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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 30 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 30/ मन्त्र 5
    ऋषिः - बरुः सर्वहरिर्वा देवता - हरिः छन्दः - जगती सूक्तम् - सूक्त-३०
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    त्वंत्व॑महर्यथा॒ उप॑स्तुतः॒ पूर्वे॑भिरिन्द्र हरिकेश॒ यज्व॑भिः। त्वं ह॑र्यसि॒ तव॒ विश्व॑मु॒क्थ्यमसा॑मि॒ राधो॑ हरिजात हर्य॒तम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्वम्ऽत्व॑म् । अ॒ह॒र्य॒था॒: । उप॑ऽस्तुत: । पूर्वे॑भि: । इ॒न्द्र॒ । ह॒रि॒के॒श॒ । यज्व॑ऽभि: ॥ त्वम् । ह॒र्य॒सि॒ । तव॑ । विश्व॑म् । उ॒क्थ्य॑म् । असा॑मि । राध॑: । ह॒र‍ि॒ऽजा॒त॒ । ह॒र्य॒तम् ॥३०.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्वंत्वमहर्यथा उपस्तुतः पूर्वेभिरिन्द्र हरिकेश यज्वभिः। त्वं हर्यसि तव विश्वमुक्थ्यमसामि राधो हरिजात हर्यतम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्वम्ऽत्वम् । अहर्यथा: । उपऽस्तुत: । पूर्वेभि: । इन्द्र । हरिकेश । यज्वऽभि: ॥ त्वम् । हर्यसि । तव । विश्वम् । उक्थ्यम् । असामि । राध: । हर‍िऽजात । हर्यतम् ॥३०.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 30; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    बल और पराक्रम का उपदेश।

    पदार्थ

    (हरिकेश) हे सूर्यसमान तेजवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (पूर्वेभिः) समस्त (यज्वभिः) यज्ञ करनेवालों करके (उपस्तुतः) आदर से स्तुति किया गया, (त्वं त्वम्) तू ही तू (अहर्यथाः) प्रिय हुआ है। (हरिजात) हे मनुष्यों में प्रसिद्ध ! (त्वम्) तू (हर्यसि) प्रीति करता है, (विश्वम्) सब (उक्थ्यम्) बड़ाई योग्य वस्तु और (असामि) न समाप्त होनेवाला [अनन्त] (हर्यतम्) चाहने योग्य (राधः) धन (तव) तेरा है ॥॥

    भावार्थ

    शुभ गुणी के कारण जिस राज से सब विद्वान् प्रीति करते हैं और जो सबसे प्रीति करता है, उसके राज्य में बहुत सम्पत्ति और धन होता है ॥॥

    टिप्पणी

    −(त्वं त्वम्) त्वमेव (अहर्यथाः) अकामयथाः। प्रियोऽभवः (उपस्तुतः) आदरेण प्रशंसितः (पूर्वेभिः) समस्तैः (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (हरिकेश) केशा रश्मयः काशनाद् वा प्रकाशनाद् वा-निरु० १२।२। हे सूर्यवत् प्रकाशवन् (यज्वभिः) सुयजोर्ङ्वनिप्। पा० ३।२।१०३। यज देवपूजादिषु ङ्वनिप्। यज्ञकर्तृभिः (त्वम्) (हर्यसि) कामयसे (तव) (विश्वम्) सर्वम् (उक्थ्यम्) प्रशस्यम् (असामि) भुवः कित्। उ० ४।४। षो अन्तकर्मणि-मिप्रत्ययः। असामि सामिप्रतिषिद्धं सामि स्यतेः असुसमाप्तम्-निरु० ६।२३। असमाप्तम्। अनन्तम् (राधः) धनम् (हरिजात) हे हरिषु मनुष्येषु प्रसिद्ध (हर्यतम्) कमनीयम् ॥

