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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 860
ऋषिः - पराशरः शाक्त्यः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम -
31
सो꣢मं꣣ गा꣡वो꣢ धे꣣न꣡वो꣢ वावशा꣣नाः꣢꣫ सोमं꣣ वि꣡प्रा꣢ म꣣ति꣡भिः꣢ पृ꣣च्छ꣡मा꣢नाः । सो꣡मः꣢ सु꣣त꣡ ऋ꣢च्यते पू꣣य꣡मा꣢नः꣣ सो꣡मे꣢ अ꣣र्का꣢स्त्रि꣣ष्टु꣢भः꣣ सं꣡ न꣢वन्ते ॥८६०॥
स्वर सहित पद पाठसो꣡म꣢꣯म् । गा꣡वः꣢꣯ । धे꣣न꣡वः꣢ । वा꣣वशानाः꣢ । सो꣡म꣢꣯म् । वि꣡प्राः꣢꣯ । वि । प्राः꣣ । मति꣡भिः꣢ । पृ꣡च्छ꣡मा꣢नाः । सो꣡मः꣢꣯ । सु꣣तः꣢ । ऋ꣣च्यते । पूय꣡मा꣢नः । सो꣡मे꣢꣯ । अ꣣र्काः꣢ । त्रि꣡ष्टु꣡भः꣢ । त्रि꣣ । स्तु꣡भः꣢꣯ । सम् । न꣣वन्ते ॥८६०॥
स्वर रहित मन्त्र
सोमं गावो धेनवो वावशानाः सोमं विप्रा मतिभिः पृच्छमानाः । सोमः सुत ऋच्यते पूयमानः सोमे अर्कास्त्रिष्टुभः सं नवन्ते ॥८६०॥
स्वर रहित पद पाठ
सोमम् । गावः । धेनवः । वावशानाः । सोमम् । विप्राः । वि । प्राः । मतिभिः । पृच्छमानाः । सोमः । सुतः । ऋच्यते । पूयमानः । सोमे । अर्काः । त्रिष्टुभः । त्रि । स्तुभः । सम् । नवन्ते ॥८६०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 860
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में परमकवि परमात्मा का वर्णन है।
पदार्थ
(धेनवः) तृप्ति प्रदान करनेवाली (गावः) गौएँ या वाणियाँ (सोमम्) परमकवि परमात्मा की ही (वावशानाः) कामना करती हुई (यन्ति) जा रही हैं। (विप्राः) ज्ञानी लोग (मतिभिः) स्तोत्रों से (सोमम्) परमकवि परमात्मा को ही (पृच्छमानाः) पूछते हुए जा रहे हैं। (सुतः) ध्यान किया हुआ (सोमः) परमात्मा (पूयमानः) हृदय में प्रेरित होता हुआ (ऋच्यते) सहृदयों से स्तुति पाता है। (सोमे) उस परमात्मा में (त्रिष्टुभः) त्रिष्टुप् छन्दवाले अथवा तीन-तीन पादों से थमे हुए गायत्री छन्दवाले (अर्काः) मन्त्र (सं नवन्ते) सङ्गत हुए-हुए हैं, अर्थात् उसी का प्रतिपादन कर रहे हैं ॥२॥ इस मन्त्र के पूर्वार्द्ध में असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थ
जगत् में सब प्राणी और सब अचेतन पदार्थ अपने-अपने कर्म में लगे हुए मानो अपने रचयिता परमात्मा को ही खोज रहे हैं ॥२॥
पदार्थ
(गावः-धेनवः) गाती हुई वेदवाणियाँ “धेनुः-वाङ् नाम” [निघं॰ १.१०] (सोमं वावशानाः) शान्तस्वरूप परमात्मा को पुनः पुनः चाहती हुई (विप्राः) मेधावी विद्वान् (मतिभिः) स्तुतिवाणियों से “वाग् वै मतिः” [श॰ ८.१.२.७] “मन्यते अर्चतिकर्मा” [निघं॰ ३.१४] (पृच्छमानाः) अर्चित करते हुए “पृच्छति अर्चंतिकर्मा” [निघं॰ ३.१४] (संनवन्ते) सम्यक् प्राप्त होते हैं (सोमः सुतः पूयमानः-ऋच्यते) शान्त परमात्मा साक्षात् हो अन्तरात्मा को शोधता हुआ प्रशंसित होता है (सोमे-अर्काः-त्रिष्टुभः-संनवन्ते) शान्त परमात्मा में अर्चना करने वाले मन वाणी कर्म से तीन प्रकार स्तुति करने वाले सङ्गत होते हैं।
भावार्थ
जाने वाली स्तुतिवाणियाँ पुनः पुनः चाहती हुई शान्त परमात्मा को प्राप्त होती हैं, मेधावी उपासक स्तुतिवाणियों से अर्चना करते हुए शान्त परमात्मा को प्राप्त होते हैं, साक्षात् हुआ परमात्मा उपासक के आत्मा को शोधता हुआ प्रशंसित किया जाता है, मन वाणी कर्म से स्तुति करने वाले अर्चकजन परमात्मा में सङ्गति पाते हैं॥२॥
