Loading...

सामवेद के मन्त्र

  • सामवेद का मुख्य पृष्ठ
  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 874
    ऋषिः - ययातिर्नाहुषः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम -
    40

    स꣣ह꣡स्र꣢धारः पवते समु꣣द्रो꣡ वा꣢चमीङ्ख꣣यः꣢ । सो꣢म꣣स्प꣡ती꣢ रयी꣣णा꣡ꣳ सखेन्द्र꣢꣯स्य दि꣣वे꣡दि꣢वे ॥८७४॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स꣣ह꣡स्र꣢धारः । स꣣ह꣡स्र꣢ । धा꣣रः । पवते । समुद्रः꣢ । स꣣म् । उद्रः꣢ । वा꣣चमीङ्खयः꣢ । वा꣣चम् । ईङ्खयः꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । प꣡तिः꣢꣯ । र꣣यीणा꣢म् । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । दि꣣वे꣡दि꣢वे । दि꣣वे꣢ । दि꣣वे ॥८७४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सहस्रधारः पवते समुद्रो वाचमीङ्खयः । सोमस्पती रयीणाꣳ सखेन्द्रस्य दिवेदिवे ॥८७४॥


    स्वर रहित पद पाठ

    सहस्रधारः । सहस्र । धारः । पवते । समुद्रः । सम् । उद्रः । वाचमीङ्खयः । वाचम् । ईङ्खयः । सोमः । पतिः । रयीणाम् । सखा । स । खा । इन्द्रस्य । दिवेदिवे । दिवे । दिवे ॥८७४॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 874
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में परमात्मा और आचार्य का विषय है।

    पदार्थ

    (समुद्रः) आनन्द वा ज्ञान का समुद्र, (वाचमीङ्खयः) वाणी को प्रेरित करनेवाला, (रयीणां पतिः) श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाव रूप धनों का स्वामी, (इन्द्रस्य सखा) जीवात्मा का सखा (सोमः) परमात्मा वा आचार्य (दिवे दिवे) प्रतिदिन (सहस्रधारः) हजारों धाराओं से उमड़ता हुआ (पवते) उपासकों वा शिष्यों के प्रति आनन्दरस वा ज्ञानरस को प्रवाहित करता है ॥३॥

    भावार्थ

    परमेश्वर श्रेष्ठ उपासकों को प्राप्त होकर उनके प्रति मधुर आनन्दरस को और आचार्य श्रेष्ठ शिष्यों को प्राप्त होकर उनके प्रति मधुर ज्ञानरस को प्रवाहित करता है ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    पदार्थ

    (वाचमीङ्खयः) स्तुतिवाणियों को प्राप्त होने वाला—स्तुतिवाणियों को स्वीकार करने वाला ‘वाचमीङ्खति-इति खश्प्रत्ययान्तः’ (सहस्रधारः समुद्रः) बहुत आनन्दधाराओं वाला उभरने वाला आनन्दसागर परमात्मा (रयीणां पतिः) विविध ऐश्वर्यों का स्वामी (इन्द्रस्य सखा) उपासक आत्मा का साथी मित्र (दिवे दिवे पवते) दिनों दिन बढ़ बढ़ कर उपासक आत्मा के अन्दर प्राप्त होता है।

    भावार्थ

    स्तुतिवाणियों को स्वीकार करने वाला बहुत आनन्दधाराओं में प्राप्त होने वाला आनन्दसागर परमात्मा विविध ऐश्वर्यों का स्वामी उपासक आत्मा का साथी मित्र दिनों दिन बढ़ बढ़ कर उसके अन्दर प्राप्त होता है॥३॥

    विशेष

    <br>

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    सहस्रधार व स-हस्रधार, समुद्र तथा समुद्र

    पदार्थ

    मन्त्र का ऋषि ‘ययाति नाहुष' (दिवे-दिवे) = दिन-प्रतिदिन (पवते) = उस प्रभु की ओर बढ़ता चलता है और अपने जीवन को पवित्र बनाता जाता है [पवते= गच्छति, पुनाति] । यह कैसा है— १. (सहस्त्रधारः) = यज्ञमय जीवनवाला होने से हज़ारों का धारण करनेवाला है। अथवा (स-हस्रधार:) = सदा हास्यमय स्मितयुक्त वाणीवाला है— सबके साथ मधुरता से बात करता है । २. (समुद्रः) = यह ज्ञान का समुद्र बनता है अथवा [स-मुद्] सदा प्रसन्नवदन होता है । ३. (वाचम् ईंखयः) = यह अपने अन्दर वेदवाणी को प्रेरित करता है। जनता में भी वेदवाणी का प्रचार करता है । ४. (सोमः) = ज्ञानप्राप्ति के कारण यह 'सौम्य' व विनित होता है । ५. (रयीणां पतिः) = यह सदा धनों का पति बना रहता है— धन कभी इसके स्वामी नहीं हो जाते । ६. धनों का पति होने से ही यह (इन्द्रस्य सखा) = उस परमैश्वर्यशाली परमात्मा का मित्र होता है । जो धन का दास है वह प्रभु का मित्र नहीं हो सकता । इस षट्कसम्पति से युक्त 'ययाति नाहुष' जीवन्मुक्त बनता है और प्रभु चरणों में पहुँचता है।

