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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 899
ऋषिः - बृहन्मतिराङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
12
प꣣रिष्कृण्व꣡न्ननि꣢꣯ष्कृतं꣣ ज꣡ना꣢य या꣣त꣢य꣣न्नि꣡षः꣢ । वृ꣣ष्टिं꣢ दि꣣वः꣡ परि꣢꣯ स्रव ॥८९९॥
स्वर सहित पद पाठप꣣रिष्कृण्व꣢न् । प꣣रि । कृण्व꣢न् । अ꣡नि꣢꣯ष्कृतम् । अ । नि꣣ष्कृतम् । ज꣡ना꣢य । या꣣त꣡य꣢न् । इ꣡षः꣢꣯ । वृ꣣ष्टि꣢म् । दि꣣वः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । स्र꣣व ॥८९९॥
स्वर रहित मन्त्र
परिष्कृण्वन्ननिष्कृतं जनाय यातयन्निषः । वृष्टिं दिवः परि स्रव ॥८९९॥
स्वर रहित पद पाठ
परिष्कृण्वन् । परि । कृण्वन् । अनिष्कृतम् । अ । निष्कृतम् । जनाय । यातयन् । इषः । वृष्टिम् । दिवः । परि । स्रव ॥८९९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 899
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अब परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं।
पदार्थ
हे पवमान सोम अर्थात् पवित्रतादायक रसागार परमेश्वर ! आप (अनिष्कृतम्) अपरिष्कृत हृदय को (परिष्कृण्वन्) परिष्कृत करते हुए और (जनाय) उपासक मनुष्य के लिए (इषः) आक्रमणकारी विघ्नों की (यातयन्) हिंसा करते हुए (दिवः) आनन्दमय कोश से (वृष्टिम्) आनन्दरस की वर्षा (परि स्रव) प्रवाहित कीजिए ॥२॥
भावार्थ
जैसे बादल से वर्षा होने पर सूखी भूमि सरस हो जाती है, वैसे ही सबके आत्मा में स्थित परमात्मा के पास से आनन्दरस की वर्षा होने पर आत्मा, मन, बुद्धि आदि सब सरस और सप्राण हो जाते हैं ॥२॥
पदार्थ
(अनिष्कृतं परिष्कृण्वन्) असंस्कृत*31 हृदय को अपने आगमन से सुशोभित करता हुआ तू परमात्मन्! (जनाय-इषः-यातयन्) उपासकजन के लिये तेरे दर्शन ज्ञान आनन्दरूप इच्छाओं को प्राप्त कराने के हेतु*32 (दिवः-वष्टिं परिस्रव) अपने अमृतधाम से*33 रस—अमृतरस को*34 परिस्रवित कर—धारारूप में टपका दे॥२॥
टिप्पणी
[*31. “यद्वै निष्कृतं तत्संस्कृतम्” [ऐ॰ आ॰ १.१.४]।] [*32. “यातयति आयातयति” [निरु॰ १०.२२]।] [*33. “त्रिपादस्यामृतं दिवि” [ऋ॰ १०.९०.३]।] [*34. “रसो वृष्टिः” [मै॰ २.५.७]।]
विशेष
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विषय
ज्ञान की वर्षा
पदार्थ
यह बृहन्मति चारों ओर भ्रमण करता हुआ क्या करे – १. (अनिष्कृतम्) = अपरिष्कृत, अशिक्षित, असम्भय लोगों को (परिष्कृण्वन्) = परिष्कृत, शोभित व सभ्य बनाता हुआ विचरण करे । बृहन्मति का उद्देश्य यह है कि यह लोगों के जीवनों को बड़ा सुसंस्कृत कर दे– 'सत्य- शिव व सुन्दर' बना दे । २. इस उद्देश्य से वह (जनाय) = लोगों के लिए (इषः) = प्रेरणाओं को (यातयन्) = प्राप्त कराता है, सतत प्रेरणा ही लोगों के जीवन में परिवर्तन लाती है । ३. हे बृहन्मते ! तू (दिवः) = मस्तिष्करूपी द्युलोक से (वृष्टिम् परित्रव) = सर्वत्र ज्ञान की वर्षा करनेवाला हो। यह ज्ञान की वर्षा ही वासना-सन्तप्त लोगों को शान्ति देनेवाली होगी ।
भावार्थ
बृहन्मति का कर्त्तव्य है कि वह १. लोगों के जीवन को संस्कृत बनाये, २. उन्हें निरन्तर प्रेरणा दे और ३. ज्ञान की वर्षा करे ।
विषय
missing
भावार्थ
