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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 948
ऋषिः - प्रयोगो भार्गवः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
36
अ꣣यं꣡ विश्वा꣢꣯ अ꣣भि꣢꣫ श्रियो꣣ऽग्नि꣢र्दे꣣वे꣡षु꣢ पत्यते । आ꣢꣫ वाजै꣣रु꣡प꣢ नो गमत् ॥९४८॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣य꣢म् । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । श्रि꣡यः꣢꣯ । अ꣣ग्निः꣢ । दे꣣वे꣡षु꣢ । प꣣त्यते । आ꣢ । वा꣡जैः꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । नः । गमत् ॥९४८॥
स्वर रहित मन्त्र
अयं विश्वा अभि श्रियोऽग्निर्देवेषु पत्यते । आ वाजैरुप नो गमत् ॥९४८॥
स्वर रहित पद पाठ
अयम् । विश्वाः । अभि । श्रियः । अग्निः । देवेषु । पत्यते । आ । वाजैः । उप । नः । गमत् ॥९४८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 948
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 20; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 6; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 20; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 6; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि उपासना किया गया परमेश्वर हमारे लिए क्या करता है।
पदार्थ
(अयम्) यह (अग्निः) अग्रनायक परमेश्वर (देवेषु) उपासक सदाचारी विद्वानों में (विश्वाः श्रियः) सब आध्यात्मिक और बाह्य सम्पदाओं को (अभि पत्यते)प्राप्त कराता है। वह (वाजैः) दिव्य ऐश्वर्यों तथा बलों के साथ (नः) हमें (उप गमत्) प्राप्त होवे ॥३॥
भावार्थ
परमेश्वर का उपासक सब प्रकार के भौतिक एवं आध्यात्मिक बल और ऐश्वर्य अपने पुरुषार्थ से पाने योग्य हो जाता है ॥३॥
पदार्थ
(अयम्-अग्निः) यह अग्रणेता परमात्मा (विश्वाः-श्रियः) सारी श्री—लक्ष्मी शोभाओं का (देवेषु) देवों—मुमुक्षुओं के निमित्त (अभिपत्यते) स्वामित्व करता है*101 (नः-वाजैः-उपागमत्) वह हमें अमृत अन्न भोगों के साथ पास आवे—प्राप्त हो॥३॥
टिप्पणी
[*101. “पत्यते ऐश्वर्यकर्मा” [निघं॰ २.२१]।]
विशेष
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विषय
श्री-पति पुरुषोत्तम
पदार्थ
१. (अयम् अग्निः) = यह सब देवताओं का अग्रणी प्रभु ही (देवेषु) = देवताओं में जो (श्रियः) = श्री हैं (विश्वा:) = उन सबका (अभिपत्यते) = ईश है [पत् ऐश्वर्यकर्मा – नि० २.२१.२] । सूर्य, चन्द्र, अग्नि में जो तेज है, वह सब उस प्रभु की ही तो विभूति है। जलों में वे प्रभु रस हैं, तो वायु में वे प्राण हैं। पृथिवी में सब ओषधियों के उत्पादन की शक्ति भी तो उस प्रभु की ही है। बुद्धिमानों की बुद्धि प्रभु हैं – बलवानों का बल व तेजस्वियों का तेज वे प्रभु ही हैं ।
२. वे प्रभु (नः) = हमारे (उप) = समीप भी (वाजैः) = नाना प्रकार की शक्तियों से (आगमत्) = प्राप्त होते हैं। अन्नमयकोश में तेज, प्राणमयकोश में वीर्य, मनोमयकोश में ओज व बल, विज्ञानमयकोश में मन्यु तथा आनन्दमयकोश में सहस् को प्राप्त करानेवाले वे प्रभु ही हैं । इस प्रकार प्रभुकृपा से ही हम प्रत्येक कोश के वाज व ऐश्वर्य को प्राप्त करके ‘आभूति' बनते हैं। प्रभु से मेल मुझे सब कोशों की विभूति प्राप्त कराता है, अतः प्रभु से मेल करनेवाला 'प्रयोग' [उत्कृष्ट सम्पर्कवाला] ही इस मन्त्र का ऋषि है—यह भार्गव - अपना पूर्ण परिपाक करनेवाला तो है ही।
