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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 35 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 35/ मन्त्र 5
    ऋषिः - अङ्गिराः देवता - जङ्गिडो वनस्पतिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - जङ्गिड सूक्त
    49

    य ऋ॒ष्णवो॑ दे॒वकृ॑ता॒ य उ॒तो व॑वृ॒तेऽन्यः। सर्वां॒स्तान्वि॒श्वभे॑षजोऽर॒सां ज॑ङ्गि॒डस्क॑रत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ये। ऋ॒ष्णवः॑। दे॒वऽकृ॑ताः। यः। उ॒तो इति॑। व॒वृ॒ते। अ॒न्यः। सर्वा॑न्। तान्। वि॒श्वऽभे॑षजः। अ॒र॒सान्। ज॒ङ्गि॒डः। क॒र॒त् ॥३५.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    य ऋष्णवो देवकृता य उतो ववृतेऽन्यः। सर्वांस्तान्विश्वभेषजोऽरसां जङ्गिडस्करत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ये। ऋष्णवः। देवऽकृताः। यः। उतो इति। ववृते। अन्यः। सर्वान्। तान्। विश्वऽभेषजः। अरसान्। जङ्गिडः। करत् ॥३५.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 35; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    सबकी रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (ये) जो (देवकृताः) उन्मत्तों के किये हुए (ऋष्णवः) हिंसक व्यवहार हैं, (उतो) और भी (यः) जो (अन्यः) दूसरा [खोटा व्यवहार] (ववृते) वर्तमान हुआ है। (तान् सर्वान्) उन सबको (विश्वभेषजः) सर्वौषध (जङ्गिडः) जङ्गिड [संचार करनेवाला औषध] (अरसान्) नीरस [निष्प्रभाव] (करत्) करे ॥५॥

    भावार्थ

    जो कोई रोग उन्मत्तों के कुकर्म अथवा अपने कुपथ्य से उत्पन्न होवे, मनुष्य जङ्गिड के सेवन से रोगनिवृत्ति करके सुखी रहें ॥५॥

    टिप्पणी

    ५−(ये) (ऋष्णवः) ग्लाजिस्थश्च ग्स्नुः। पा०३।२।१३९। ऋ हिंसायाम्-ग्स्नु। हिंसकव्यवहाराः (देवकृताः) दिवु कीडाविजिगीषामदादिषु, पचाद्यच्। देवैरुन्मत्तैः कृताः सम्पादिताः (यः) (उतो) अपि च (ववृते) वृतु वर्तने-लिट्। वर्तमानो बभूव (अन्यः) इतरो दुष्टव्यवहारः (सर्वान्) (तान्) (विश्वभेषजः) सर्वौषधः (अरसान्) निष्प्रभावान् (जङ्गिडः) (करत्) कुर्यात् ॥

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    विषय

    विश्वभषजः

    पदार्थ

    १. (ये) = जो (देवकृता:) = प्राकृतिक शक्तियों [देव-सूर्य, चन्द्र, वायु आदि] से उत्पन्न (ऋष्णव:) = [ऋष् to kill] उपद्रव हमारे शरीरों में हो जाते हैं, (उत) = और (य:) = जो (अन्यः) = अन्य भी कोई उपद्रव (उ) = निश्चय से (ववृते) = प्रवृत्त हो जाता है-अधिक खा लेने आदि गलतियों से उपद्रव हो जाते हैं। (तान् सर्वान्) = उन सब उपद्रवों को यह (जङ्गिड:) = वीर्यमणि (अरसान् करत्) = निष्प्रभाव कर दे। यह वीर्यमणि तो (विश्वभेषजः) = सब उपद्रवों का औषध है।

    भावार्थ

    शरीर में सुरक्षित बीर्य सब आधिदैविक व आध्यात्मिक कष्टों से हमें बचाता शरीर, मन व मस्तिष्क के दोषों को दूर करके यह व्यक्ति 'ब्रह्मा' बनता है। यह इस वीर्यमणि को 'शतवार' मणि के रूप में स्मरण करता है-शतवर्षपर्यन्त, अर्थात् आजीवन जो वरणीय है और रोगों का निवारण करनेवाली है -

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    भाषार्थ

    (ये) जो (ऋष्णवः) रोगजन्य-हिंसाएँ (देवकृताः) प्राकृतिक शक्तियों द्वारा की गई हैं, (उत उ) और (ये) जो (अन्यः) प्राकृतिक शक्तियों से भिन्न कारणों से रोग (ववृते) प्रवृत्त हो जाते हैं, (विश्वभेषजः) उन सब रोगों की औषधरूप (जङ्गिडः) जङ्गिड औषध (तान् सर्वान्) उन सब रोगों को (अरसान्) रसरहित, नीरस तथा निष्प्रभाव (करत्) करती है।

    टिप्पणी

    [ऋष्णवः=ऋ (रेषणे हिंसायाम्)+ग्स्नुः (प्रत्यय)+प्रथमा बहुवचन।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Jangida Mani

    Meaning

    Whatever the violent killer diseases, whether caused by natural forces or by infective body organs, or by any other, which come up and recur, may Jangida, general universal cure render them ineffectual.

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    Translation

    Whatever harmful acts are there perpetrated by the enlightened ones, and whatever other than these are there, may this all-cure jangida make them all powerless.

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    Translation

    Let this Jangida guard me from (the disease coming from) heaven, let it guard me from earth, let it guard me from firmament and let it guard me from plants. Let this protect from the disease coming from the past and let this protect me as Precautionary prophylactic from forthcoming diseases and thus let this Jangida protect us from all the quarters.

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    Translation

    Whatever troubles are man-made, brought by natural forces and created by the enemy, may all these be set at naught by the potent Jangida, which is the all-round physician or curer.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५−(ये) (ऋष्णवः) ग्लाजिस्थश्च ग्स्नुः। पा०३।२।१३९। ऋ हिंसायाम्-ग्स्नु। हिंसकव्यवहाराः (देवकृताः) दिवु कीडाविजिगीषामदादिषु, पचाद्यच्। देवैरुन्मत्तैः कृताः सम्पादिताः (यः) (उतो) अपि च (ववृते) वृतु वर्तने-लिट्। वर्तमानो बभूव (अन्यः) इतरो दुष्टव्यवहारः (सर्वान्) (तान्) (विश्वभेषजः) सर्वौषधः (अरसान्) निष्प्रभावान् (जङ्गिडः) (करत्) कुर्यात् ॥

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