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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 14 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 14/ मन्त्र 4
    ऋषिः - सौभरिः देवता - इन्द्रः छन्दः - प्रगाथः सूक्तम् - सूक्त-१४
    56

    हर्य॑श्वं॒ सत्प॑तिं चर्षणी॒सहं॒ स हि ष्मा॒ यो अम॑न्दत। आ तु॑ नः॒ स व॑यति॒ गव्य॒मश्व्यं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ म॒घवा॑ श॒तम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    हरि॑ऽअश्वम् । सत्ऽप॑तिम् । च॒र्ष॒णि॒ऽसह॑म् । स: । हि । स्म॒ । य: । अम॑न्दत ॥ आ । तु । न॒: । स: । व॒य॒ति॒ । गव्य॑ति । गव्य॑म् । अश्व्य॑म् । स्तो॒तृऽभ्य॑: । म॒घऽवा॑ । श॒तम् ॥१४.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    हर्यश्वं सत्पतिं चर्षणीसहं स हि ष्मा यो अमन्दत। आ तु नः स वयति गव्यमश्व्यं स्तोतृभ्यो मघवा शतम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    हरिऽअश्वम् । सत्ऽपतिम् । चर्षणिऽसहम् । स: । हि । स्म । य: । अमन्दत ॥ आ । तु । न: । स: । वयति । गव्यति । गव्यम् । अश्व्यम् । स्तोतृऽभ्य: । मघऽवा । शतम् ॥१४.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 14; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (सः) वह (हि) ही (स्म) अवश्य [मनुष्य है]; (यः) जिसने (हर्यश्वम्) ले चलनेवाले घोड़ों से युक्त, (सत्पतिम्) सत्पुरुषों के रक्षक, (चर्षणीसहम्) मनुष्यों को नियम में रखनेवाले [राजा] को (अमन्दत) प्रसन्न किया है। (सः) वह (मघवा) महाधनी (तु) तो (नः) हम (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवालों को (शतम्) सौ [बहुत] (गव्यम्) गौओं का समूह और (अश्व्यम्) घोड़ों का समूह (आ वयति) लाता है ॥४॥

    भावार्थ

    सब प्रजागण आज्ञा मानकर शूर धर्मात्मा राजा को प्रसन्न रक्खें, जिससे वह उत्तम प्रबन्ध के साथ प्रजा का ऐश्वर्य बढ़ावे ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(हर्यश्वम्) हरयो हरणशीला अश्वा यस्य तम्। शीघ्रगामितुरङ्गवन्तम् (सत्पतिम्) सतां कर्मश्रेष्ठानां पालकम् (चर्षणीसहम्) चर्षणीनां मनुष्याणां सोढारम् अभिभवितारं नियन्तारम् (सः) हि (स्म) अवश्यम् (यः) पुरुषः (अमन्दत) मदि स्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु-लङ्। आमोदितवान्। तर्पितवान् (आ वयति) वी गतिव्याप्तिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु-लट्, छान्दसः शप्। आगमयति। प्रापयति (तु) अवधारणे। नियोगे (नः) अस्मभ्यम् (सः) (गव्यम्) गोसमूहम् (अश्व्यम्) अश्वसमूहम् (स्तोतृभ्यः) (मघवा) महाधनी (शतम्) बहु ॥

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    विषय

    'हर्यश्व' प्रभु

    पदार्थ

    १. (हर्यश्वम्) = दुःखों का हरण करनेवाले, इन्द्रियाश्वों को देनेवाले, (सत्पतिम्) = सज्जनों के रक्षक, (चर्षणीसहम्) = सब मनुष्यों के अभिभविता, अर्थात् नियन्ता उस प्रभु का हम स्तवन करते हैं। (सः) = वह प्रभु (हि) = ही (स्म) = निश्चय से स्तुत्य हैं। (य:) = जो (अमन्दत) = आनन्दमय होते हुए स्तोताओं को आनन्दित करते हैं। २. सः( मघवा) = वे ऐश्वर्यशाली प्रभु (तु) = तो (न: स्तोतृभ्यः) = हम स्तोताओं के लिए (शतम्) = शतवर्षपर्यन्त (गव्यम्) = ज्ञानेन्द्रियों के समूह को तथा (अश्व्यम्) = कर्मेन्द्रियों के समूह हो (आवयति) = प्राप्त कराते है[वी गत्यादिषु]।

    भावार्थ

    हम प्रभु का स्तवन करें। प्रभु हमारे लिए उत्तम इन्द्रियों को प्राप्त कराते हैं। प्रशस्त इन्द्रियों को प्राप्त करनेवाला स्तोता 'गोतम है। यही अगले सूक्त का ऋषि है -

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    भाषार्थ

    (हर्यश्वम्) जिसके अश्वारोहियों ने शत्रुओं का परिहार किया है, (सत्पतिम्) जो सच्चा रक्षक है, (चर्षणीसहम्) प्रजाजनों में जो प्रभावशाली है, उसका हम [ववृमहे] वरण करते हैं (मन्त्र ६६)(सः हि स्म) यह वही है। (यः) जिसने पहिले भी हमें अपने कार्यों द्वारा (अमन्दत) प्रसन्न किया है। (मघवा) सम्पत्तिशाली (सः) वह सम्राट् (नः स्तोतृभ्यः) हम अपने प्रशंसकों के लिए (गव्यम्, अश्व्यम्) गौओं और अश्वों द्वारा मिलनेवाले (शतम्) सैकड़ों प्रकार के सुख (आ वयति) प्राप्त कराता है।

