अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 35/ मन्त्र 16
ए॒वा ते॑ हारियोजना सुवृ॒क्तीन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि॒ गोत॑मासो अक्रन्। ऐषु॑ वि॒श्वपे॑शसं॒ धियं॑ धाः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥
स्वर सहित पद पाठए॒व । ते॒ । हा॒रि॒ऽयो॒ज॒न॒ । सु॒ऽवृ॒क्ति । इन्द्र॑ । ब्रह्मा॑णि । गोत॑मास: । अ॒क्र॒न् ॥ आ । ए॒षु॒ । वि॒श्वऽपे॑शसम् । धिय॑म् । धा: । प्रा॒त: । म॒क्षु । धि॒याऽव॑सु: । ज॒ग॒म्या॒त् ॥३५.१६॥
स्वर रहित मन्त्र
एवा ते हारियोजना सुवृक्तीन्द्र ब्रह्माणि गोतमासो अक्रन्। ऐषु विश्वपेशसं धियं धाः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात् ॥
स्वर रहित पद पाठएव । ते । हारिऽयोजन । सुऽवृक्ति । इन्द्र । ब्रह्माणि । गोतमास: । अक्रन् ॥ आ । एषु । विश्वऽपेशसम् । धियम् । धा: । प्रात: । मक्षु । धियाऽवसु: । जगम्यात् ॥३५.१६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सभापति के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थ
(हारियोजन) हे घोड़ों के जोतनेवाले ! (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवान पुरुष] (ते) तेरे लिये (एव) ही (गोतमासः) अत्यन्त ज्ञानी [ऋषियों] ने (सुवृक्ति) अच्छे प्रकार ग्रहण करने योग्य (ब्रह्माणि) वेदज्ञानों को (अक्रन्) किया है [बताया है]। (धियावसुः) बुद्धि और कर्म के साथ रहनेवाला तू (एषु) इन [ज्ञानों] में (विश्वपेशसम्) सब रूपोंवाली (धियम्) निश्चल बुद्धि को (आ) सब ओर से (धाः) धारण कर और (प्रातः) प्रातःकाल (मक्षु) शीघ्र (जगम्यात्) [उस बुद्धि को] प्राप्त हो ॥१६॥
भावार्थ
विद्वान् पुरुष सभापति आदि को सदा वेदशास्त्रों का उपदेश करें और प्रधान आदि जन अन्तःकरण से ग्रहण करके परोपकार करते रहें ॥१६॥
टिप्पणी
१६−(एव) निश्चयेन (ते) तुभ्यम् (हारियोजन) वसिवपियजि०। उ०४।१२। हृञ् प्रापणे-इञ्+युजिर् योगे-ल्यु। हे हारीणां हरीणाम् अश्वानां योजक (सुवृक्ति) म०२। विभक्तेर्लुक्। सुवृक्तीनि। सुग्राह्याणि (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् पुरुष (ब्रह्माणि) वेदज्ञानानि (गोतमास) गमेर्डोः। उ०२।६७। गम्लृ गतौ यद्वा गै गानै-डो प्रत्ययः, तमप्, असुक् च। गौरिति स्तोतृनाम-निघ०३।१६। अतिशयेन ज्ञानिनः। महर्षयः (अक्रन्) अ०२९।७। करोतेर्लुङ् छान्दसं रूपम्। अकार्षुः (आ) समन्तात् (एषु) ब्रह्मसु। वेदज्ञानेषु (विश्वपेशसम्) सर्वरूपोपेताम् (धियम्) धारणावतीं प्रज्ञाम् (धाः) दधातेर्लुङ् लोडर्थे। धेहि। धर (प्रातः) प्रातःकाले (मक्षु) शीघ्रम् (धियावसुः) प्रज्ञाकर्मभ्यां सह निवासी (जगम्यात्) अ०७।२६।२। गमेः शपः श्लुः, विधिलिङ्, मध्यमपुरुषस्य प्रथमः। गम्याः। प्राप्याः ॥
विषय
धियावसु
पदार्थ
१. हे (हारियोजन) = उत्तम इन्द्रियाश्वों [हरि] को हमारे शरीर-रथ में जोड़नेवाले (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! (एवा) = इसप्रकार (गोतमास:) = ये प्रशस्तेन्द्रिय व्यक्ति (सक्तिः) = दोषों का सम्यक् वर्जन करनेवाले (ते) = आपके (ब्रह्माणि) = स्तोत्रों को (अक्रन्) = करते हैं। २. (एषु) = इन स्तोताओं में आप (विश्वपेशसम्) = संसार को सुन्दर रूप देनेवाली (धियम्) = बुद्धि को (आधाः) = स्थापित कीजिए। इन्हें वह बुद्धि दीजिए जो संसार का सुन्दर निर्माण करनेवाली हो। हे प्रभो! हमें प्रात: प्रात: (मक्षु) = शीघ्र ही (धियावसु:) = बुद्धिपूर्वक कर्मों के द्वारा निवास को उत्तम बनानेवाला व्यक्ति (जगम्यात्) = प्राप्त हो। इनके संग में हम भी 'धियावसु' बन पाएँ।
