अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 133/ मन्त्र 6
अव॑श्लक्ष्ण॒मिव॑ भ्रंशद॒न्तर्लो॑म॒मति॑ ह्र॒दे। न वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥
स्वर सहित पद पाठअव॑श्लक्ष्ण॒म् । इव । भ्रंशद॒न्तर्लोम॒मति॑ । हृ॒दे ॥ न । वै । कु॒मारि॒ । तत् । तथा॒ । यथा॑ । कुमारि॒ । मन्य॑से ॥१३३.६॥
स्वर रहित मन्त्र
अवश्लक्ष्णमिव भ्रंशदन्तर्लोममति ह्रदे। न वै कुमारि तत्तथा यथा कुमारि मन्यसे ॥
स्वर रहित पद पाठअवश्लक्ष्णम् । इव । भ्रंशदन्तर्लोममति । हृदे ॥ न । वै । कुमारि । तत् । तथा । यथा । कुमारि । मन्यसे ॥१३३.६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (3)
विषय
स्त्रियों के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(भ्रंशदन्तर्लोममति) भीतर पड़े हुए केश आदि पदार्थवाले (ह्रदे) जलाशय में (अवश्लक्ष्णम् इव) जैसे गँदला रूप [दीखता है]। (कुमारि) हे कुमारी ! [कामनायोग्य स्त्री] (वै) निश्चय करके (तत्) वह (तथा) वैसा (न) नहीं है, (कुमारि) हे कुमारी (यथा) जैसा (मन्यसे) तू मानती है ॥६॥
भावार्थ
गँदले पानी में गँदला रूप दीखता है, और शुद्ध में शुद्ध, वैसे ही स्त्री आदि सब लोग मानसिक मैल तज कर शुद्ध व्यवहार करें ॥६॥
टिप्पणी
६−(अवश्लक्ष्णम्) म० । अव अनादरे, परिभवे च। अमनोहरत्त्वम्। मलिनरूपत्वम्, (इव) यथा (भ्रंशदन्तर्लोममति) भ्रंशु अधःपतने-शतृ+अन्तः+लोप-मतुप्। अधःपतितमध्यकेशादिपदार्थयुक्ते। अतिमलिनवस्तूपेते (ह्रदे) जलाशये। अन्यत्-म० १ ॥
विषय
अवश्लक्ष्णम् इव
पदार्थ
१. यह संसार (अवश्लक्ष्णम् इव) = [not honest] छल-छिद्र से भरा हुआ-सा है-यह सुन्दर नहीं। (लोममति ह्रदे अन्तः) = विषय-शैवालरूपी लोमौवाले हृद के अन्दर (भ्रंशत्) = गिर रहा है, अर्थात् संसार-हृद में मनुष्य डूबते-से चलते हैं। यह संसार-हृद विषय के शैवाल से भरा हुआ है। ये विषय लोम हैं [लू छेदने] छेदन के योग्य हैं। अन्यथा ये मनुष्य को उलझा लेते हैं। २. हे कुमारि। वै-निश्चय से तत् यथा न-यह संसार वैसा नहीं, हे कुमारि! यथा मन्यसे-जैसा तु समझती है। संसार के तत्व को समझकर हमें इस संसार-हद में डूबने से बचना चाहिए |
भावार्थ
यह संसार छल-छिद्र से भरा-सा हुआ है। मनुष्य इसकी चमक से चुधियाई हुई आँखोंवाला होकर विषय-शैवाल से भरे इस संसार-हद में डूब जाता है, अतः अत्यन्त सावधानी अपेक्षित है।
सूचना
छह बार यह बात कही गई है कि यह संसार वैसा नहीं जैसाकि इसे हम समझ रहे हैं। यही संसार का मिथ्यात्व है-यही वेदान्त-सिद्धान्त है। 'संसार न हो' ऐसा नहीं। इसे ठीक रूप में समझकर इस संसार-सागर में डूबने से हमें बचना चाहिए। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और मन ही इसमें उलझने का कारण बन जाते हैं, अत: यह बात छह बार दुहरा दी गई है। जब बुद्धि का राज्य होता है तब मनुष्य इसमें उलझने से बच जाता है।
भाषार्थ
(लोममति) लोमों वाले (ह्रदे अन्तः) तालाब के भीतर (श्लक्ष्णम् इव) सुकुमारता जैसी भावना (अव भ्रंशत्) परमेश्वर ने डाल रखी है। (कुमारि) हे कुमारी! (वै) निश्चय से (तत्) वह तेरा कथन (न तथा) तथ्य नहीं है, (यथा) जैसे कि (कुमारि) हे कुमारी! (मन्यते) तू मानती है।
टिप्पणी
[इव=मन्त्र में उपमा दी गई है। माता की सुकुमार-भावना को उपमान मानकर, पिता की सुकुमार-भावना को उपमेय मानकर यह दर्शाया है कि पिता की सुकुमार-भावना, माता की सुकुमार-भावना की अपेक्षा यति्ंकचित् न्यून होती है। यह अभिप्राय “इव” पदा द्वारा दर्शाया गया है। पिता की सुकुमार-भावना नियन्त्रण से मिश्रित होती है, परन्तु माता की सुकुमार-भावना दया स्नेह और त्याग से मिश्रित रहती है। कुमारी का विचार है कि परमेश्वर की १मातृशक्ति की सुकुमार-भावना की शक्तिमत्ता, रजस् और तमस् के दूर करने में तो मन्त्र ५ में निराकृत हो गई। परन्तु सम्भव है कि नियन्त्रण-मिश्रित पित्र्य-सुकुमार-भावना परमेश्वर अपने भक्त-पुत्र के रजस्-तमस् को स्वयं दूर कर दे। परन्तु मन्त्र में कुमारी के इस विचार का भी निराकरण किया गया है। समग्र सूक्त का अभिप्राय यह है कि राजस और तामस भावनाओं के निराकरण के लिए उपासक की श्रद्धामयी भक्ति, अभ्यास और वैराग्य, आराधना, ईश्वरप्रणिधान आदि मुख्य साधन हैं। इनके पश्चात् ही उपासक ईश्वरीय कृपा का पात्र बनता है। अतः रजस्-तमस् के पराभव के लिए ये दोनों अर्थात् परमेश्वरीय कृपा और योग में पुरुषार्थ, साधन ही अपेक्षित हैं। जैसे कि कहा है कि—“भक्तिविशेषात् आवर्जित ईश्वरस्तमनुगृह्णाति, अभिध्यानमात्रेण। तदभिध्यानादपि योगिनः आसन्नतमः समाधिलाभः फलं च भवति” (योग, व्यासभाष्य १.