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अथर्ववेद के काण्ड - 16 के सूक्त 9 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 2
    ऋषिः - सोम, पूषा देवता - आर्ची उष्णिक् छन्दः - यम सूक्तम् - दुःख मोचन सूक्त
    45

    तद॒ग्निरा॑ह॒तदु॒ सोम॑ आह पू॒षा मा॑ धात्सुकृ॒तस्य॑ लो॒के ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तत् । अ॒ग्नि: । आ॒ह॒ । तत् । ऊं॒ इति॑ । सोम॑: । आ॒ह॒ । पू॒षा । मा॒ । धा॒त् । सु॒ऽकृ॒तस्य॑ । लो॒के ॥९.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तदग्निराहतदु सोम आह पूषा मा धात्सुकृतस्य लोके ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तत् । अग्नि: । आह । तत् । ऊं इति । सोम: । आह । पूषा । मा । धात् । सुऽकृतस्य । लोके ॥९.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 16; सूक्त » 9; मन्त्र » 2
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    हिन्दी (4)

    विषय

    सुख की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (तत्) यह (अग्निः)ज्ञानस्वरूप परमेश्वर (आह) कहता है, (तत् उ) यही (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (आह) कहता है, (पूषा) पोषण करनेवाला जगदीश्वर (मा) मुझे (सुकृतस्य) पुण्य कर्मके (लोके) लोक [समाज] में (धात्) रक्खे ॥२॥

    भावार्थ

    परमात्मा निरन्तरआज्ञा देता है कि मनुष्य सदा धर्मात्माओं के समाज में रह कर उन्नति करे ॥२॥इसमन्त्र का कुछ भाग आ चुका है-अ० ८।५।५ ॥

    टिप्पणी

    २−(तत्) इदम् (अग्निः)ज्ञानस्वरूपपरमेश्वरः (आह) ब्रवीति। उपदिशति (तत्) (उ) एव (सोमः) सर्वोत्पादकःपरमात्मा (आह) (पूषा) सर्वपोषकजगदीश्वरः (मा) माम् (धात्) दध्यात् (सुकृतस्य)पुण्यकर्मणः (लोके) समाजे ॥

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    विषय

    अग्नि+सोम

    पदार्थ

    १. (तत्) = गतमन्त्र में कही गई उस बात को कि 'हमारा विजय हो, हमारा उदय हो, मैं सब शत्रुसैन्यों को पादाक्रान्त करता हूँ' (अग्निः आह) = अग्नि कहता है। आगे बढ़ने की वृत्तिवाला पुरुष ही विजय व उदय की बात को कह सकता है। (उ) = और (तत्) = उस बात को (सोम) = सौम्य स्वभाव का, निरभिमान पुरुष (आह) = कहता है। अग्नि की तेजस्वितावाला, परन्तु शान्त व्यक्ति ही विजय व उदय को सिद्ध कर पाता है। २. यह प्रार्थना करता है कि (पूषा) = वह सबका पोषक प्रभु (मा) = मझे (सुकृतस्य लोके धात्) = पुण्य के प्रकाश में धारण करे। प्रभु के अनुग्रह व प्रेरणा से मैं कभी भी पुण्य के मार्ग से विचलित न होऊँ।

    भावार्थ

    अग्नि व सोम का अपने में समन्वय करता हुआ मैं निरन्तर विजयी व उन्नत बनूं। प्रभु मुझे सन्मार्ग में स्थापित करें।

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    भाषार्थ

    (तद्) उस "जितम्" विजय, और "उद्भिन्नम्" शत्रुदल के उद्भेदन के सम्बन्ध में (अग्निः) अग्रणी अर्थात् राष्ट्र के प्रधान मन्त्री ने, (आह) मुझ राजा को सूचित किया है, (तद् उ) उस के सम्बन्ध में, निश्चय से, (सोमः) सेना के प्रेरक ने (आह) मुझ राजा को सूचित किया है। (पूषा) पुष्टि प्रदाता परमेश्वर (मा) मुझ राजा को (सुकृतस्य) सुकर्मियों के (लोके) समाज में (धात्) स्थापित करे।

    टिप्पणी

    [अग्निः = अग्रणीर्भवति (निरु० ७।४।१४)। तथा अङ्गति गच्छति प्राप्नोति जानाति वा स अग्निः (उणा० ४।५१, महर्षि दयानन्द)। अग्नि शब्द के अर्थ "जानाति" द्वारा अग्नि को ज्ञानवान् व्यक्ति भी कहा है। सोमः =सेना प्रेरक; षू प्रेरणे। यथा "इन्द्र एषां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः। देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्तु मध्ये ॥" (अथर्व० १९।१३।९) में "सोम” को “पुर एतु" द्वारा सेना के आगे आगे चलने वाला कहा है। पूषा =पोषण तत्त्व या पुष्टि देने वाला परमेश्वर। युद्ध में सत्यपक्ष को परमेश्वर पुष्टि प्रदान करता है। सत्यपक्ष वाले वे राष्ट्र होते हैं जो कि शान्तिप्रिय हैं, और निज स्वार्थ के लिये परराष्ट्र पर आक्रमण नहीं करते। आखिरकार "सत्यमेव जयते नानृतम्” के अनुसार सत्य की ही विजय होती है। सुकृतस्य लोके= सुकर्मी-राजाओं के समाज में। वे राजा सुकर्मी है जोकि भूमि और सम्पत्ति के लोभ से पर-राष्ट्र पर आक्रमण नहीं करते। लोक = लोग, समाज। यथा 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥" (गोता (३।२१) में लोक का अर्थ है लोग। "लोके" पद द्वारा परलोक न जान कर इहलोक अर्थ ही जानना चाहिये]

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    विषय

    ऐश्वर्य प्राप्ति।

    भावार्थ

    (अग्निः तत् आह) अग्नि इस बात का उपदेश करता है, (सोमः उ तत् आह) सोम भी इसी का उपदेश करता है। (पूषा) पुष्टिकारक भागधुक् नामक अध्यक्ष (मा) मुझ को (सुकृतस्य लोके) सुकृत अर्थात् पुण्य के लोक में (धात्) स्थापित करे।

    टिप्पणी

    ‘न आधात्’ इति मै० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    चत्वारि वै वचनानि। १ प्रजापतिः, २ मन्त्रोक्ता देवता च, ३, ४ आसुरी गायत्री, १ आसुरी अनुष्टुप, २ आर्च्युष्णिक्, ३ साम्नी पंक्तिः, ४ परोष्णिक्। चतुर्ऋचं नवमं पर्यायसूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    This is what Agni, lord of light and fire of life, said, this is what Soma, lord of peace and universal happiness, said for me: “May Pusha, lord of life and nourishment, bless you”. I pray: May Pusha establish me in the world of noble action and blessed joy.

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    Translation

    The adorable Lord says so; the blissful Lord also says so. May the nourisher Lord set me in the world of virtuous.

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    Translation

    This is the work of Agni, the men of great wisdom and also says this soma, the men of practical yougi feats “May Pushan, the all subsisting force of the universe place me in the world or sphere of merits.

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    Translation

    Thus does the Wise God preach. Thus does the All-creating God ordain. May the All-sustaining God keep me in the society of the virtuous

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(तत्) इदम् (अग्निः)ज्ञानस्वरूपपरमेश्वरः (आह) ब्रवीति। उपदिशति (तत्) (उ) एव (सोमः) सर्वोत्पादकःपरमात्मा (आह) (पूषा) सर्वपोषकजगदीश्वरः (मा) माम् (धात्) दध्यात् (सुकृतस्य)पुण्यकर्मणः (लोके) समाजे ॥

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