भावार्थ
प्रभु हमें उत्तम इन्द्रियाश्व प्राप्त कराते हैं। हम प्रभु का स्तवन करें। प्रभु हमें उत्तम निर्माणवाली बुद्धि दें। धियावसु' पुरुषों का हमें संग प्राप्त हो। धियावसु पुरुषों के संग में यह भरद्वाज' बनता है, शक्ति को अपने में भरनेवाला। यह प्रभु का स्तवन करता है कि -
भाषार्थ
(इन्द्र) हे परमेश्वर! (गोतमासः) सर्वोत्तम स्तुतियाँ करनेवाले स्तोता लोग, (एवा) इस प्रकार, (हारियोजना=हारियोजनानि) विषय-विहारी-इन्द्रियों को आपके साथा योगयुक्त करनेवाली, (सुवृक्ति=सुवृक्तीनि) दोषवर्जित, (ब्रह्माणि) ब्रह्म-प्रतिपादक स्तुतियाँ (अक्रन्) करते हैं। (एषु) इन उपासकों में आप (विश्वपेशसम्) विश्व का निरूपण करनेवाली (धियम्) यथार्थ बुद्धि का (धाः) आधान करते हैं, और (धियावसुः) बुद्धि के धनी आप (प्रातः) प्रातःकाल की स्तुतियों में (मक्षू) शीघ्र ही (आ जगम्यात्) प्रकट हूजिए।
टिप्पणी
[गोतमासः=गौः (स्तोता, निघं০ ३.१६)। गोतमासः में ‘तमप्’ प्रत्यय है, जो कि संज्ञावाची शब्दों में नहीं हो सकता। इसलिए ‘गोतम’ शब्द संज्ञावाची न होकर क्रियावाची है, स्तुति के प्रकर्ष का द्योतक है।]
विषय
परमेश्वर का वर्णन।
भावार्थ
हे (हारियोजन) ज्ञानी पुरुषों को योग द्वारा साक्षात् करने योग्य समस्त सूर्यो को प्रेरणा करने हारे ! हे (इन्द्र) परमेश्वर ! वेगवान् पदार्थों और प्राणों को युक्त करने वाले ! आत्मन् ! (ते एव) तेरे ही लिये (गोतमासः) उत्तम वेदवाणी में निष्ठ विद्वान् पुरुष (सुवृक्ति) उत्तम हृदय हारि (ब्रह्माणि) वेद मंत्रों और ब्रह्मज्ञान के वचनों का (अक्रन्) साक्षात् करते हैं (एषु) उनमें ही तू (विश्वपशेसं धियं) नाना मनोहर स्वरूप वाली धारणावती बुद्धि को (धाः) प्रदान करता है। वह इन्द, (प्रातः) प्रातः काल ही (धियावसुः) समस्त कर्मैश्वर्यवान्, परमेश्वर (मक्षू) यथा शीघ्र (आजगम्यात्) ज्ञान करने योग्य, प्राप्तव्य एवं उपासना करने योग्य है। अथवा वही हमें नित्य प्रातः प्राप्त हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
नोधा गौतम ऋषिः। इन्द्रो देवता १, २, ७, ९, १४, १६ त्रिष्टुभः। शेषा पंक्तयः। षोडशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
Indra, O Lord of sunbeams, these are the songs divine, purest and serene, offered by the highest souls of faith and vision. Bless these souls with universal brilliance of vision and intelligence, lord omniscient. Lord Omnificent, reveal your presence in our mind instantly with the light of the dawn.
Translation
O Almighty God’ you yoke the sun, moon etc. in the wheel of crertion cycle, The moste earnest devotees (Gotamah) perform suitable praises for you at morning. You give them knowledge endowed with various branches of fearning. The man of wisdom and action may attain it direct.
Translation
O Almighty God’ you yoke the sun, moon etc. in the wheel of crertion cycle, The moste earnest devotees (Gotamah) perform suitable praises for you at morning. You give them knowledge endowed with various branches of learning. The man of wisdom and action may attain it direct.
