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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 819
ऋषिः - नहुषो मानवः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
27
स꣡मु꣢ प्रि꣣या꣡ अ꣢नूषत꣣ गा꣢वो꣣ म꣡दा꣢य꣣ घृ꣡ष्व꣢यः । सो꣡मा꣢सः कृण्वते प꣣थः꣡ पव꣢꣯मानास꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥८१९॥
स्वर सहित पद पाठसम् । उ꣣ । प्रियाः꣢ । अ꣣नूषत । गा꣡वः꣢꣯ । म꣡दा꣢꣯य । घृ꣡ष्व꣢꣯यः । सो꣡मा꣢꣯सः । कृ꣣ण्वते । पथः꣢ । प꣡व꣢꣯मानासः । इ꣡न्द꣢꣯वः ॥८१९॥
स्वर रहित मन्त्र
समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः । सोमासः कृण्वते पथः पवमानास इन्दवः ॥८१९॥
स्वर रहित पद पाठ
सम् । उ । प्रियाः । अनूषत । गावः । मदाय । घृष्वयः । सोमासः । कृण्वते । पथः । पवमानासः । इन्दवः ॥८१९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 819
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में ब्रह्मानन्दरसों का तथा गुरुओं का वर्णन है।
पदार्थ
प्रथम—ब्रह्मानन्द-रस के पक्ष में। (प्रियाः) परमेश्वर के प्रिय, (घृष्वयः) मानसिक संघर्ष में संलग्न (गावः) स्तोताजन (मदाय) आनन्द-प्राप्ति के लिए (सम् उ अनूषत) भली-भाँति परमेश्वर की स्तुति करते हैं। उसकी स्तुति से प्राप्त (इन्दवः) दीप्त या सराबोर करनेवाले (सोमासः) ब्रह्मानन्द-रस (पवमानासः) स्तोताओं को पवित्र करते हुए, उनके सम्मुख (पथः) कर्तव्य-मार्गों को (कृण्वते) स्पष्ट कर देते हैं ॥ द्वितीय—गुरुओं के पक्ष में। (प्रियाः) प्रिय, मधुर, (घृष्वयः) घर्षण अर्थात् पुनः-पुनः अभ्यास से उज्ज्वल (गावः) शिष्यों की वाणियाँ (मदाय) आनन्द-प्राप्ति के लिए (सम् उ अनूषत) गुरुओं की सम्यक् स्तुति करती हैं। वे (इन्दवः) ज्ञान से दीप्त (सोमासः) ज्ञानप्रेरक गुरुजन (पवमानासः) शिष्यों को पवित्र करते हुए, उनके सम्मुख (पथः) गन्तव्य मार्गों को (कृण्वते) स्पष्ट कर देते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थ
मनुष्यों को चाहिए कि परमात्मा की और गुरुजनों की भली-भाँति स्तुति करके आनन्द-रस तथा ज्ञान-रस को दुहकर उसके पान से स्वयं को पवित्र करके सन्मार्ग का अनुसरण करें ॥२॥
पदार्थ
(प्रियाः-घृष्वयः-गावः) हे प्यारी परस्पर संघर्ष करती हुई एक दूसरे से बढ़ बढ़ कर स्तुतिवाणियो! तुम सोम—शान्तस्वरूप परमात्मा के हर्ष आनन्द प्राप्ति के लिए (उ सम्-अनुषत) अवश्य सम्यक् उस सोम—शान्तस्वरूप परमात्मा को स्तुत करो यतः (इन्दवः पवमानासः सोमासः) आनन्दरस भरा धारारूप में प्राप्त होता हुआ सोम शान्त परमात्मा ‘सर्वत्र बहुवचनमादरार्थम्’ हम स्तोताओं उपासकों के लिये (पथः कृण्वते) जीवनमार्गों को सम्पन्न करता है।
भावार्थ
हे एक-दूसरे से बढ़-बढ़कर स्तुति करनेवाली प्यारी वाणियो! तुम मेरे हर्ष आनन्द प्राप्त करने के लिए शान्तस्वरूप परमात्मा की स्तुति करो, वह आनन्दरस भरा धारारूप में प्राप्त होनेवाला शान्तस्वरूप परमात्मा हम स्तोताओं—उपासकों के लिए जीवनमार्गों को सम्पन्न करता है॥२॥
विशेष
<br>
विषय
'नहुष मानव' का जीवन 'चित्रबन्ध काव्य "
पदार्थ
वह व्यक्ति जो अपने को प्रभु से जोड़ता है और परिणामत: मानवमात्र से अपने को एक करना चाहता है वह 'नहुषः मानवः ' है – यह सभी के हित में अपना हित समझता है । ये व्यक्ति ही १. (उ) = निश्चय से प्रभु को (प्रियाः) = प्रिय होते हैं २. (समनूषत) = ये सदा प्रभु का स्तवन करते हैं ३. (गाव: मदाय) = वेदवाणियाँ इनको हर्ष देनेवाली होती हैं, अर्थात् ज्ञान प्राप्ति में ही ये आनन्द लेते हैं। ४. (घृष्वयः) = [घृषु संघर्षे] ये अध्यात्मसंग्राम में कामादि वासनाओं का धर्षण कर डालते हैं । ५. (सोमासः) = सौम्य स्वभाव के होते हैं ६. (कृण्वते पथ:) = औरों के लिए भी ये मार्गदर्शक होते हैं— रास्ता बना देते हैं। ७. (पवमानासः) = ये सदा अपने जीवन को पवित्र बनाने में लगे रहते हैं ८. (इन्दवः) = शक्तिशाली होते हैं।
१. और ८. प्रभु के प्रिय वे ही हैं जो शक्तिशाली हैं
२. और ७. प्रभु का स्तवन अपने को पवित्र करने का उपाय है।
३. और ६. ज्ञानी ही औरों के लिए मार्गदर्शक हो सकता है। अन्यथा तो ('अन्धेनैव नीयमानाः यथान्धाः') वाली बात होती है ।