विशेष
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विषय
सोम-प्राप्ति
पदार्थ
(सोमम्) = ‘उमा = ज्ञान' से सहित परमात्मा को संनवन्ते प्राप्त होते हैं । कौन ? १. (गावः) = [स्तोतारः –नि० ३.१६.७] स्तोता लोग, उस प्रभु का स्तवन करनेवाले, २. (धेनवः) = [धेट् पाने] सोम का पान करनेवाले । जो व्यक्ति शरीर में उत्पन्न होनेवाली सोमशक्ति को अपने ही अन्दर पीने का प्रयत्न करते हैं, ३. (वावशाना:) = [वश् कान्तौ] जिन्हें प्रभु-प्राप्ति की तीव्र इच्छा होती है, ४. (सोमम्) = मननशील ज्ञानियों के साथ (पृच्छमानाः) = जिज्ञासा करते हुए (संनवन्ते) = प्राप्त होते हैं ।
(सोमः) = वह सोम परमात्मा 'स्तुति, सोमपान, प्रबल कामना तथा विद्वानों के साथ चर्चा द्वारा (सुतः) = हृदय में प्रकाशित हुआ-हुआ (पूयमान:) = हमारे जीवनों को अधिकाधिक पवित्र करता हुआ (ऋच्यते) = स्तुति किया जाता है । स्तुति से हम प्रभु के समीप पहुँचते हैं और उसके समीप पहुँचने पर जब हम उसका कुछ दर्शन कर पाते हैं, तब हम स्वभावतः उसका स्तवन कर उठते हैं । यहाँ कर्मवाच्य Passive voice में प्रयुक्त किया जाता हुआ ऋच्यते यह संकेत करता है पहले तो हम स्तुति करते हैं, परन्तु पीछे स्तुति स्वतः होने लगती है - स्तुति स्वाभाविक-सी हो जाती है। (त्रिष्टुभः) = तीनों कालों में [बाल्य, यौवन व वार्धक्य में] स्तवन करनेवाले स्तोता के अथवा प्रभुदर्शन से ‘तीनों काम, क्रोध व लोभ' को [स्तुभ् Stop] समाप्त कर देनेवाले स्तोता के (अर्का:) = स्तुति के साधनभूत मन्त्र [अर्को मन्त्रो भवति यदनेनार्चन्ति–नि० ५.४] सोमे- उस शान्त प्रभु में संनवन्ते=संगत होते हैं, अर्थात् यह सदा मन्त्रों के द्वारा उस प्रभु का स्तवन करता है। इसका जीवन ही स्तवनमय हो जाता है ।
भावार्थ
हम स्तुति, सोमपान, तीव्रभावना तथा जिज्ञासा के द्वारा प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनें ।
विषय
missing
भावार्थ
(धेनवः) दुग्धपान कराने हारी (गावः) गौओं के समान ज्ञानरस का पान कराने वाली, ज्ञानवाणियां (सोमं) सोमस्वरूप आत्मा या परमात्मा के प्रति (वावशानाः) कामना प्रकट करती हैं। उसी को चाहती अथवा उसी की स्तुति करती हैं। और (विप्राः) मेधावी पुरुष (मतिभिः) अपने मननों द्वारा (सोमम्) उसी रसस्वरूप आत्मा की (पृच्छमानाः) जिज्ञासा करते हैं। वही (सोमः) रसरूप आत्मा (पूयमानः) विशुद्ध स्वरूप (सुतः) अन्तर्हृदय में प्रकट होकर (ऋच्यते) स्तुति किया जाता है। और (अर्काः) सूर्य के समान तेजस्वी, वेद के विद्वान् ज्ञानी पुरुष (सोमे) उसी परमात्मा के विषय में (त्रिष्टुभः) तीनों प्रकार से मनसा, वाचा, कर्मणा, उसकी स्तुति करने हारे होकर उसकी (सं नवन्ते) अच्छी प्रकार स्तुति करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
missing
संस्कृत (1)
विषयः
अथ परमकविं परमात्मानं वर्णयति।
पदार्थः
