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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 11 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 11/ मन्त्र 6
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - मन्त्रोक्ताः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शान्ति सूक्त
    43

    तद॑स्तु मित्रावरुणा॒ तद॑ग्ने॒ शं योर॒स्मभ्य॑मि॒दम॑स्तु श॒स्तम्। अ॑शी॒महि॑ गा॒धमु॒त प्र॑ति॒ष्ठां नमो॑ दि॒वे बृ॑ह॒ते साद॑नाय ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तत्। अ॒स्तु॒। मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒। तत्। अ॒ग्ने॒। शम्। योः। अ॒स्मभ्य॑म्। इ॒दम्। अ॒स्तु॒। श॒स्तम्। अ॒शी॒महि॑। गा॒धम्। उ॒त। प्र॒ति॒ऽस्थाम्। नमः॑। दि॒वे। बृ॒ह॒ते। सद॑नाय ॥११.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने शं योरस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम्। अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां नमो दिवे बृहते सादनाय ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तत्। अस्तु। मित्रावरुणा। तत्। अग्ने। शम्। योः। अस्मभ्यम्। इदम्। अस्तु। शस्तम्। अशीमहि। गाधम्। उत। प्रतिऽस्थाम्। नमः। दिवे। बृहते। सदनाय ॥११.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 11; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    इष्ट की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (मित्रावरुणा) हे स्नेही और श्रेष्ठ माता-पिता ! दोनों और (अग्ने) हे विद्वान् आचार्य ! (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (तत्) यही (शम्) शान्तिदायक [रोगनाशक], (तत्) यही (योः) भयनिवारक (अस्तु) होवे और (इदम्) यही (शस्तम्) बड़ाई योग्य (अस्तु) होवे। [कि] (गाधम्) गम्भीरता, (प्रतिष्ठाम्) प्रतिष्ठा [गौरव] (उत) और (नमः) सत्कार को (दिवे) कामनायोग्य (बृहते) विशाल (सदनाय) स्थान के लिये (अशीमहि) हम पावें ॥६॥

    भावार्थ

    मनुष्य माता, पिता और आचार्य आदि विद्वानों की सेवा से उत्तम गुण प्राप्त करके संसार में गम्भीर, प्रतिष्ठित और आदरयोग्य होकर उच्च पद पावें ॥६॥

    टिप्पणी

    यह मन्त्र ऋग्वेद में है−५।४७।७ ॥ ६−(तत्) वक्ष्यमाणम् (अस्तु) (मित्रावरुणा) हे स्नेहिश्रेष्ठौ मातापितरौ (तत्) (अग्ने) हे विद्वन्नाचार्य (शम्) शान्तिकरम्। रोगनाशकम् (योः) सू० १० म० १। भयनिवारकम् (अस्मभ्यम्) (इदम्) (अस्तु) (शस्तम्) प्रशंसनीयम् (अशीमाहि) अशू व्याप्तौ-विधिलिङि विकरणस्य लुक्। अश्नुवीमहि। प्राप्नुयाम् (गाधम्) गाधृ प्रतिष्ठालिप्सयोर्ग्रन्थे च-घञ्। गाम्भीर्यम् (उत) अपि (प्रतिष्ठाम्) गौरवम् (नमः) सत्कारम् (दिवे) कमनीयाय (बृहते) महते (सदनाय) स्थानाय। अधिकाराय ॥

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    विषय

    गाधम्, प्रतिष्ठाम्

    पदार्थ

    १.हे (मित्रावरुणा) = स्नेह व निर्देषता के भावो! (तत्) = गतमन्त्र में वर्णित वह 'उरुगाय' [विशाल वेदज्ञान] (अस्तु) = हमें प्राप्त हो। (अग्ने) = हे अग्नणी-आगे बढ़ने की भावने ! (तत्) = [अस्तु]-हमें वेदज्ञान प्राप्त हो। इस वेदज्ञान ने ही वस्तुत: हमें 'मित्र-वरुण-व अग्नि' बनाना है। (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (इदम्) = यह ज्ञान (शम्) = शान्ति देनेवाला व (यो:) = भयों को दूर करनेवाला (अस्तु) = हो। यह हमारे लिए (शस्तम्) = प्रशस्त हो-यह हमारे जीवनों को उत्तम बनाए। २. इस वेदज्ञान से ही हम (गाधम्) = इष्ट ऐश्वर्य को [गाध-लिप्सा] (उत्) = और (प्रतिष्ठाम्) = प्रतिष्ठा को (अशीमहि) = प्राप्त करें। हम उस-उस (दिवे) = प्रकाशमय (बृहते) = विशाल (सादनाय) = सबके आश्रयभूत प्रभु के लिए (नम:) = नमस्कार करें।

    भावार्थ

    स्नेह, निषता व प्रगति की भावना को अपनाकर हम अपने ज्ञान को बढ़ाएँ। यह ज्ञान हमें इष्ट ऐश्वर्य व प्रतिष्ठा प्रास कराए। हम प्रात:-सायं उस महान् आश्रय प्रभु के प्रति नतमस्तक हों।