४. और ५. वासनाओं का पूर्ण विजय करके ही मनुष्य सौम्य बनता है । वस्तुतः वासनाविजय की चरम सीमा सौम्यता ही है। प्रस्तुत मन्त्र 'चित्रबन्ध काव्य' का एक सुन्दर उदाहरण है |
भावार्थ
हमारा जीवन भी 'नहुष मानव' का जीवन हो । हम प्रभु के प्रिय बनें – शक्तिशाली हों । सूचना–यहाँ यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि प्रारम्भ और अन्त को मिलाकर भावना यह है कि प्रभु को वे ही प्रिय होते हैं जो शक्तिशाली बनते हैं ।
विषय
missing
भावार्थ
(प्रियाः) मनोहर (गावः) वाणियां या इन्द्रियां (घृष्वयः) परस्पर स्पर्द्धा करती हुईं, या अति तेजोयुक्त होकर (मदाय) आनन्द प्राप्त करने के लिये (सम् अनूषत) आत्मा की स्तुति करती है। (पवमानासः) हृदय को विमल करते हुए (इन्दवः) परमैश्वर्यसम्पन्न साधक (सोमासः) शमदम आदि से सम्पन्न होकर मुमुक्षु गण (पथः) मोक्ष साधनों को (कृण्वते) करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
missing
संस्कृत (1)
विषयः
अथ ब्रह्मानन्दरसा गुरवश्च वर्ण्यन्ते।
पदार्थः
प्रथमः—ब्रह्मानन्दरसपक्षे। (प्रियाः) परमेश्वरप्रियाः (घृष्वयः) मानससंघर्षरताः (गावः) स्तोतारः। [गौः इति स्तोतृनामसु पठितम्। निघं० ३।१६।] (मदाय) आनन्दप्राप्तये (सम् उ अनूषत) परमेश्वरं संस्तुवन्ति। तत्स्तवनेन प्राप्ताः (इन्दवः) दीप्ताः क्लेदनकराः वा। [इन्दुः इन्धेः उनत्तेर्वा। निरु० १०।४१।] (सोमासः) ब्रह्मानन्दरसाः (पवमानासः) स्तोतॄन् पवित्रीकुर्वन्तः, तेषां सम्मुखं (पथः) कर्तव्यमार्गान् (कृण्वते) स्पष्टीकुर्वन्ति ॥ द्वितीयः—गुरूणां पक्षे। (प्रियाः) प्रीतिकर्यः, मधुराः (घृष्वयः२) घर्षणेन पुनः पुनरभ्यासेन उज्ज्वलाः (गावः) शिष्याणां वाचः (मदाय) आनन्दप्राप्तये (सम् उ अनूषत) गुरून् संस्तुवन्ति। ते (इन्दवः) ज्ञानेन दीप्ताः (सोमासः) ज्ञानप्रेरकाः गुरुजनाः (पवमानासः) शिष्यान् पुनन्तः, तेषां पुरतः (पथः) गन्तव्यान् मार्गान् (कृण्वते) स्पष्टीकुर्वन्ति ॥२॥ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥२॥
भावार्थः
जनैः परमात्मानं गुरुजनांश्च संस्तूय तत आनन्दरसं ज्ञानरसं च दुग्ध्वा तत्पानेन स्वात्मानं पवित्वा सन्मार्गोऽनुसरणीयः ॥२॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ९।१०१।८। २. घृष्वयः अत्यन्तदीप्ताः—इति सा०।
इंग्लिश (2)
Meaning
Fascinating speeches, vying with each other, praise the soul, for the attainment of joy. Purifying the heart, the Yogis adopt measures for the attainment of salvation.
Meaning
Dear daring voices exalt and extol Soma for the sheer joy of illumination. Indeed men of Soma vision and courage, blazing brilliant, pure, purifying and pursuing, create and carve their own paths of progress. (Rg. 9-101-8)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (प्रियाः घृष्वयः गावः) હે પ્યારી પરસ્પર સંઘર્ષ કરતી એકબીજીથી ચડિયાતી સ્તુતિ વાણીઓ ! તમે સોમ-શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્માના હર્ષ-આનંદ પ્રાપ્તિને માટે (उ सम् अनुषत) અવશ્ય સમ્યક્ તે સોમશાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્માને સ્તુત કરો જેથી (इन्दवः पवमानासः सोमासः) આનંદરસ ભરેલ ધારારૂપમાં પ્રાપ્ત થઈને સોમ-શાન્ત પરમાત્મા અમે સ્તોતાઓ ઉપાસકોને માટે (पथ कृण्वते) જીવન માર્ગોને સંપન્ન કરે છે. (૨)
भावार्थ
ભાવાર્થ : હે એક બીજીથી ચડિયાતી સ્તુતિ કરનારી પ્રિય વાણીઓ ! તમે મને હર્ષ-આનંદ પ્રાપ્ત કરાવવા માટે શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્માની સ્તુતિ કરો, તે આનંદરસ ભરેલ ધારારૂપમાં પ્રાપ્ત થનાર શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મા અમે સ્તોતાઓ-ઉપાસકોને માટે જીવનમાર્ગોને સંપન્ન કરે છે. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
माणसांनी परमात्म्याची व गुरुजनांची चांगल्याप्रकारे स्तुती करून आनंदरस व ज्ञान-रसाचे दोहन करून त्याचे पान करून स्वत:ला पवित्र करून सन्मार्गाचे अनुसरण करावे ॥२॥
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