(धेनवः) प्रीणयित्र्यः (गावः) क्षीरिण्यः वाचो वा (सोमम्) परमकविं परमात्मानमेव (वावशानाः) कामयमानाः, यन्ति इति पूर्वमन्त्रादाकृष्यते। (विप्राः) ज्ञानिनः (मतिभिः) स्तोत्रैः (सोमम्) परमकविं परमात्मानमेव (पृच्छमानाः) पृच्छन्तः यन्ति। (सुतः) ध्यातः (सोमः) परमात्मा (पूयमानः) हृदये प्रेर्यमाणः। [पवते गतिकर्मा। निघं० २।१४।] (ऋच्यते) सहृदयैः स्तूयते। [ऋच स्तुतौ तुदादेः कर्मणि रूपम्।] (सोमे) तस्मिन् परमात्मनि (त्रिष्टुभः) त्रिष्टुप्छन्दस्काः त्रिपाद्गायत्रीछन्दस्काः वा (अर्काः) मन्त्राः। [अर्को मन्त्रो भवति यदनेनार्चन्ति। निरु० ५।५।२४।] (सं नवन्ते) संगताः (सन्ति), तमेव प्रतिपादयन्तीत्यर्थः। [नवते गतिकर्मा निघं० २।१४] ॥२॥ अत्र पूर्वार्द्धेऽसम्बन्धे सम्बन्धरूपोऽतिशयोक्तिरलङ्कारः ॥२॥
भावार्थः
जगति सर्वे प्राणिनः सर्वे चाचेतनाः पदार्थाः स्वस्वकर्मणि संलग्नाः स्वरचयितारं परमात्मानमिवान्विष्यन्ति ॥२॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ९।९७।३५, ‘सोमः॑ सु॒तः पू॑यते अ॒ज्यमा॑नः॒’ इति तृतीयः पादः।
इंग्लिश (2)
Meaning
The Vedic verses long for God. The learned, with their intellect inquire into God. God, contemplated, purifying the heart, is praised through Vedic songs. The knowers of the Vedas, eulogise God* by thought!, word and deed.
Translator Comment
$त्रिष्टुमः may also mean with verses in Trishtup metre.
Meaning
Dynamic and creative languages of love and faith celebrate Soma, the languages of scholars enquiring into reality with thought and analysis concentrate on Soma. It is Soma which, distilled from observation and experience and crystallised in nature and function, is sought to be comprehended or apprehended in the language medium. Indeed all speech media of description, definition, comprehension, apprehension, celebration or adoration arise from Soma and merge into Soma. (Rg. 9-97-35)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (गावः धेनवः) ગાન કરતી વેદવાણીઓ (सोमं वावशानाः) સોમ સ્વરૂપ પરમાત્માને પુનઃ પુનઃ ચાહતી (विप्राः) મેધાવી વિદ્વાને (मतिभिः) સ્તુતિ વાણીઓથી (पृच्छमानाः) અર્ચિત કરતાં (संनवन्ते) સારી રીતે પ્રાપ્ત થાય છે (सोमः सुतः पूयमानः ऋच्यते) શાન્ત પરમાત્મા સાક્ષાત્ થતાં અન્તરાત્માને શોધતાં પ્રશંસિત થાય છે (सोमे अर्काः त्रिष्टुभः संनवन्ते) શાન્ત પરમાત્મામાં અર્ચના કરનારા મન, વાણી, કર્મથી ત્રણ પ્રકારની સ્તુતિ કરનારા સંગત થાય છે. (૨)
भावार्थ
ભાવાર્થ : જનારી સ્તુતિ વાણીઓ પુનઃ પુનઃ ચાહતી શાન્ત પરમાત્માને પ્રાપ્ત થાય છે, મેધાવી ઉપાસક સ્તુતિ વાણીઓથી અર્ચના કરતાં શાંત પરમાત્માને પ્રાપ્ત થાય છે, સાક્ષાત્ થતાં પરમાત્મા ઉપાસકના આત્માને શોધતાં પ્રશંસિત કરવામાં આવે છે, મન, વાણી, કર્મથી સ્તુતિ કરનારા અર્ચકજનો પરમાત્માનો સંગ પામે છે. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
जगात सर्व प्राणी व अचेतन पदार्थ आपापल्या कार्यारत असून जणू ते आपल्या रचनाकार परमात्म्याला शोधत आहेत.॥२॥
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