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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 46 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 46/ मन्त्र 1
    ऋषि: - इरिम्बिठिः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-४६
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    प्र॑णे॒तारं॒ वस्यो॒ अच्छा॒ कर्ता॑रं॒ ज्योतिः॑ स॒मत्सु॑। सा॑स॒ह्वांसं॑ यु॒धामित्रा॑न् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र॒ऽने॒तार॑म् । वस्य॑: । अच्छ॑ । कर्ता॑रन् । ज्योति॑: । स॒मत्ऽसु॑ । स॒स॒ऽह्वांस॑म् । यु॒धा । अ॒मित्रा॑न् ॥४६.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रणेतारं वस्यो अच्छा कर्तारं ज्योतिः समत्सु। सासह्वांसं युधामित्रान् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रऽनेतारम् । वस्य: । अच्छ । कर्तारन् । ज्योति: । समत्ऽसु । ससऽह्वांसम् । युधा । अमित्रान् ॥४६.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 46; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (वस्यः) श्रेष्ठ धन की ओर (प्रणेतारम्) ले चलनेवाले (समत्सु) संग्रामों में (ज्योतिः) प्रकाश (कर्तारम्) करनेवाले (युधा) युद्ध से (अमित्रान्) पीड़ा देनेवाले वैरियों को (सासह्वांसम्) हरानेवाले [सेनापति] को (अच्छ) पाकर [हम बर्तें] ॥१॥

    भावार्थ - जो मनुष्य प्रजा को धन प्राप्त करावे और संग्रामों में वैरियों को जीते, वह सेनापति होवे ॥१॥


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    Meaning -
    All people, communities and nations adore and exalt Indra who brings wealth, peace and prosperity to humanity, creates light and hope for their battles of life, and challenges and destroys enemies by fighting them out.


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