    भावार्थ

    मन्त्र वर्णित षट्कसम्पत्ति को अपनाकर हम प्रभु के सच्चे सखा बनें ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    missing

    भावार्थ

    (सहस्रधारः) सहस्रों धारण शक्तियों से सम्पन्न, (समुद्रः) समस्त रसों का भण्डार, या समुद्र के समान महान्, (वाचम् ईङ्खयः) समस्त विश्व की वेदमय वाणियों को प्रकट करने हारा, (रयीणां) समस्त जड़ और चेतन पदार्थों और ऐश्वर्यों का (पतिः) स्वामी और (इन्द्रस्य) इस आत्मा का (सखा) परम मित्र (सोमः) सबका प्रेरक और उत्पादक परमात्मा (दिवेदिवे) प्रतिदिन (पवते) प्रकट हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    missing

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ परमात्मविषय आचार्यविषयश्चोच्यते।

    पदार्थः

    (समुद्रः) आनन्दस्य ज्ञानस्य वा पारावारः, (वाचमीङ्खयः) वाचः प्रेरयिता। [ईखि गतौ, ण्यन्तः, वाचम् ईङ्खयति प्रेरयति सः।], (रयीणां पतिः) सद्गुणकर्मस्वभावरूपाणां धनानामधीश्वरः, (इन्द्रस्य सखा) जीवात्मनः सुहृत् (सोमः) परमात्मा आचार्यो वा (दिवे दिवे) प्रतिदिनम् (सहस्रधारः) सहस्रधाराभिः उद्वेल्लितः सन् (पवते) उपासकान् शिष्यान् वा प्रति आनन्दरसं ज्ञानरसं वा प्रवाहयति ॥३॥

    भावार्थः

    परमेश्वरः सदुपासकान् प्राप्य तान् प्रति मधुरमानन्दरसम्, आचार्यश्च सच्छिष्यान् प्राप्य तान् प्रति मधुरं ज्ञानरसं प्रवाहयति ॥३॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ९।१०१।६, अथ० २०।१३७।६, उभयत्र ‘सोमः॒ पती॑’ इति पाठः।

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    God, the Embodiment of thousand powers, Vast like the ocean, the Revealer of the Vedas, the Lord of the animate and inanimate creation, the Friend of the soul, manifests Himself day by day.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Meaning

    A thousand streams of Soma joy and enlightenment flow, inspiring and purifying. It is a bottomless ocean that rolls impelling the language and thought of new knowledge. It is the preserver, promoter and sustainer of all wealths and honours and a friend of the soul, inspiring and exalting us day by day. (Rg. 9-101-6)

    इस भाष्य को एडिट करें

    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (वाचमीङ्खयः) સ્તુતિ વાણીઓને પ્રાપ્ત થનાર-સ્તુતિ વાણીઓનો સ્વીકાર કરનાર (सहस्रधारः समुद्रः) અનેક આનંદ ધારાઓ વાળા ઉભરાવાવાળા આનંદ સાગર પરમાત્મા (रयीणां पतिः) વિવિધ ઐશ્વર્યોના સ્વામી (इन्द्रस्य सखा) ઉપાસક આત્માના સાથી મિત્ર (दिवे दिवे पवते) પ્રત્યેક દિવસ વધીને ઉપાસક આત્માની અંદર પ્રાપ્ત થાય છે. (૩)

     

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : સ્તુતિ વાણીઓનો સ્વીકાર કરનાર, અનેક આનંદ ધારાઓમાં પ્રાપ્ત થનાર, આનંદ સાગર પરમાત્મા વિવિધ ઐશ્વર્યોના સ્વામી, ઉપાસક આત્માના સાથી મિત્ર પ્રતિદિન-રોજેરોજ વધીને તેની અંદર પ્રાપ્ત થાય છે. (૩)

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमेश्वर श्रेष्ठ उपासकांना प्राप्त होऊन त्यांना मधुर आनंद रस व आचार्य श्रेष्ठ शिष्यांना प्राप्त करून त्यांच्याकडे मधुर ज्ञान रसाला प्रवाहित करतो. ॥३॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top