Translation
O Mighty Lord, Whom the learned persons, well*versed in the Vedic lore, perceive through Yog i.e., concentration of all senses in deep meditation and sing the (charming) attractive Vedic verses. Thou showerest on these (devotees) all sorts of retentive intelligence and ability to do good deeds. Mayst Thou quickly come to us early in the morning, showering all fortunes and shelter.
Footnote
Gautamas are not the clan of Rishis of specific name, as interpreted by Griffith and Sayana but the general learned persons, well-versed in the Vedic Lore.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१६−(एव) निश्चयेन (ते) तुभ्यम् (हारियोजन) वसिवपियजि०। उ०४।१२। हृञ् प्रापणे-इञ्+युजिर् योगे-ल्यु। हे हारीणां हरीणाम् अश्वानां योजक (सुवृक्ति) म०२। विभक्तेर्लुक्। सुवृक्तीनि। सुग्राह्याणि (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् पुरुष (ब्रह्माणि) वेदज्ञानानि (गोतमास) गमेर्डोः। उ०२।६७। गम्लृ गतौ यद्वा गै गानै-डो प्रत्ययः, तमप्, असुक् च। गौरिति स्तोतृनाम-निघ०३।१६। अतिशयेन ज्ञानिनः। महर्षयः (अक्रन्) अ०२९।७। करोतेर्लुङ् छान्दसं रूपम्। अकार्षुः (आ) समन्तात् (एषु) ब्रह्मसु। वेदज्ञानेषु (विश्वपेशसम्) सर्वरूपोपेताम् (धियम्) धारणावतीं प्रज्ञाम् (धाः) दधातेर्लुङ् लोडर्थे। धेहि। धर (प्रातः) प्रातःकाले (मक्षु) शीघ्रम् (धियावसुः) प्रज्ञाकर्मभ्यां सह निवासी (जगम्यात्) अ०७।२६।२। गमेः शपः श्लुः, विधिलिङ्, मध्यमपुरुषस्य प्रथमः। गम्याः। प्राप्याः ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
সভাপতিলক্ষণোপদেশঃ
भाषार्थ
(হারিযোজন) ঘোড়ার সংযোজক ! হে (ইন্দ্রঃ) ইন্দ্র [পরম ঐশ্বর্যবান পুরুষ] (তে) তোমার জন্য (এব) ই (গোতমাসঃ) অত্যন্ত জ্ঞানী [ঋষিগণ] (সুবৃক্তি) উত্তমরূপে গ্রহণযোগ্য (ব্রহ্মাণি) বেদ জ্ঞানকে (অক্রন্) করেছেন [বর্ণনা করেছেন] ।(ধিয়াবসুঃ) বুদ্ধি ও কর্মসম্পন্ন তুমি (এষু) এই [জ্ঞান] মধ্যে (বিশ্বপেশসম্) সব রূপযুক্ত (ধিয়ম্) নিশ্চল বুদ্ধিকে (আ) সকল দিক হতে (ধাঃ) ধারণ করো এবং (প্রাতঃ) প্রাতঃকালে (মক্ষু) শীঘ্র (জগম্যাৎ) [সেই বুদ্ধি] প্রাপ্ত হও ॥১৬॥
भावार्थ
বিদ্বান পুরুষ সভাপতি আদিকে সদা বেদশাস্ত্রের উপদেশ করবেন এবং প্রধানাদিজন অন্তঃকরণ থেকে বেদজ্ঞান গ্রহণ করে পরোপকার করতে থাকেন/থাকুক ॥১৬॥
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (গোতমাসঃ) সর্বোত্তম স্তুতিকারী স্তোতাগণ, (এবা) এরূপ, (হারিযোজনা=হারিযোজনানি) বিষয়-বিহারী-ইন্দ্রিয়-সমূহকে আপনার সাথে যোগযুক্তকারী, (সুবৃক্তি=সুবৃক্তীনি) দোষবর্জিত, (ব্রহ্মাণি) ব্রহ্ম-প্রতিপাদক স্তুতি (অক্রন্) করে। (এষু) এই উপাসকদের মধ্যে আপনি (বিশ্বপেশসম্) বিশ্বের নিরূপক (ধিয়ম্) যথার্থ বুদ্ধির (ধাঃ) আধান/স্থাপন করেন, এবং (ধিয়াবসুঃ) বুদ্ধির ধনী আপনি (প্রাতঃ) প্রাতঃকালের স্তুতিতে (মক্ষূ) শীঘ্রই (আ জগম্যাৎ) প্রকট হন।
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