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    विषय

    हरिकेश-हरिजात

    पदार्थ

    १.हे (हरिकेश इन्द्र) = [हरि-सूर्य, केश-प्रकाशरश्मि] सूर्य के समान प्रकाश की रश्मियोंवाले सर्वशक्तिमन् प्रभो! (पूर्वेभिः) = अपना पालन व पूरण करनेवाले (यज्वभिः) = यज्ञशील पुरुषों से (उपस्तुत:) = स्तुति किये गये (त्वम्) = आप (त्वम्) = और आप ही (अहर्यथा:) = उस स्तोता के प्रति प्रीतिवाले होते हो और उसे प्राप्त होते हो [हर्य गतिकान्तयोः] २. (त्वं हर्यसि) = आप गतिवाले व दीसिवाले होते हो। हे (हरिजात) = सूर्य के समान प्रादुर्भूत हुए-हुए प्रभो! (तव विश्वं राध:) = आपका सम्पूर्ण ऐश्वर्य (उक्थ्यम्) = स्तुति के योग्य है, (असामि) = पूर्ण है तथा (हर्यतम्) = कान्त है। आप ही उपासकों के लिए इस ऐश्वर्य को प्राप्त कराते हैं।

    भावार्थ

    हम प्रभु का स्तवन करें। प्रभु हमें प्राप्त होंगे और प्रभु हमें सब आवश्यक ऐश्वर्यों को प्राप्त कराएँगे। अगले सूक्त में ऋषि-देवता पूर्ववत् ही हैं

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    भाषार्थ

    (हरिकेश) हे मनोहारी या पापहारी प्रकाशवाले परमेश्वर! (त्वम्) आप और (त्वम्) आप ही (पूर्वेभिः) अनादिकाल के (यज्वभिः) उपासना-यज्ञों के यजमानों द्वारा (अहर्यथाः) चाहे गये हैं। और (उपस्तुतः) उपासना-विधि से स्तुतियाँ पाते रहे हैं। (त्वम्) आप (हर्यसि) उपासकों को चाहते हैं। (तव) आपका (विश्वम्) संसार (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय है। (हरिजात) ऋक् की स्तुतियों तथा साम के गानों द्वारा प्रकट हुए हे परमेश्वर! आपकी (हर्यतम्) मनोहारी (राधः) सम्पत्ति (असामि) अनन्त है।

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    विषय

    राजा के कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    हे (हरिकेश) रश्मि रूप केशों से युक्त, सूर्य के समान तेजस्विन् ! हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवान् ! राजन् ! (पूर्वेभिः) पूर्व के (यज्चभिः) युद्ध यज्ञ के करने वाले शूरवीर एवं देवोपासक विद्वान् पुरुषों से (उपस्तुतः) स्तुति किया जाकर (त्वं त्वम्) तू ही तू (अहर्यथाः) सर्वत्र दिखाई देता है। (त्वं हर्यसि) तू सबको प्रीतिकर है। हे (हरिजात) वेगवान् वीर पुरुषों में भी सर्व प्रसिद्ध (विश्वम् उक्थम्) समस्त प्रशंसनीय (हर्यतम्) कान्तिमान् रुचिकर (असामि) सम्पूर्ण (राधः) ऐश्वर्य (तव) तेरा ही है। ईश्वर पक्ष में—हे (हरिकेश) सूर्य के समान तेजस्विन् ! पूर्व के विद्वानों से स्तुति किया जाकर तू ही तू सर्वत्र दिखाई देता है। यह समस्त ऐश्वर्य भी तेरा ही है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः-बरुः सर्वहरिर्वा। देवता-इन्द्रः। छन्दः-गायत्री। पञ्चर्चं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Self-integration

    Meaning

    Indra, lord of light and knowledge, self- manifested universal spirit of light, love and beauty, loved and adored by the earliest celebrant sages, you alone received, acknowledged and blest the adorations of the past, and you alone are the sole, unique, beloved, universally adorable giver of success and fulfillment, you who love, receive, acknowledge and bless the gifts of adoration and yajna offered to you.

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    Translation

    O ruler, you are as- brilliant as sun. You praised by the performers of Yajna endowed with perfect knowledge, you are loved as you alone. You like all. O prominent one among all the men, all the desirable praiseworthy inexhaustible wealth is yours and of yours only.

