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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 68 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 68/ मन्त्र 1
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - कर्म छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - वेदोक्तकर्म सूक्त
    126

    अव्य॑सश्च॒ व्यच॑सश्च॒ बिलं॒ वि ष्या॑मि मा॒यया॑। ताभ्या॑मु॒द्धृत्य॒ वेद॒मथ॒ कर्मा॑णि कृण्महे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अव्य॑सः। च॒। व्यच॑सः। च॒। बिल॑म्। वि। स्या॒मि॒। मा॒यया॑। ताभ्या॑म्। उ॒त्ऽहृत्य॑। वेद॑म्। अथ॑। कर्मा॑णि। कृ॒ण्म॒हे॒ ॥६८.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अव्यसश्च व्यचसश्च बिलं वि ष्यामि मायया। ताभ्यामुद्धृत्य वेदमथ कर्माणि कृण्महे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अव्यसः। च। व्यचसः। च। बिलम्। वि। स्यामि। मायया। ताभ्याम्। उत्ऽहृत्य। वेदम्। अथ। कर्माणि। कृण्महे ॥६८.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 68; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (अव्यसः) अव्यापक [जीवात्मा] के (च च) और (व्यचसः) व्यापक [परमात्मा] के (बिलम्) बिल [भेद] को (मायया) बुद्धि से (वि ष्यामि) मैं खोलता हूँ। (अथ) फिर (ताभ्याम्) उन दोनों के जानने के लिये (वेदम्) वेद [ऋग्वेद आदि ज्ञान] को (उद्धृत्य) ऊँचा लाकर (कर्माणि) कर्मों को (कृण्महे) हम करते हैं ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य जीवात्मा के कर्तव्य और परमात्मा के अनुग्रह समझने के लिये वेदों को प्रधान जानकर अपना-अपना कर्तव्य करते रहें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(अव्यसः) व्यचतिर्व्याप्तिकर्मा-असुन्,वर्णलोपश्छान्दसः। अव्यचसः। अव्यापकस्य जीवात्मनः (च) (व्यचसः) व्यापकस्य परमात्मनः (च) (बिलम्) छिद्रम्। गुप्तभेदम् (विष्यामि) स्यतिरुपसृष्टो विमोचने-निरु० १।१७। विवृणोमि। विमोचयामि (मायया) प्रज्ञया (ताभ्याम्) तौ ज्ञातुम् (उद्धृत्य) उद्गमय्य (वेदम्) ऋग्वेदादिवेदचतुष्टयं ज्ञानमूलम् (अथ) अनन्तरम् (कर्माणि) कर्तव्यानि (कृण्महे) कुर्महे ॥

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    भाषार्थ

    (अव्यसः= अव्यचसः च) अव्यापक के (व्यचसः च) और व्यापक के (बिलम्) भेद को (मायया) वैदिक प्रज्ञा द्वारा (वि ष्यामि) मैं खोलता हूँ, प्रकट करता हूँ। (ताभ्याम्) उन अव्यापक और व्यापक के परिज्ञान के लिए (वेदम् उद्धृत्य) वेद का उद्धरण कर या उदाहरण देकर (अथ) तदनन्तर (कर्माणि) कर्मों को (कृण्महे) हम करते हैं।

    टिप्पणी

    [व्यचसः= वि+अञ्च् (गतौ)+असुन्। अव्यसः= अ+व्यच्+असुन्। चकारलोपः छान्दसः। बिलम्= बिल्म=भिल्मं भासनमिति वा (निरु० १.६.२०); अर्थात् भेद को प्रकाशित करना। व्यापक है परमेश्वर, और अव्यापक है जीवात्मा और जगत्। इनके स्वरूपों का परिज्ञान वेद द्वारा होता है। निज उन्नति और मोक्ष के लिए जो भी कर्म किये जाएँ, वे वेदोक्त होने चाहिएँ, उनके लिए वैदिक प्रमाण होने चाहिएँ।]

