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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 896
ऋषिः - मेध्यातिथिः काण्वः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
23
प꣡व꣢स्व विश्वचर्षण꣣ आ꣢ म꣣ही꣡ रोद꣢꣯सी पृण । उ꣣षाः꣢꣫ सूर्यो꣣ न꣢ र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥८९६॥
स्वर सहित पद पाठप꣡व꣢꣯स्व । वि꣣श्चर्षणे । विश्व । चर्षणे । आ꣢ । म꣣ही꣡इति꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । पृ꣣ण । उषाः꣢ । सू꣡र्यः꣢꣯ । न । र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥८९६॥
स्वर रहित मन्त्र
पवस्व विश्वचर्षण आ मही रोदसी पृण । उषाः सूर्यो न रश्मिभिः ॥८९६॥
स्वर रहित पद पाठ
पवस्व । विश्चर्षणे । विश्व । चर्षणे । आ । महीइति । रोदसीइति । पृण । उषाः । सूर्यः । न । रश्मिभिः ॥८९६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 896
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में फिर उन्हीं का विषय कहा गया है।
पदार्थ
हे (विश्वचर्षणे) विश्व ब्रह्माण्ड के द्रष्टा परमात्मन् वा सब विद्याओं के द्रष्टा आचार्य ! आप पवस्व अन्तःप्रकाश एवं ज्ञानरस को प्रवाहित करो। उससे (मही रोदसी) महिमामय आत्मा और मन को (आपृण) पूर्ण कर दो, (न) जैसे (उषाः) उषा और (सूर्यः) सूर्य (रश्मिभिः) किरणों से (मही रोदसी) महान् द्यावापृथिवी को पूर्ण करते हैं ॥५॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थ
जैसे उषा और सूर्य के प्रकाश से द्यावापृथिवी भर जाते हैं, वैसी ही परमात्मा और आचार्य द्वारा दी गयी दिव्य अन्तर्ज्योति तथा ज्ञानज्योति से मनुष्य के आत्मा और मन परिपूर्ण होते हैं ॥५॥
पदार्थ
(विश्वचर्षणे) विश्वद्रष्टा परमात्मन्! तू (पवस्व) मुझ उपासक के अन्दर आ—प्राप्त हो (मही रोदसी आपृण) मेरे महत्त्वपूर्ण दोनों किनारों—इहलोक जीवन और परलोक जीवन अर्थात् भोगपार्श्व और अपवर्गपार्श्व को अपने आनन्दरस धाराओं से आपूर कर दे*27 (उषाः सूर्यः-न रश्मिभिः) सूर्य जैसे प्रकाशधाराओं से उषावेलाओं को भर देता है॥५॥
टिप्पणी
[*27. “रोदसी रोधसी विरोधनात् रोधः कूलं निरुणद्धि स्रोतः” [निरु॰ ६.१]
विशेष
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पदार्थ
१. हे (विश्वचर्षणे) = विश्वद्रष्ट: - सम्पूर्ण संसार का ध्यान [Look after] करनेवाले प्रभो ! (आपवस्व) = आप हमें प्राप्त होओ और हमारे जीवनों को पवित्र करो । २. (मही रोदसी) = महनीय द्युलोक व पृथिवीलोक को (आपृण) = भर दीजिए । आधिदैविक जगत् के भी द्युलोक व पृथिवीलोक हैं, उन्हें (न) = जैसे (उषा:) = उष:काल तथा (सूर्यः) = सूर्य (रश्मिभिः) = प्रकाश की किरणों से भर देते हैं, उसी प्रकार आप अध्यात्म जगत् के पृथिवीलोक व द्युलोक को, अर्थात् शरीर व मस्तिष्क को, जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं, प्रकाश से परिपूर्ण करने की कृपा करें । मेरा शरीर नीरोगता के कारण स्वास्थ्य के प्रकाश से चमके तथा मेरा मस्तिष्क ज्ञान की ज्योति से परिपूर्ण हो ।
भावार्थ
हमारा शरीर स्वस्थ हो और मस्तिष्क दीप्त बने । अन्धकार का दहन करनेवाली उषा [उष् दाहे] शरीर के रोगों का दहन कर दे और द्युलोक को जगमगानेवाला सूर्य मस्तिष्करूप द्युलोक को ज्योतिर्मय कर दे ।
विषय
missing
भावार्थ