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    Translation

    O ruler, you are as: brilliant as sun. You praised by the performers of Yajna endowed with perfect knowledge, you are loved as you alone. You like all. O prominent one among all the men, all the desirable praiseworthy inexhaustible wealth is yours and of yours only.

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    Translation

    O Radiant God, king, learned person or electricity, well-known.amongst the shining or speedy things, Thou and Thou alone art seen all around. Thou art praised by the sacrificers of yore. Thou likest all. Thou alone deservest all praise. The whole of the beautiful fortune belongs to Thee alone.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    −(त्वं त्वम्) त्वमेव (अहर्यथाः) अकामयथाः। प्रियोऽभवः (उपस्तुतः) आदरेण प्रशंसितः (पूर्वेभिः) समस्तैः (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (हरिकेश) केशा रश्मयः काशनाद् वा प्रकाशनाद् वा-निरु० १२।२। हे सूर्यवत् प्रकाशवन् (यज्वभिः) सुयजोर्ङ्वनिप्। पा० ३।२।१०३। यज देवपूजादिषु ङ्वनिप्। यज्ञकर्तृभिः (त्वम्) (हर्यसि) कामयसे (तव) (विश्वम्) सर्वम् (उक्थ्यम्) प्रशस्यम् (असामि) भुवः कित्। उ० ४।४। षो अन्तकर्मणि-मिप्रत्ययः। असामि सामिप्रतिषिद्धं सामि स्यतेः असुसमाप्तम्-निरु० ६।२३। असमाप्तम्। अनन्तम् (राधः) धनम् (हरिजात) हे हरिषु मनुष्येषु प्रसिद्ध (हर्यतम्) कमनीयम् ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    বলপরাক্রমোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (হরিকেশ) হে সূর্যের ন্যায় তেজোময় (ইন্দ্র) ইন্দ্র! [পরম ঐশ্বর্যবান রাজন্] (পূর্বেভিঃ) সমস্ত (যজ্বভিঃ) যজ্ঞকর্তাদের দ্বারা (উপস্তুতঃ) আদরপূর্বক কৃত স্তুত্য/প্রশংসিত, (ত্বং ত্বম্) তুমিই তুমি (অহর্যথাঃ) প্রিয় হয়েছো। (হরিজাত) হে মনুষ্যদের মধ্যে প্রসিদ্ধ! (ত্বম্) তুমি (হর্যসি) প্রীতি করো, (বিশ্বম্) সকল (উক্থ্যম্) প্রশংসাযোগ্য বস্তু এবং (অসামি) অসমাপ্ত [অনন্ত] (হর্যতম্) কামনাযোগ্য (রাধঃ) ধন (তব) তোমার আছে ॥৫॥

    भावार्थ

    শুভ গুণের কারণে যে রাজাকে সকল বিদ্বান্ প্রীতি করে এবং যিনি সকলকে প্রীতি করেন, তাঁর রাজ্যে বহু সম্পত্তি ও ধন হয় ॥৫॥

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    भाषार्थ

    (হরিকেশ) হে মনোহারী বা পাপহারী প্রকাশযুক্ত পরমেশ্বর! (ত্বম্) আপনি এবং (ত্বম্) আপনিই (পূর্বেভিঃ) অনাদিকালের (যজ্বভিঃ) উপাসনা-যজ্ঞের যজমানদের দ্বারা (অহর্যথাঃ) কাম্য/প্রার্থিত হয়েছেন। এবং (উপস্তুতঃ) উপাসনা-বিধি দ্বারা স্তুতি প্রাপ্ত হচ্ছেন। (ত্বম্) আপনি (হর্যসি) উপাসকদের কামনা করেন। (তব) আপনার (বিশ্বম্) সংসার (উক্থ্যম্) প্রশংসনীয়। (হরিজাত) ঋক্-এর স্তুতি তথা সামবেদের গান দ্বারা প্রকটিত হে পরমেশ্বর! আপনার (হর্যতম্) মনোহারী (রাধঃ) সম্পত্তি (অসামি) অনন্ত।

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