२३)। लोममति ह्रदे=लोमवाला ह्रद है—हृदय। पुरुष की लोमवती छाती के भीतर उसका हृदय होता है। इस हृदयरूपी ह्रद के किनारे अर्थात् छाती पर लोमरूपी घास उगा रहता है। हृदय के भीतर “रक्त” मानो ह्रद का “जल” है। अथर्ववेद (१०.२.११) में रक्त को “आपः” कहा है, और हृदय को “सिन्धु”।] [१. वेद में परमेश्वर का माता और पिता इन दोनों रूपों में वर्णन हुआ है। यथा- 'त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ । अथा ते सुम्नमीमहे ' ॥ (सामवेद, उत्तराचिक, प्रपाठक ४, खण्ड ६, मन्त्र २) ।]
इंग्लिश (4)
Subject
Kumari
Meaning
Let even the subtlest form of latencies, vasanas and sanskaras, be eliminated by the root from the heart and the karmashoya in the psyche. That alone will lead to release and freedom. (This is possible by relentless practice of Abhyasa and absolute renunciation, Parama Vairagya, on your part, and the descent of grace from Above: Yogasutra, 1, 12 and 23.) Release and freedom, innocent maiden, is not possible the way you think and believe (either by nature or by yourself).
Translation
As the dirty things are thrown in the pools having inside the hair, dirt etc so the grass-matter falls in the space which is full of hair-like rays. O immature maiden it is not so as you, O maiden …… fancy. Note:—Here I did not interpret the hymn in the contex of talk between an married lady and her husband at the time of consumation. That is too clear.
Translation
As the dirty things are thrown in the pools having inside the hair, dirt etc so the grass-matter falls in the space which is full of hair-like rays. O immature maiden it is not so as you, O maiden….fancy. [Note:— Here I did not interpret the hymn in the contex of talk between an married lady and her husband at the time of consumation. That is too clear.]
Translation
Just as a greasy article easily slips into the tank, covered with moss, similarly does the synthesizing force of the creator works through the whole moss of the matter. O virgin, .....it. (as above).
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
६−(अवश्लक्ष्णम्) म० । अव अनादरे, परिभवे च। अमनोहरत्त्वम्। मलिनरूपत्वम्, (इव) यथा (भ्रंशदन्तर्लोममति) भ्रंशु अधःपतने-शतृ+अन्तः+लोप-मतुप्। अधःपतितमध्यकेशादिपदार्थयुक्ते। अतिमलिनवस्तूपेते (ह्रदे) जलाशये। अन्यत्-म० १ ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
স্ত্রীণাং কর্তব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(ভ্রংশদন্তর্লোমমতি) ভেতরে পতিত/স্থিত কেশ আদি পদার্থযুক্ত (হ্রদে) জলাশয়ে (অবশ্লক্ষ্ণম্ ইব) যেমন মলিন রূপ [দেখা যায়] । (কুমারি) হে কুমারী! [কামনাযোগ্য স্ত্রী] (বৈ) নিশ্চিতভাবে (তৎ) তা (তথা) ঐরূপ (ন) নয়, (কুমারি) হে কুমারী (যথা) যেরূপ (মন্যসে) তুমি জানো॥৬॥
भावार्थ
ময়লা জলে মলিন রূপ দেখা যায়, এবং শুদ্ধ জলে শুদ্ধ রূপ, তেমনই স্ত্রী আদি সকল ব্যক্তি মানসিক মলিনতা ত্যাগ করে শুদ্ধ ব্যবহার/আচরণ করুক ॥৬॥
भाषार्थ
(লোমমতি) লোমবিশিষ্ট (হ্রদে অন্তঃ) পুকুরের/হ্রদের ভেতর (শ্লক্ষ্ণম্ ইব) সুকুমারতা সদৃশ ভাবনা (অব ভ্রংশৎ) পরমেশ্বর রেখেছেন। (কুমারি) হে কুমারী! (বৈ) নিশ্চিতরূপে (তৎ) সেই তোমার কথন (ন তথা) তথ্য নয়, (যথা) যেমন (কুমারি) হে কুমারী! (মন্যতে) তুমি মান্য করো।
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