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    विषय

    राजा का वर्णन

    भावार्थ

    (हर्यश्वं) तेज अश्वों वाले, (सत् प्रतिम्) सज्जनों के पालक (चर्षणीसहम्) सब मनुष्यों के वशकारी पुरुष के मैं गुण बतलाता हूँ। (स हि स्म) वह वह है (यः अमन्द्रत) जो सदा हृष्ट, प्रसन्न और सदा तृप्त रहता है, किसी के धन, स्त्री, जन पर लोभ नहीं करता और किसी पर रोष नहीं करता। (सः) वह (गव्यम् अश्व्यम्) गौ और अश्व आदि (शतम्) सैकड़ों धन (नः) हमें (स्तोतृभ्यः) स्तुति कर्ता लोगों को (आवयति) प्राप्त कराता है, प्राप्त करने में सहायक होता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सौम्नीर्ऋषिः। इन्द्रो देवता। प्रगाथः। चतुर्ऋचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indr a Devata

    Meaning

    He alone is happy indeed and prospers who glorifies Indra, lord of the moving universe, protector and promoter of truth and reality and ruler and justicier of humanity, who, Lord Almighty, weaves for us this web of a hundredfold variety of earthly provision and all attainable possibility for the celebrants.

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    Translation

    I glorify the characteristics of Almighty God who possesées the all-consuming fire, who is the guardions of pious men and who has under His control all the humanity. He is he who always remains in blessedness. The bounteous one bastows on us, the worshippers hundred wealth enriched with cows and steéds.

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    Translation

    I glorify the characteristics of Almighty God who posseses the all-consuming fire, who is the guardians of pious men and who has under His control all the humanity. He is he who always remains in blessedness. The bounteous one bestows on us, the worshippers hundred wealth enriched with cows and steeds.

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    Translation

    I sing the praises of the king, who is equipped with fast-moving vehicles is the guardian of the virtuous People, and can keep the people well under control. It is he who is ever cheerful and keeps others happy and joyful. Such a fortunate personality bestows on us, his faithful subjects, hundreds of riches and wealth of cattle i.e., milch cows and fast horses.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(हर्यश्वम्) हरयो हरणशीला अश्वा यस्य तम्। शीघ्रगामितुरङ्गवन्तम् (सत्पतिम्) सतां कर्मश्रेष्ठानां पालकम् (चर्षणीसहम्) चर्षणीनां मनुष्याणां सोढारम् अभिभवितारं नियन्तारम् (सः) हि (स्म) अवश्यम् (यः) पुरुषः (अमन्दत) मदि स्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु-लङ्। आमोदितवान्। तर्पितवान् (आ वयति) वी गतिव्याप्तिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु-लट्, छान्दसः शप्। आगमयति। प्रापयति (तु) अवधारणे। नियोगे (नः) अस्मभ्यम् (सः) (गव्यम्) गोसमूहम् (अश्व्यम्) अश्वसमूहम् (स्तोतृभ्यः) (मघवा) महाधनी (शतम्) बहु ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজপ্রজাকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (সঃ) সে (হি)(স্ম) অবশ্যই [মনুষ্য]; (যঃ) যে (হর্যশ্বম্) বহনকারী ঘোড়ার সাথে যুক্ত, (সৎপতিম্) সৎপুরুষদের রক্ষক, (চর্ষণীসহম্) মনুষ্যদের নিয়মে সংযুক্তকারী [রাজা] কে (অমন্দত) প্রসন্ন করেছে। (সঃ) সেই (মঘবা) মহাধনী (তু) তো (নঃ) আমাদের জন্য (স্তোতৃভ্যঃ) স্তোতাদের (শতম্) শত [বহু] (গব্যম্) গো-সমূহ (অশ্ব্যম্) ঘোড়ারসমূহ (আবয়তি) প্রদান করে/নিয়ে আসে॥৪॥

    भावार्थ

    সকল প্রজাগণ আজ্ঞা পালনপূর্বক বীর ধর্মাত্মা রাজাকে প্রসন্ন রাখুক, যাতে রাজা উত্তম ব্যবস্থার সহিত প্রজাগণের ঐশ্বর্য্য বৃদ্ধি করে/করুক॥৪॥

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    भाषार्थ

    (হর্যশ্বম্) যার অশ্বারোহীরা শত্রুদের পরিহার করেছে, (সৎপতিম্) যে সত্য রক্ষক, (চর্ষণীসহম্) প্রজাদের মধ্যে প্রভাবশালী, তাঁর আমরা [ববৃমহে] বরণ করি (মন্ত্র ৬৬)(সঃ হি স্ম) ইনিই তিনি/সেই রক্ষক। (যঃ) যিনি পূর্বেও আমাদের নিজের কার্য দ্বারা (অমন্দত) প্রসন্ন করেছেন। (মঘবা) সম্পত্তিশালী (সঃ) সেই সম্রাট্ (নঃ স্তোতৃভ্যঃ) নিজের প্রশংসাকারীদের জন্য (গব্যম্, অশ্ব্যম্) গাভী এবং অশ্বদের দ্বারা প্রাপ্ত (শতম্) শত প্রকারের সুখ (আ বয়তি) প্রাপ্ত করায়।

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