाना अध्यात्मप्रभारूपिणी उषाः (प्रति अदर्शि उ) उपासकेन मया अनुभूताऽस्ति खलु। (मही) महती एषा अध्यात्मप्रभा (चक्षुषा) चक्षसा, स्वकीयेन दिव्यप्रकाशेन (तमः) मोहान्धकारम् (अप उ वृणुते) अपाकरोति। (सूनरी) सुनेत्री एषा अध्यात्मप्रभारूपिणी उषाः (ज्योतिः)विवेकख्यातिरूपं ज्योतिः (कृणोति) जनयति ॥१॥
भावार्थः
परमात्मोपासनेन हृदये प्रादुर्भवन्ती दिव्यप्रभा सर्वं तमोजालं विच्छिद्यान्तःकरणं निर्मलं करोति ॥१॥
टिप्पणीः
२. ऋ० ७।८१।१ ‘अपो॒ महि॑ व्ययति॒ चक्ष॑से॒’ इति पाठः। साम० ३०३।
इंग्लिश (2)
Meaning
Dawn, the daughter of the Sun, advancing and dispelling darkness, is scan by all. It removes the darkness of the night by its appearance. Goading men, it spreads light.
Translator Comment
The verse is the same as 303, but with a different interpretation.
Meaning
The great and glorious dawn, child of the light of divinity, is seen rising, dispelling mists and darkness, and illuminates with light the world of our actions, brilliant guide as she is for the day. (Rg. 7-81-1)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (दिवः दुहिता) સૂર્યની દૂહિતા-જ્ઞાન પ્રકાશક પરમાત્માને દોહનારી શ્રદ્ધા પ્રજ્ઞાના ઉત્કૃષ્ટ સ્વરૂપ જ્ઞાન જ્યોતિ (आयाती) આવતી-પ્રાપ્ત થતી (उच्छन्ती) અજ્ઞાન અને સંસારના મોહને દૂર કરતી (प्रत्यदर्शि उ) ઉપાસકો દ્વારા પરિલક્ષિત થાય છે-પ્રત્યક્ષ થાય છે જેમ (मही सूनरी) મહત્ત્વવાળી સૂનરી ઉષા (चक्षुषा) નેત્રની સામે આવનાર (तमः) અંધકારને (उ अपवृणुते) નિશ્ચિત રૂપથી દૂર કરે છે અને (ज्योतिः कृणोति) પ્રકાશને સામે લાવે છે. (૧)
भावार्थ
ભાવાર્થ : જ્ઞાન પ્રકાશક પરમાત્મને દોહનારી ઉપાસકની અંદર તેના દર્શનામૃતને ખેંચીને લાવનારી શ્રદ્ધા જે પ્રજ્ઞાથી પણ શ્રેષ્ઠ જ્ઞાન જ્યોતિ ઉપાસકની અંદર આવતી, અજ્ઞાન અને સાંસારિક મોહને દૂર કરતી, ઉપાસક દ્વારા પ્રત્યક્ષ થાય છે; જેમ મહત્ત્વપૂર્ણ પ્રાતઃકાલીન ઉષા-પ્રભા આંખની સામે આવનારા અંધકારને નિતાન્ત દૂર કરે છે અને પ્રકાશને તેની સામે કરી દે છે. (૧)
मराठी (1)
भावार्थ
परमेश्वराच्या उपासनेने हृदयात प्रकट झालेली दिव्यप्रभा संपूर्ण तामसिकतेचे जाळे विच्छिन्न करून अंत:करणाला निर्मळ बनविते ॥१॥
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