अथर्ववेद के काण्ड - 11 के सूक्त 9 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 11/ सूक्त 9/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - काङ्कायनः देवता - अर्बुदिः छन्दः - त्र्यवसाना सप्तपदा विराट्शक्वरी सूक्तम् - शत्रुनिवारण सूक्त
    पदार्थ -

    (ये) जो (बाहवः) भुजाएँ, (याः) जो (इषवः) बाण, (च) और (धन्वनाम्) धनुषों के (वीर्याणि) वीर कर्म हैं [उनको] (असीन्) तरवारों, (परशून्) परसाओं [कुल्हाड़ों], (आयुधम्) अस्त्र-शस्त्र को, (च) और (यत्) जो कुछ (हृदि) हृदय में (चित्ताकूतम्) विचार और सङ्कल्प है, (तत् सर्वम्) उस सब [कर्म] को (अर्बुदे) हे अर्बुदि ! [शूर सेनापति राजन्] (त्वम्) तू (अमित्रेभ्यः दृशे) अमित्रों के लिये देखने को (कुरु) कर, (च) और (उदारान्) [हमें अपने] बड़े उपायों को (प्र दर्शय) दिखादे ॥१॥

    भावार्थ -

    सेनापति राजा अपने योद्धाओं, अस्त्र-शस्त्रों, हृदय के विचारों और मनोरथों को दृढ़ करके शत्रुओं को रोके और प्रजा की यथावत् रक्षा करे ॥१॥

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