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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 113 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 113/ मन्त्र 2
    ऋषिः - भर्गः देवता - इन्द्रः छन्दः - प्रगाथः सूक्तम् - सूक्त-११३
    51

    तं हि स्व॒राजं॑ वृष॒भं तमोज॑से धि॒षणे॑ निष्टत॒क्षतुः॑। उ॒तोप॒मानां॑ प्रथ॒मो नि षी॑दसि॒ सोम॑कामं॒ हि ते॒ मनः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तत् । हि । स्व॒ऽराज॑म् । वृ॒ष॒भम् । तम् । ओज॑से । धि॒षणे॒ । इति॑ । नि॒:ऽत॒त॒क्षतु॑: ॥ उ॒त । उ॒प॒ऽमाना॑म् । प्र॒थ॒म: । नि । सी॒द॒स‍ि॒ । सोम॑ऽकामम् । हि । ते॒ । मन॑: ॥११३.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः। उतोपमानां प्रथमो नि षीदसि सोमकामं हि ते मनः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तत् । हि । स्वऽराजम् । वृषभम् । तम् । ओजसे । धिषणे । इति । नि:ऽततक्षतु: ॥ उत । उपऽमानाम् । प्रथम: । नि । सीदस‍ि । सोमऽकामम् । हि । ते । मन: ॥११३.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 113; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (तम् हि) उस ही [तुझ] (स्वराजम्) स्वराजा को (तम्) उस ही [तुझ] (वृषभम्) बलवान् को (ओजसे) पराक्रम के लिये (धिषणे) दोनों सूर्य और भूमि ने (निष्टतक्षतुः) बना दिया है। (उत) और (उपमानाम्) समीपवालों का भी (प्रथमः) पहिला [मुख्य] होकर (नि षीदसि) तू बैठता है, (हि) क्योंकि (ते) तेरा (मनः) मन (सोमकामम्) ऐश्वर्य का चाहनेवाला है ॥२॥

    भावार्थ

    राजा सूर्य के समान तेजस्वी और पृथिवी के समान सहनशील होकर अपने पराक्रम से ऐश्वर्य बढ़ावे ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(तम्) तादृशं त्वाम् (हि) एव (स्वराजम्) स्वयमेव राजानम् (वृषभम्) बलवन्तम् (तम्) (ओजसे) पराक्रमाय (धिषणे) अथ० २०।९४।८। सूर्यभूमिलोकौ (निष्टतक्षतुः) संचस्करतुः (उत) अपि च (उपमानाम्) समीपस्थानाम् (प्रथमः) मुख्यः (नि षीदसि) उपविशसि (सोमकामम्) ऐश्वर्यं कामयमानम् (हि) यस्मात् कारणात् (ते) तव (मनः) अन्तःकरणम् ॥

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    विषय

    'स्वराट् वृषभ' प्रभु

    पदार्थ

    १. (तम्) = उस (स्वराजम्) = स्वयं देदीप्यमान (वृषभम्) = शक्तिशाली प्रभु को (हि) = निश्चय से (धिषणे) = द्यावापृथिवी (निष्टतक्षत:) = [संस्कर्तुः] संस्कृत करते हैं। द्युलोक प्रभु की दीप्ति का आभास देता है तो पृथिवीलोक प्रभु की शक्ति व दृढ़ता का 'येन द्यौरुना पृथिवी च दृढा । प्रभु ने ही वस्तुत: युलोक को तेजस्वी व पृथिवीलोक को दृढ़ बनाया है। (तम्) = उस प्रभ को ही हम (ओजसे) = बल की प्राप्ति के लिए अपने अन्दर देखने का प्रयत्न करें। २. (उत) = और हे प्रभो। आप (उपमानाम्) -=उपमानभूत देवों में प्रथमः मुख्य होते हुए (निषीदसि) = हमारे हृदयों में निषण्ण होते हैं। हमने अपने पिता प्रभु-जैसा ज्ञानी व शक्तिशाली बनने का प्रयत्न करना है। हमारे लिए यह कहा जाए कि यह प्रभु के समान ज्ञानी व शक्तिशाली है। वस्तुत: ऐसे ही व्यक्ति जनता को प्रभु के अवतार प्रतीत होने लगते हैं। (ते मन:) = आपके प्रति प्रवण मन (हि) = निश्चय से (सोमकामम्) = सोम की कामनावाला होता है। प्रभु-प्रवण मन विलास में नहीं जाता और इसप्रकार सोम का रक्षण हो पाता है।

    भावार्थ

    धुलोक में स्वराट् प्रभु का प्रकाश है तो पृथिवी में शक्तिशाली प्रभु की दृढ़ता। इस प्रभु का स्मरण करते हुए हम भी प्रकाश व शक्ति का सम्पादन करें। प्रभु-प्रवण मन सदा सोम का रक्षक होता है। अपने अन्दर प्रकाश व शक्ति का सम्पादन करनेवाला यह 'सौभरि' बनता है-अपना सम्यक् भरण करनेवाला। यही अगले सूक्त का ऋषि है -

