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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 40 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 40/ मन्त्र 2
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - बृहस्पतिः, विश्वे देवाः छन्दः - पुरःककुम्मत्युपरिष्टाद्बृहती सूक्तम् - मेधा सूक्त
    61

    मा न॑ आपो मे॒धां मा ब्रह्म॒ प्र म॑थिष्टन। सु॑ष्य॒दा यू॒यं स्य॑न्दध्व॒मुप॑हूतो॒ऽहं सु॒मेधा॑ वर्च॒स्वी ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मा। नः॒। आपः॑। मे॒धाम्। मा। ब्रह्म॑। प्र। म॒थि॒ष्ट॒न॒। सु॒ऽस्य॒दाः। यू॒यम्। स्य॒न्द॒ध्व॒म्। उप॑ऽहूतः। अ॒हम्। सु॒ऽमे॑धाः। व॒र्च॒स्वी ॥४०.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मा न आपो मेधां मा ब्रह्म प्र मथिष्टन। सुष्यदा यूयं स्यन्दध्वमुपहूतोऽहं सुमेधा वर्चस्वी ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मा। नः। आपः। मेधाम्। मा। ब्रह्म। प्र। मथिष्टन। सुऽस्यदाः। यूयम्। स्यन्दध्वम्। उपऽहूतः। अहम्। सुऽमेधाः। वर्चस्वी ॥४०.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 40; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    बुद्धि बढ़ाने का उपदेश।

    पदार्थ

    (आपः) जल [के समान शान्तस्वरूप प्रजाओ] तुम (मा)(नः) हमारी (मेधाम्) धारणावती बुद्धि को और (मा)(ब्रह्म) वेदज्ञान को (प्र मथिष्टन) नष्ट करो। (सुष्यदाः) सहज में बहनेवाले (यूयम्) तुम (स्यन्दध्वम्) बहते जाओ। (उपहूतः) आवाहन किया हुआ (अहम्) मैं (सुमेधाः) सुन्दर बुद्धिवाला और (वर्चस्वी) बड़ा प्रतापी [हो जाऊँ] ॥२॥

    भावार्थ

    जैसे प्रभूत जल बे रोक-टोक सहज में बहता चला जाता है, वैसे ही मनुष्य सब विघ्नों को हटाकर अपने सन्तान आदि को बुद्धिमान् और प्रतापी बनावें ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(मा) निषेधे (नः) अस्माकम् (आपः) जलानीव शान्तस्वभावाः प्रजाः (मेधाम्) धारणावतीं बुद्धिम् (मा) निषेधे (ब्रह्म) वेदज्ञानम् (प्र मथिष्टन) मथे विलोडने-लोटि छान्दसं रूपम्। प्रमथत। प्रभ्रंशं कुरुत (सुष्यदाः) सु+स्यन्दू प्रस्रवणे-क, टाप्। सहजस्रवणशीलाः (यूयम्) (स्यन्दध्वम्) प्रवहत (उपहूतः) आहूतः (अहम्) (सुमेधाः) अ०५।११।१। सु+मेधा-असिच्। सुबुद्धियुक्तः (वर्चस्वी) प्रतापी, भूयासमिति शेषः ॥

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    भाषार्थ

    (आपः) हे आप्त जनो! आप (मा)(नः) हमारी (मेधाम्) बुद्धि को और (मा)(ब्रह्म) हमारे वेदज्ञान या ब्रह्मोपासाना को (प्र मथिष्टन) प्रमथित होने दें, विकृत होने दें। आप कृपया (स्यन्दध्वम्) हमारी ओर, मिलकर, प्रवाहरूप में आते रहिए, (सुष्यदाः) जैसे कि उत्तमरूप में प्रवाहित होनेवाले जल, मिलकर समुद्र की ओर प्रवाहित होते हैं। ताकि (अहम्) मैं आपके द्वारा (सुमेधाः) उत्तम बुद्धिवाला तथा (वर्चस्वी) कान्तिमान् होकर (उपहूतः) आप द्वारा प्रेमपूर्वक, बुलाए जाने वाला हो जाऊं।

    टिप्पणी

    [ब्रह्म=परमेश्वर ; मन्त्र;=वेद। ब्रह्मवेद=अथर्ववेद।]