भावार्थ
श्रीमात्र को प्रभु का अंश जान मुझे अपने वाजों की श्री का गर्व न हो - यह सब तो उस प्रभु की ही देन है । श्रीपति तो पुरुषोत्तम प्रभु ही हैं ।
विषय
missing
भावार्थ
(देवेषु) दिव्यगुणों से युक्त समस्त पदार्थों, लोकों और विद्वानों से (अयं) यह (अग्निः) ज्ञानवान् परमात्मा (विश्वाः) समस्त (श्रियः) लक्ष्मियों को (अभिपत्यते) प्राप्त है, उनका स्वामी है। वह (नः) हमारे पास (वाजैः) अन्नों बलों ज्ञानों और कर्मों और ऐश्वर्यों द्वारा (उप आगमत्) हमें प्राप्त हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ आकृष्टामाषाः। २ अमहीयुः। ३ मेध्यातिथिः। ४, १२ बृहन्मतिः। ५ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निः। ६ सुतंभर आत्रेयः। ७ गृत्समदः। ८, २१ गोतमो राहूगणः। ९, १३ वसिष्ठः। १० दृढच्युत आगस्त्यः। ११ सप्तर्षयः। १४ रेभः काश्यपः। १५ पुरुहन्मा। १६ असितः काश्यपो देवलो वा। १७ शक्तिरुरुश्च क्रमेण। १८ अग्निः। १९ प्रतर्दनो दैवोदासिः। २० प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः, अथर्वाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः स्तौ तयोर्वान्यतरः। देवता—१—५, १०–१२, १६-१९ पवमानः सोमः। ६, २० अग्निः। ७ मित्रावरुणो। ८, १३-१५, २१ इन्द्रः। ९ इन्द्राग्नी ॥ छन्द:—१,६, जगती। २–५, ७–१०, १२, १६, २० गायत्री। ११ बृहती सतोबृहती च क्रमेण। १३ विराट्। १४ अतिजगती। १५ प्रागाधं। १७ ककुप् च सतोबृहती च क्रमेण। १८ उष्णिक्। १९ त्रिष्टुप्। २१ अनुष्टुप्। स्वरः—१,६, १४ निषादः। २—५, ७—१०, १२, १६, २० षड्जः। ११, १३, १५, १७ मध्यमः। १८ ऋषभः। १९ धैवतः। २१ गान्धारः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथोपासितः परमेश्वरोऽस्मभ्यं किं करोतीत्याह।
पदार्थः
(अयम्) एषः (अग्निः) अग्रनायकः परमेश्वरः (देवेषु) उपासकेषु सदाचारिषु विद्वत्सु (विश्वाः श्रियः) सर्वाः आध्यात्मिकीः बाह्याश्च सम्पदः (अभि पत्यते) अभि प्रापयति। [पत्लृ गतौ भ्वादिः, विकरणव्यत्ययः, लुप्तणिच्कः प्रयोगः।] सः (वाजैः) दिव्यैः ऐश्वर्यैः बलैश्च सह (नः) अस्मान् (उप गमत्) उपगच्छन्तु ॥३॥
भावार्थः
परमेश्वरोपासकः सर्वविधानि भौतिकान्याध्यात्मिकानि बलान्यैश्वर्याणि च स्वपुरुषार्थेन प्राप्तुमर्हति ॥३॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ८।१०२।९।
इंग्लिश (2)
Meaning
This God is the Lord Supreme of all glories midst the learned. May He come nigh unto us with strength and knowledge.
Meaning
This Agni among all the divinities of nature and humanity creates, sustains and rules over all the beauties, graces and grandeurs of life. May the lord come to us and bless us with all kinds of knowledge, power, wealth and honour. (Rg. 8-102-9)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (अयम् अग्निः) એ અગ્રણી પરમાત્મા (विश्वाः श्रियः) સમસ્ત શ્રી-લક્ષ્મી-શોભાઓનું (देवेषु) દેવો-મુમુક્ષુઓ ને માટે (अधिपत्यते) સ્વામિત્વ કરે છે, તે પરમાત્મા (नः वाजैः उपागमत्) અમને અમૃત અન્ન ભોગોની સાથે પાસે આવે-પ્રાપ્ત થાય. (૩)
मराठी (1)
भावार्थ
परमेश्वराचा उपासक सर्व प्रकारचे भौतिक व आध्यात्मिक बल आणि ऐश्वर्य आपल्या पुरुषार्थाने प्राप्त करण्यायोग्य बनतो. ॥३॥
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