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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 25 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 25/ मन्त्र 1
    ऋषिः - गोपथः देवता - वाजी छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अश्व सूक्त
    108

    अश्रा॑न्तस्य त्वा॒ मन॑सा यु॒नज्मि॑ प्रथ॒मस्य॑ च। उत्कू॑लमुद्व॒हो भ॑वो॒दुह्य॒ प्रति॑ धावतात् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अश्रा॑न्तस्य। त्वा॒। मन॑सा। यु॒नज्म‍ि॑। प्र॒थ॒मस्य॑। च॒। उत्ऽकू॑लम्। उ॒त्ऽव॒हः। भ॒व॒। उ॒त्ऽउह्य॑। प्रति॑। धा॒व॒ता॒त् ॥२५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अश्रान्तस्य त्वा मनसा युनज्मि प्रथमस्य च। उत्कूलमुद्वहो भवोदुह्य प्रति धावतात् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अश्रान्तस्य। त्वा। मनसा। युनज्म‍ि। प्रथमस्य। च। उत्ऽकूलम्। उत्ऽवहः। भव। उत्ऽउह्य। प्रति। धावतात् ॥२५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 25; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शूरों के लक्षण का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे शूर !] (अश्रान्तस्य) अनथके (च) और (प्रथमस्य) पहिले पदवाले पुरुष के (मनसा) मन से (त्वा) तुझको (युनज्मि) मैं संयुक्त करता हूँ। (उत्कूलम्) ऊँचे तट की ओर चलकर (उद्वह) ऊँचा ले चलनेवाला (भव) हो, और [मनुष्यों को] (उदुह्य) ऊँचे ले जाकर (प्रति) प्रतीति से (धावतात्) दौड़ ॥१॥

    भावार्थ

    परमेश्वर आज्ञा देता है कि हे मनुष्य तू निरालसी नेता पुरुषों के समान पुरुषार्थ कर, और जैसे चतुर नाविक सावधानी से धार को काटता हुआ बलप्रवाह के ऊपर की ओर यात्रियों को ठिकाने पर उतारता है, वैसे ही पराक्रमी पुरुष सबको कठिनाई से निकालकर सुख पहुँचावे ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(अश्रान्तस्य) श्रमरहितस्य (त्वा) त्वां पुरुषार्थिनम् (मनसा) अन्तःकरणेन। मननेन (युनज्मि) संयोजयामि (प्रथमस्य) प्रधानपदस्थस्य (च) (उत्कूलम्) यथा भवति तथा। ऊर्ध्वतटं प्रति गत्वा (उद्वहः) उद्वहति ऊर्ध्वं नयतीति, वह प्रापणे-अच्। उन्नेता। प्रधानः (भव) (उदुह्य) उन्नीय मनुष्यान् (प्रति) प्रतीत्या (धावतात्) धावं। शीघ्रं गच्छ ॥

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    विषय

    वाजी

    पदार्थ

    १. मार्ग पर बढ़ता हुआ व्यक्ति लक्ष्य-स्थान पर पहुँचता ही है, अतः प्रभु कहते हैं कि हे जीव ! (त्वा) = तुझे उस पुरुष के (मनसा) = मन से (युनज्मि) = युक्त करता हूँ जोकि (अश्रान्तस्य) = कभी थकता नहीं-ऊब नहीं जाता-मार्ग पर बढ़ता ही चलता है, (च) = और अतएव (प्रथमस्य) = प्रथम स्थान में स्थित होता है। प्रथम स्थान में स्थित होने के संकल्पवाले पुरुष के मन से मैं तुझे जोड़ता हूँ। तू अश्रान्तभाव से आगे बढ़ता ही चल। २. (उत्कूलम् उद्धहः) = जैसे नदी किनारों को भी लांघकर उमड़ पड़ती है, उसी प्रकार तू सब विघ्नों को-रुकावटों को लाँधकर ऊपर उठनेवाला (भव) = हो। (उदुह्य) = अपने को सब विघ्न-बाधाओं से ऊपर उठाकर प्रति (धावतात्) = तू लक्ष्य स्थान की ओर वेग से बढ़नेवाला हो।

    भावार्थ

    हम अनान्त मन से प्रथम स्थान पर पहुँचने के लिए आगे बढ़ते चलें। सब विघ्नों को पार करके लक्ष्य स्थान की ओर बढ़ें। किसी भी विघ्न-बाधा से न रुकनेवाला 'अथर्वा' अगले सूक्त का ऋषि है -