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    विषय

    सुमेधा वर्चस्वी

    पदार्थ

    १. (आपः) = शरीरस्थ रेत:कणो! तुम (न:) = हमारी (मेधाम्) = बुद्धि को (मा) = मत (प्रमथिष्टन) = हिंसित होने दो और इसप्रकार ब्रह्म-हमारे ज्ञान को (मा) = मत नष्ट होने दो। ये रेत:कण ही तो ज्ञानाग्नि का ईंधन बनकर बुद्धि व ज्ञान का वर्धन करते हैं। २. (यूयम्) = हे रेत:कणो! तुम हमारे शरीरों में (शुष्यदा) = उत्तम प्रवाहोंवाले होकर (स्यन्दध्वम्) = प्रवाहित होओ। इन रेत:कों की सदा ऊर्ध्वगति हो और इसप्रकार दीप्त बुद्धि बनकर (उपहुत:) = आचार्यों से उनके समीप बुलाया गया (अहम्) = मैं (सुमेधाः) = उत्तम बुद्धिवाला (वर्चस्वी) = रोगापहारक प्राणशक्तिवाला बनें। सुरक्षित वीर्यकण हमें मस्तिष्क में 'सुमेधाः' तथा शरीर में 'वर्चस्वी' बनाते हैं।

    भावार्थ

    रेत:कणों के शरीर में ही ऊर्ध्वगतिवाला होने से हमारी बुद्धि व ज्ञान हिंसित नहीं होते। हम सुमेधा व वर्चस्वी बनते हैं।

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    विषय

    निर्दोष, मेघावी, ज्ञानी होने की प्रार्थना।

    भावार्थ

    (नः मेधाम्) हमारी मेधा, तीव्र बुद्धि को हे (आपः) आप्त पुरुषो ! आप लोग (मा प्र मथिष्टन) विनष्ट मत होने दो। (नः) हमारा (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञान, वेदाभ्यास भी (मा) मत नष्ट करो। (यूयम्) तुम (सुष्यदाः) सुख से बहते जलों के समान, सु-उत्तम ज्ञान-प्रवाह से युक्त होकर (स्यन्दध्वम्) प्रवाहित होवो, मेरे समीप आओ। अथवा पाठान्तर से (शुष्यद्। आ। यूयं। स्यन्दध्वम्) अर्थात् आप लोग मेरे सूखते हुए ब्रह्म वेदाभ्यास को पुनः (आस्यन्दध्वम्) प्रवाहित करो। (अहम्) मैं (उपहूतः) आप लोगों द्वारा स्वीकृत या अनुगृहीत होकर (सुमेधाः) उत्तम बुद्धि से युक्त और (वर्चस्वी) तेजस्वी होकर रहूं।

    टिप्पणी

    (द्वि०) ‘मा ब्रह्म प्रमथिष्ट नः’ इति च बहुत्र। ‘शुष्यदा’ इति च प्रायः। स्यन्नध्वं०, स्यंनध्व० स्पंचध्वं, स्यंदध्वं०, इति च पाठाः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्म ऋषिः। बृहस्पतिर्विश्वेदेवाश्च देवताः। १ परानुष्टुप्। २ त्रिष्टुप् पुरः ककुम्मती उपरिष्टाद् बृहती। ३ बृहतीगर्भा अनुष्टुप्। ४ त्रिपदा आर्षी गायत्री। चतुऋचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    For Intelligence, Medha

    Meaning

    O Apah, enlightened people of noble thought and action, O natural vibrations of mother knowledge, pray do not disturb our understanding, vision and imagination, do not shake up our right knowledge and faith. Moving on naturally at peace as before, keep moving on steadily with your plans and work, and whenever you call upon me, I too would act as a man of noble vision and intelligence worthy of my dignity and brilliance.

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    Translation

    O elemental waters, may you not crush our intelligence, nor our sacred knowledge. May you of easy flow, come on flowing. Favoured by you, may I become intelligent and lustrous.

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    Translation

    May Brihaspati, the teacher accompanied by all other men of enlightenment fill up that lack which I have in my spirit, which in voice and due to which the speech has approached to anger vehment.

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    Translation

    O truthful learned persons of high-integrity and character, please don’t let my intellect and Vedic knowledge get destroyed. Please cause this drying up source to have an easy flow again. Being favored by you, I may be intellectual and glorious.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(मा) निषेधे (नः) अस्माकम् (आपः) जलानीव शान्तस्वभावाः प्रजाः (मेधाम्) धारणावतीं बुद्धिम् (मा) निषेधे (ब्रह्म) वेदज्ञानम् (प्र मथिष्टन) मथे विलोडने-लोटि छान्दसं रूपम्। प्रमथत। प्रभ्रंशं कुरुत (सुष्यदाः) सु+स्यन्दू प्रस्रवणे-क, टाप्। सहजस्रवणशीलाः (यूयम्) (स्यन्दध्वम्) प्रवहत (उपहूतः) आहूतः (अहम्) (सुमेधाः) अ०५।११।१। सु+मेधा-असिच्। सुबुद्धियुक्तः (वर्चस्वी) प्रतापी, भूयासमिति शेषः ॥

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