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    भाषार्थ

    (स्वराजम्) निज ज्योति द्वारा प्रकाशमान, (वृषभम्) आनन्दरसवर्षी (तं तं हि) उसे और उसे ही (धिषणे) उपर्युक्त दो प्रकार की स्तुति-वाणियाँ, अर्थात् गीतिमयी और गीतिरहित वाणियाँ (ओजसे) हमें ओज प्रदान के लिए (निष्टतक्षतुः) प्रकट कर देती हैं। हे परमेश्वर! तदनन्तर हमें ज्ञान होता है कि आप ही (उपमानाम्) सब उपमाओं में (प्रथमः) सर्वश्रेष्ठ उपमारूप हैं, और आप ही संसार में (नि षीदसि) स्थिर रूप में स्थित हैं। हम यह भी जान गये हैं कि (ते) आपकी (मनः) इच्छा, (हि) निश्चय से, (सोमकामम्) उपासक के भक्तिरस की कामनावाली है।

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    विषय

    राजा, सूर्य और परमेश्वर।

    भावार्थ

    (स्वराजं) स्वयं अपने बल और तेज से प्रकाशमान, (वृषभम्) श्रेष्ठ, (तम् हि) उस पुरुष को (धिषणे) समस्त विश्व को धारण करने वाले आकाश और पृथिवी जिस प्रकार सूर्य को (ओजसे) पराक्रम के कार्य के लिये समर्थ करती हैं उसी प्रकार (तम्) उस वीर पुरुष को (धिषणे) धारण में समर्थ नर और नारीगण अथवा राजा प्रजावर्ग मिलकर (ओजसे) बल पराक्रम की वृद्धि के लिये (निः ततक्षत्तुः) अपना राजा बनाते हैं। हे इन्द ! राजन् ! तू भी (उपमानाम्) अपने समान अन्यों के बीच में (प्रथमः) सबसे श्रेष्ठ होकर (निषीदसि) विराजता हैं। (ते मनः हि) तेरा मन भी अवश्य (सोमकामं) राष्ट्रैश्वर्य की कामना करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भर्ग ऋषिः। इन्द्रो देवता। प्रगाथः। द्व्यचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    That self-ruled, self-refulgent, brave and generous human character and programme, that human republic, the heaven and earth vested with divine will and intelligence conceive, create and fashion forth for self-realisation of innate glory. O man, among similars and comparables, you stand the first and highest, and your mind is dedicated to the love of Soma, peace, pleasure and excellence of life.

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    Translation

    The heaven and earth have faishioned for power to him who is-strong and independent ruler. O king, you seats yourself first among your peers. Your soul longs juice of soma.

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    Translation

    The heaven and earth have fashioned for power to him who is strong and independent ruler. O king, you seats yourself first among your peers. Your soul longs juice of soma.

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    Translation

    O Great God, king or soul. Thou (thou) art by nature Foeless, Leaderless and companionless from ancient times (forever). Thou seekest comradeship through yog or war (in case of king only).

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(तम्) तादृशं त्वाम् (हि) एव (स्वराजम्) स्वयमेव राजानम् (वृषभम्) बलवन्तम् (तम्) (ओजसे) पराक्रमाय (धिषणे) अथ० २०।९४।८। सूर्यभूमिलोकौ (निष्टतक्षतुः) संचस्करतुः (उत) अपि च (उपमानाम्) समीपस्थानाम् (प्रथमः) मुख्यः (नि षीदसि) उपविशसि (सोमकामम्) ऐश्वर्यं कामयमानम् (हि) यस्मात् कारणात् (ते) तव (मनः) अन्तःकरणम् ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজধর্মোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (তম্ হি) সেই [তুমি] (স্বরাজম্) স্বরাজাকে (তম্) সেই [তুমি] (বৃষভম্) বলবানকে (ওজসে) পরাক্রমের/বীরত্বের জন্য (ধিষণে) সূর্য এবং ভূমি উভয়ই (নিষ্টতক্ষতুঃ) তৈরী করেছে। (উত) এবং (উপমানাম্) নিকটবর্তীরও (প্রথমঃ) প্রথম [মুখ্য] হয়ে (নি ষীদসি) তুমি বসো, (হি) কারণ (তে) তোমার (মনঃ) মন (সোমকামম্) ঐশ্বর্য কামনা করে ॥২॥

    भावार्थ

    সূর্যের ন্যায় তেজস্বী এবং পৃথিবীর ন্যায় সহনশীল হয়ে রাজা নিজের পরাক্রম দ্বারা ঐশ্বর্য বৃদ্ধি করুক ॥২॥

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    भाषार्थ

    (স্বরাজম্) নিজ জ্যোতি দ্বারা প্রকাশমান, (বৃষভম্) আনন্দরসবর্ষী (তং তং হি) উনাকে এবং উনাকেই (ধিষণে) উপর্যুক্ত দুই প্রকারের স্তুতি-বাণী, অর্থাৎ গীতিময়ী এবং গীতিরহিত বাণী (ওজসে) আমাদের ওজ প্রদানের জন্য (নিষ্টতক্ষতুঃ) প্রকট করে। হে পরমেশ্বর! তদনন্তর আমাদের জ্ঞান হয়, আপনিই (উপমানাম্) সকল উপমায় (প্রথমঃ) সর্বশ্রেষ্ঠ উপমারূপ, এবং আপনিই সংসারে (নি ষীদসি) স্থির রূপে স্থিত। আমরা এও জেনেছি (তে) আপনার (মনঃ) ইচ্ছা, (হি) নিশ্চিতরূপে, (সোমকামম্) উপাসকের ভক্তিরসের কামনাকারী/কামনাযুক্ত।

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