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    भाषार्थ

    हे सम्राट्! (त्वा) तुझे (अश्रान्तस्य) अथक-परिश्रमी (च) और (प्रथमस्य) राष्ट्र के प्रथम पुरुष अर्थात् अग्नि (१९.८.१) सर्वाग्रणी प्रधानमन्त्री के (मनसा) विचारों के साथ (युनज्मि) मैं पुरोहित संयुक्त करता हूँ। (उत्कूलम्) ऊँचाई के उच्च-तट की ओर (उद्वहः) प्रजाजन को ऊँचे ले जानेवाला (भव) तू हो, (उदुह्य) और ऊँचे ले जाकर (प्रति) और अधिक ऊँचाई की ओर (धावतात्) तू दौड़ लगा।

    टिप्पणी

    [उद्= ऊँचाई। ऊँचाई की कोई निश्चित सीमा नहीं होती। आर्थिक सामाजिक, सदाचारिक, आध्यात्मिक आदि नानाविध ऊँचाइयाँ हैं, तथा इनमें प्रत्येक की ऊँचाई असीमित है।]

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    विषय

    अश्व या वेगवान् यन्त्र या मृत्यु का वर्णन।

    भावार्थ

    हे पुरुष ! (त्वा) तुझे मैं (अश्रान्तस्य) अनथक और (प्रथम स्य च) सबसे श्रेष्ठ पुरुष के लिये (मनसा) मनन, ज्ञानपूर्वक (त्वा युनज्मि) तुझे गाड़ी में घोड़े की तरह नियुक्त करता हूं। (उत्कूलम्) अपने करारों को भी लांघकर नदी जिस प्रकार वेग से उनपर उमड़ आती है उसी प्रकार तू कार्य को (उद् वहः भव) वेग से पहुंचाने वाला हो। और (उद् उह्म) स्वामी के कार्य को या स्वामी को ही अपने ऊपर लेकर (प्रति धावतात्) उसी स्थान की तरफ़ वेग से चल पड़। वेगवान अश्व या अग्नि, विद्युत् आदि यन्त्रमय रथ के पक्ष में भी—हे वेगवान् यन्त्र ! तु अनथक, सर्वश्रेष्ठ है इस विचार से तुझे में लगाता हूं तू उमड़ती नदी के समान भार को उठाकर चल और उसे उठाकर शीघ्र दौड़।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गोपथ ऋषिः। वाजी देवता। अनुष्टुप्। एकर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Leader

    Meaning

    O man, O Ruler, I call upon you and join you with the mind and will of the first and indefatigable order of the Dominion. Be the pioneer to rise and lead the nation to the top, and having led us there, move on farther and higher.

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    Subject

    Vaji : To a horse

    Translation

    I yoke you with the mind of one, who is unwearied and determined to remain (come) first. Be a swimmer against the stream and a bearer uphill. Bearing me up: gallop to the destination.

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    Translation

    O mighty man, I yoke you (with the tremendous job of ruling the subject) with the spirit of the man indefatigable ever and first in the rank. You, the bearer of this responsibility over-coming the mount of difficulties and you advance on your path with speed bearing this heavy weight.

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    Translation

    O man, I (God) unite you with the mind of an untiring person, fit to be the foremost among all. Successfully carrying the burden of all your duties against odds, rush forward, on this race-course of life, excelling all by the successful performance of your responsibilities.

    Footnote

    This verse is very instructive, teaching man how to overcome all difficulties and troubles with a determined mind and doggest persistence. That is the only way to excel others in life-struggle.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अश्रान्तस्य) श्रमरहितस्य (त्वा) त्वां पुरुषार्थिनम् (मनसा) अन्तःकरणेन। मननेन (युनज्मि) संयोजयामि (प्रथमस्य) प्रधानपदस्थस्य (च) (उत्कूलम्) यथा भवति तथा। ऊर्ध्वतटं प्रति गत्वा (उद्वहः) उद्वहति ऊर्ध्वं नयतीति, वह प्रापणे-अच्। उन्नेता। प्रधानः (भव) (उदुह्य) उन्नीय मनुष्यान् (प्रति) प्रतीत्या (धावतात्) धावं। शीघ्रं गच्छ ॥

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