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    भाषार्थ

    (मित्रावरुणा) हे स्नेह करने वाले, तथा कष्टों का निवारण करने वाले माता-पिता! आपके संग से (तद्) वह (शम्) सुख हमें (अस्तु) प्राप्त हो, और (तत्) वह (योः) कष्टों का निवारण हो। तथा (अग्ने) हे सर्वाग्रणी परमेश्वर! आप की कृपा से (अस्मभ्यम्) हमें (इदम्) यह (शस्तम्) प्रशंसनीय उत्तम जीवन (अस्तु) प्राप्त हो। तथा (गाधम्) गम्भीरता को (उत) और (प्रतिष्ठाम्) प्रतिष्ठा को (अशीमहि) हम प्राप्त करें, और (सादनाय) उत्तमस्थिति प्राप्त करने के लिए हम (दिवे) ज्योतिःस्वरूप (बृहते) आप महाब्रह्म को (नमः) नमस्कार किया करें।

    टिप्पणी

    [मित्रावरुणा= माता-पिता; गाधम्= गम्भीरता; नमः= सत्कार (ऋग्भाष्य ७.४७.७) महर्षि दयानन्द। मित्र=मिद् स्नेहने। वरुण= निवारण करनेवाला।]

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    विषय

    शान्ति की प्रार्थना।

    भावार्थ

    हे (मित्रावरुणा) मित्र, मरण से बचाने वाले और (वरुणा) सर्व दुःखवारक सर्वश्रेष्ठ प्राण और अपान और हे (अग्ने) अग्ने, जाठर शक्ते ! अथवा हे दिन और रात्रि ! और हे अग्ने ! सूर्य ! अथवा हे मित्र और वरुण, राजा और न्यायाधीश और हे अग्ने ! अग्रणी सेनापते ! (अस्मभ्यम्) हमें (तत्) वह (तत्) वह नाना प्रकार के पदार्थ (शम्) शांतिदायक और (यो) रोग, विपत्तिनाशक (अस्तु) प्राप्त हों, (इदम्) यह प्राप्त पदार्थ भी (शस्तम् अस्तु) उत्तम, लाभदायक, श्रेष्ठ ही हो। हम (गाधम्) अपने अभिलषित ऐश्वर्य और (प्रतिष्ठाम्) प्रतिष्ठा कीर्त्ति का (अशीमहि) लाभ करें और (बृहते) बड़े भारी (सादनाय) आश्रय प्राप्त करने के लिये (दिवे) द्यौलाक के समान विशाल पृथिवी का (नमः) हम अपने वश करें।

    टिप्पणी

    (तृ०) ‘गातुमुत’ (च०) ‘साधनाय’ इति पैप्प० सं०। ‘तिस्रोद्यावः’, ‘त्रिदिव’ इत्यादौ दिव् शब्दो लोकवचनः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शान्तिकामा ब्रह्मा ऋषिः। सोमो देवता । त्रिष्टुभः। षडृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Shanti

    Meaning

    O Mitra, divine spirit of love and friendship, O Varuna, divine spirit of justice and wisdom, saviour from suffering, O Agni, leading light of life, may that auspicious peace be with us, for us. May this auspicious freedom from fear and suffering be with us, for us. May we achieve that depth and seriousness, that unshakable stability of life. Salutations to you, Lord of Heaven and Infinity, for peace and security in a happy home.

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    Translation

    May this our praise, O Lord of light and bliss, be appreciated by you. May it. O adorable Lord, be valued by you, as the means of health and happiness to us. May we then obtain depth (of life) and stability. We offer reverence to the vast celestial region. (Rg.V.47.7)

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    Translation

    O friend and great man, O teacher, May that which is auspicious be mine that which is free from danger be mine and even this of mine be auspicious. We may enjoy great Prosperity and fame. Our homage to Vedic Knowledge and speech for the higher attainment.

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    Translation

    O God, Who are Friendly and Just and Radiant all these things be peaceful and evil-removing for us. May all this be most gracious for us. We may enjoy fortune and glory. May we have full control over vast earth and heavens for our residence.

    Footnote

    cf. Rig. 5.47.7. This is a prayer for the highest prosperity and well-being on earth.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह मन्त्र ऋग्वेद में है−५।४७।७ ॥ ६−(तत्) वक्ष्यमाणम् (अस्तु) (मित्रावरुणा) हे स्नेहिश्रेष्ठौ मातापितरौ (तत्) (अग्ने) हे विद्वन्नाचार्य (शम्) शान्तिकरम्। रोगनाशकम् (योः) सू० १० म० १। भयनिवारकम् (अस्मभ्यम्) (इदम्) (अस्तु) (शस्तम्) प्रशंसनीयम् (अशीमाहि) अशू व्याप्तौ-विधिलिङि विकरणस्य लुक्। अश्नुवीमहि। प्राप्नुयाम् (गाधम्) गाधृ प्रतिष्ठालिप्सयोर्ग्रन्थे च-घञ्। गाम्भीर्यम् (उत) अपि (प्रतिष्ठाम्) गौरवम् (नमः) सत्कारम् (दिवे) कमनीयाय (बृहते) महते (सदनाय) स्थानाय। अधिकाराय ॥

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