हे (सोम) परमात्मन् ! (प्र निष्कृतम्) संस्कार या परिष्कार रहित स्थान, गर्भाशय, या भूमि को (जनाय) जन्तुओं के उत्पत्ति के लिये (परिष्कृण्वन्) संस्कृत, स्वच्छ, परिष्कृत करते हुए (इषः) मनो कामनाओं, पुष्टिकारक पदार्थों, वा ओषधियों और अश्वों को (यातयन्) वहां स्वयं उत्पन्न करते हुए आप (दिवः) सूर्यलोक, आकाश या पुरुष दोनों पक्षों से (वृष्टिं) जलवर्षण बीजवपन आदि क्रिया के कार्य को (परिस्रव) करवाते हैं। समष्टि और व्यष्टि रूप से सृष्टि की उत्पत्ति समान रूप से वर्णित है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ आकृष्टामाषाः। २ अमहीयुः। ३ मेध्यातिथिः। ४, १२ बृहन्मतिः। ५ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निः। ६ सुतंभर आत्रेयः। ७ गृत्समदः। ८, २१ गोतमो राहूगणः। ९, १३ वसिष्ठः। १० दृढच्युत आगस्त्यः। ११ सप्तर्षयः। १४ रेभः काश्यपः। १५ पुरुहन्मा। १६ असितः काश्यपो देवलो वा। १७ शक्तिरुरुश्च क्रमेण। १८ अग्निः। १९ प्रतर्दनो दैवोदासिः। २० प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः, अथर्वाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः स्तौ तयोर्वान्यतरः। देवता—१—५, १०–१२, १६-१९ पवमानः सोमः। ६, २० अग्निः। ७ मित्रावरुणो। ८, १३-१५, २१ इन्द्रः। ९ इन्द्राग्नी ॥ छन्द:—१,६, जगती। २–५, ७–१०, १२, १६, २० गायत्री। ११ बृहती सतोबृहती च क्रमेण। १३ विराट्। १४ अतिजगती। १५ प्रागाधं। १७ ककुप् च सतोबृहती च क्रमेण। १८ उष्णिक्। १९ त्रिष्टुप्। २१ अनुष्टुप्। स्वरः—१,६, १४ निषादः। २—५, ७—१०, १२, १६, २० षड्जः। ११, १३, १५, १७ मध्यमः। १८ ऋषभः। १९ धैवतः। २१ गान्धारः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथ परमेश्वरः प्रार्थ्यते।
पदार्थः
हे पवमान सोम, पवित्रतादायक रसागार परमेश ! त्वम् (अनिष्कृतम्) अपरिष्कृतं हृदयम् (परिष्कृण्वन्) परिष्कुर्वन्, किञ्च (जनाय) उपासकाय (इषः) आक्रान्तॄन् विघ्नान्। [इष्यन्ति आक्रामन्ति इति इषः। इष गतौ, दिवादिः।] (यातयन्) हिंसन् [यातयतिः वधकर्मा। निघं० २।१९] (दिवः) आनन्दमयकोशात् (वृष्टिम्) आनन्दरसस्य धारासारम् (परि स्रव) प्रवाहय ॥२॥
भावार्थः
यथा मेघाद् वृष्टौ सत्यां शुष्का भूमिः सरसा जायते तथैव सर्वेषामात्मनि स्थितात् परमात्मनः सकाशाद् आनन्दरसस्य वृष्टौ सत्यामात्ममनोबुद्ध्यादयः सर्वे सरसाः सप्राणाश्च भवन्ति ॥२॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ९।३९।२।
इंग्लिश (2)
Meaning
O God, consecrating the unconsecrated worshipper, and bringing store of food to man, make Thou the rain descend from heaven !
Meaning
Go forward cleansing, purifying and perfecting the uninitiated, leading people to strive for food, energy and advancement. Indeed, bring the showers of the light of heaven on earth. (Rg. 9-39-2)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (अनिष्कृतं परिष्कृण्वन्) સંસ્કૃત હૃદયને તારા આગમનથી સુશોભિત કરીને તું પરમાત્મન્ ! (जनाय इषः यातयन्) ઉપાસક જનને માટે તારા દર્શન, જ્ઞાન, આનંદરૂપ ઇચ્છાઓને પ્રાપ્ત કરાવવા માટે (दिवः वष्टिं परिस्रव) તારા અમૃતધામથી ૨સ-અમૃતરસને સર્વત્રથી સ્રવિત કર-ધારારૂપમાં ટપકાવી દે. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
जसे मेघवर्षाव झाल्यावर ओसाड भूमी सरस (रसयुक्त) होते. तसेच सर्वांच्या आत्म्यात स्थित परमात्म्याकडून आनंदरसाची वृष्टी झाल्यावर आत्मा, मन, बुद्धी इत्यादी सर्व सरस व प्राणयुक्त होतात ॥२॥
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