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    विषय

    वेद-प्रमाण

    शब्दार्थ

    ( अव्यसः ) अव्यापक, एकदेशी ( च च ) और (व्यचसः) व्यापक, अनन्त के (बिलम्) भेद, मर्म, रहस्य को मैं (मायया) बुद्धि द्वारा (विष्यामि ) खोल देता हूँ । ( ताभ्याम् ) उन दोनों - व्यापक और एकदेशी पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हम (वेदम्) वेद को (उद्धत्य) उठाकर, प्रमाण मानकर (अथ) तदनन्तर (कर्माणि) विविध प्रकार के कार्यों को (कृण्महे) सम्पादन करते हैं ।

    भावार्थ

    यदि हम संसार के पदार्थों पर दृष्टि डालें तो हमें दो प्रकार के पदार्थ दिखाई देंगे - व्यापक और अव्यापक, अनन्त और सान्त, अपरिमित और परिमित, महान् और सूक्ष्म । संसार के सभी पदार्थों को इन दो भागों में विभक्त किया जा सकता है । वेद के स्वाध्याय से, वेद के पठन-पाठन, श्रवण, मनन और निदिध्यासन से इन पदार्थों का ज्ञान भली प्रकार हो जाता है । इन दो प्रकार के पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कर हम अपने लौकिक और पारलौकिक कार्यों को भली-भाँति कर सकते हैं । हमें वेद को प्रमाण मानकर वेदविहित कार्यों का ही अनुष्ठान करना चाहिए ; वेद विरुद्ध कार्यों को त्याग देना चाहिए ।

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    विषय

    'हृदय गुहा' के अन्धकार को दूर करना

    पदार्थ

    १. (अव्यस: च) = [अव्यचस:] अव्याप्त, परिच्छिन्न जीवात्मा के (व्यचसः च) = और व्याप्त परमात्मा के (बिलम्) = उपलब्धिस्थान हृदय को (मायया) = अज्ञान से (विष्यामि) = विमुक [विरहित] करता हूँ। हृदय के अज्ञानावृत होने पर कर्तव्याकर्त्तव्य विभाग ही नहीं होता, अत: कार्याकार्य विभाग के ज्ञान के शत्रुभूत इस मूडभाव को दूर करता हूँ। २. (ताभ्याम्) = जीवात्मा व परमात्मा के ज्ञान के हेतु से (वेदम्) = ज्ञान को (उद्धृत्य) = सम्पादित करके (अथ) = अब उस ज्ञान के अनुसार (कर्माणि कृण्महे) = हम अपने कर्त्तव्यकर्मों को करते हैं। ज्ञानपूर्वक कर्म करना ही प्रभु-प्राप्ति का मार्ग है।

    भावार्थ

    हम अपनी हृदय-गुहा को अज्ञान से मुक्त करके आत्मा व परमात्मा का दर्शन करें। इसी उद्देश्य से ज्ञानपूर्वक कर्मों में व्याप्त रहें।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The way to Karma

    Meaning

    With noble intelligence, I penetrate the mystery of the bounded and the boundless reality of matter, soul and Supersoul, and with these two, having opened, seen, and confirmed the Veda, we do our actions.

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    Subject

    Ceremonial performance

    Translation

    Into the openings of non-existing as well as of far extending, Center with thy skill, Lifting up the sacred knowledge from : these two, thereafter we proceed with the sacred actions (acts)

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    Translation

    I through penetrative intelligence explode the mystery of won-pervasive entity, the soul and pervasive entities, the matter and God. Extracting knowledge from both perform the acts.

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    Translation

    Thoroughly pondering over the finite and the infinite with the help of my intellect. I realise the secret thereof: Deriving knowledge of both of these, we perform our actions accordingly,.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अव्यसः) व्यचतिर्व्याप्तिकर्मा-असुन्,वर्णलोपश्छान्दसः। अव्यचसः। अव्यापकस्य जीवात्मनः (च) (व्यचसः) व्यापकस्य परमात्मनः (च) (बिलम्) छिद्रम्। गुप्तभेदम् (विष्यामि) स्यतिरुपसृष्टो विमोचने-निरु० १।१७। विवृणोमि। विमोचयामि (मायया) प्रज्ञया (ताभ्याम्) तौ ज्ञातुम् (उद्धृत्य) उद्गमय्य (वेदम्) ऋग्वेदादिवेदचतुष्टयं ज्ञानमूलम् (अथ) अनन्तरम् (कर्माणि) कर्तव्यानि (कृण्महे) कुर्महे ॥

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