हे (विश्वचर्षणे) समस्त संसार को देखने हारे परमात्मन् ! (रश्मिभिः) किरणों से (सूर्यः न) जिस प्रकार सूर्य (उषाः) उषा के समयों में (मही रोदसी) बड़े भारी आकाश और पृथिवी दोनों को पूर्ण करता है उसी प्रकार आप भी उनको पूर्ण करते और पालन करते हो। आप हमारे प्रति (पवस्व) अपनी कृपा दर्शाइये।
टिप्पणी
‘स पवस्व विचर्षणे’ इति ऋ०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ आकृष्टामाषाः। २ अमहीयुः। ३ मेध्यातिथिः। ४, १२ बृहन्मतिः। ५ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निः। ६ सुतंभर आत्रेयः। ७ गृत्समदः। ८, २१ गोतमो राहूगणः। ९, १३ वसिष्ठः। १० दृढच्युत आगस्त्यः। ११ सप्तर्षयः। १४ रेभः काश्यपः। १५ पुरुहन्मा। १६ असितः काश्यपो देवलो वा। १७ शक्तिरुरुश्च क्रमेण। १८ अग्निः। १९ प्रतर्दनो दैवोदासिः। २० प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः, अथर्वाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः स्तौ तयोर्वान्यतरः। देवता—१—५, १०–१२, १६-१९ पवमानः सोमः। ६, २० अग्निः। ७ मित्रावरुणो। ८, १३-१५, २१ इन्द्रः। ९ इन्द्राग्नी ॥ छन्द:—१,६, जगती। २–५, ७–१०, १२, १६, २० गायत्री। ११ बृहती सतोबृहती च क्रमेण। १३ विराट्। १४ अतिजगती। १५ प्रागाधं। १७ ककुप् च सतोबृहती च क्रमेण। १८ उष्णिक्। १९ त्रिष्टुप्। २१ अनुष्टुप्। स्वरः—१,६, १४ निषादः। २—५, ७—१०, १२, १६, २० षड्जः। ११, १३, १५, १७ मध्यमः। १८ ऋषभः। १९ धैवतः। २१ गान्धारः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथ पुनरपि तयोरेव विषयः प्रोच्यते।
पदार्थः
हे (विश्वचर्षणे) विश्वब्रह्माण्डस्य द्रष्टः परमात्मन्, सर्वासां विद्यानां द्रष्टः आचार्य वा ! त्वम् (पवस्व) अन्तःप्रकाशं ज्ञानरसं वा प्रवाहय, तेन (मही रोदसी) महती आत्ममनसी (आ पृण) परिपूरय, (न) यथा (उषाः) प्रभातकान्तिः (सूर्यः) आदित्यश्च (रश्मिभिः) किरणैः (मही रोदसी) महत्यौ द्यावापृथिव्यौ आपृणाति ॥५॥ अत्र श्लिष्टोपमालङ्कारः ॥५॥
भावार्थः
यथोषसः सूर्यस्य च प्रकाशेन द्यावापृथिव्यौ प्रयूर्येते तथैव परमात्मनाचार्येण च प्रदत्तेन दिव्येनान्तर्ज्योतिषा ज्ञानज्योतिषा च मनुष्यस्यात्मा मनश्च परिपूर्येते ॥५॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ९।४१।५।
इंग्लिश (2)
Meaning
0 All-seeing God, fill full the mighty Heaven and Earth, as the Sun fills the Dawn with his beams. Be Kind unto us !
Meaning
O lord all watchful, ever awake, fill the great earth and heaven with prosperity, light and beauty of life like the sun which blesses the dawn with the beauty and glory of its rays of light. (Rg. 9-41-5)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (विश्वचर्षणे) વિશ્વદ્રષ્ટા પરમાત્મન્ ! તું (पवस्व) મારામાં-ઉપાસકમાં આવ-પ્રાપ્ત થા. (मही रोदसी आपृण) મારા મહત્ત્વપૂર્ણ બન્ને કિનારાઓ-આલોક જીવન અને પરલોક જીવન અર્થાત્ ભોગ પાર્થ અને અપવર્ગ પાર્શ્વ અને તારી આનંદરસ ધારાઓથી આપૃણ-ભરપૂર કરી દે-ભરી દે. (उषाः सूर्यः न रश्मिभिः) જેમ સૂર્ય પ્રકાશધારાઓથી ઉષાવેળાઓને ભરી દે છે, તેમ. (૫)
मराठी (1)
भावार्थ
जसा उषा व सूर्याचा प्रकाश द्यावा पृथ्वी सर्वत्र व्यापतो, तसेच परमात्मा व आचार्याकडून प्राप्त झालेली दिव्य ज्योती व ज्ञान ज्योतीने माणसाचा आत्मा व मन परिपूर्ण होतात. ॥५॥
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