अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 48/ मन्त्र 4
आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑दन्मा॒तरं॑ पु॒रः। पि॒तरं॑ च प्र॒यन्त्स्व: ॥
स्वर सहित पद पाठआ । अ॒यम् । गौ: । पृश्नि॑: । अ॒क्र॒मी॒त् । अस॑दत् । मा॒तर॑म् । पु॒र: ॥ पि॒तर॑म् । च॒ । प्र॒ऽयन् । स्व॑: ॥४८.४॥
स्वर रहित मन्त्र
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्व: ॥
स्वर रहित पद पाठआ । अयम् । गौ: । पृश्नि: । अक्रमीत् । असदत् । मातरम् । पुर: ॥ पितरम् । च । प्रऽयन् । स्व: ॥४८.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सूर्य वा भूमि के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(अयम्) यह (गौः) चलने वा चलानेवाला, (पृश्निः) रसों वा प्रकाश का छूनेवाला सूर्य (आ अक्रमीत्) घूमता हुआ है, (च) और (पितरम्) पालन करनेवाले (स्वः) आकाश में (प्रयन्) चलता हुआ (पुरः) सन्मुख होकर (मातरम्) सबकी बनानेवाली पृथिवी माता को (असदत्) व्यापा है ॥४॥
भावार्थ
यह सूर्य अन्तरिक्ष में घूमकर आकर्षण, वृष्टि आदि व्यापारों से पृथिवी आदि लोकों का उपकार करता है ॥४॥
टिप्पणी
मन्त्र ४-६ आचुके हैं-अ० ६।३१।१-३, वहाँ सविस्तार अर्थ देखो। ४-६−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० ६।३१।१-३ ॥
विषय
कुण्डलिनी का जागरण
पदार्थ
१. (अयम्) = यह (गौ:) = जागरित होने पर मेरुदण्ड में ऊपर गति करनेवाली [गच्छति] कुण्डलिनी (पृश्नि:) = [संस्प्रष्टो भासाम्-नि० २.१४] ज्योति के साथ सम्पर्कबाली होती है। यह प्राणायाम की उष्णता से (अक्रमीत्) = कुण्डल को तोड़कर आगे गति करती है। २. यह (पुरः) = आगे और आगे बढ़ती हुई (मातरम्) = वेदमाता को [स्तुता मया वरदा वेदमाता] (असदत्) = प्राप्त करती है। इसके जागरण व ऊर्ध्वगत होने पर 'ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा' ऋत का पोषण करनेवाली प्रज्ञा उत्पन्न होती है। यह प्रज्ञा वेदज्ञान का प्रकाश करती है। ३. (च) = और इस वेदज्ञान का प्रकाश होने पर यह (स्व:) = उस देदीप्यमान (पितरम्) = प्रभुरूप पिता की ओर (प्रयन्त्) -=जानेवाली होती है, अर्थात् यह योगी अन्ततः प्रभु का दर्शन करनेवाला होता है।
भावार्थ
कुण्डलिनी के जागरण से बुद्धि का प्रकाश होता है। वेदार्थ का स्पष्टीकरण होता है और प्रभु की प्राप्ति होती है।
भाषार्थ
(पृश्निः) नाना रूपरंगोंवाला (अयम्) यह (गौः) पृथिवीलोक, (मातरम्) अन्तरिक्ष में (असदत्) स्थित है, और परमेश्वर के सामर्थ्य द्वारा, (पुरः) पूर्व की ओर, (स्वः) प्रकाशमान (पितरम्) अपने पिता सूर्य की ओर (प्रयन्) प्रयाण करता हुआ, (अक्रमीत्) उसकी परिक्रमा कर रहा है।
टिप्पणी
[मातरि=अन्तरिक्षे (निरु০ ७.७.२६)। पितरम्=पृथिवीलोक का पिता है सूर्य। चूंकि पृथिवीलोक सूर्य से अलग हुआ है। और यह अन्तरिक्षरूपी माता की गोद में स्थित है, तथा पूर्व की ओर चलता हुआ सूर्य की परिक्रमा कर रहा है।]
विषय
ईश्वरोपासना।
भावार्थ
(४-६) तीनों मन्त्रों की व्याख्या देखो अथर्ववेद काण्ड ६। ३१। १-३।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
१-३ इन्द्रः। ४-६ सार्पराज्ञी सूर्यो वा देवता। गायत्र्यः। षडृचं सूक्तम्॥ ‘अभित्वा’ इति द्वाभ्यां सूक्ताभ्यां खिलौ इति बृहत् सर्वा०।
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
This earth moves round and round eastward abiding in its mother waters of the firmament and revolves round and round its father sustainer, the sun in heaven.
Translation
This sun rotating on axis revolving (the earth) moves taking the atmosphere and earth and spreads its light.
Translation
This sun rotating on axis revolving (the earth) moves taking the atmosphere and earth and spreads its light.
Translation
See A.V.6.31.1
Footnote
(4-6) cf. Rig, 10,184 or A.V. 6.31. Verse 3 has two readings, (ii) is according to Krishna Lal edited Samhita
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
मन्त्र ४-६ आचुके हैं-अ० ६।३१।१-३, वहाँ सविस्तार अर्थ देखो। ४-६−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० ६।३१।१-३ ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
৪-৬ সূর্যস্য ভূমের্বা গুণোপদেশঃ
भाषार्थ
(অয়ম্) এই (গৌ) চলন্ত বা চালক, (পৃশ্নিঃ) রস বা প্রকাশের স্পর্শকারী সূর্য (আ অক্রমীৎ) পরিক্রমা করে, (চ) এবং (পিতরম্) পালনকারী (স্বঃ) আকাশে (প্রয়ন্) সঞ্চরণ করে (পুরঃ) সন্মুখ হয়ে (মাতরম্) নির্মাত্রী পৃথিবী মাতাকে (অসদৎ) ব্যাপ্ত করেছে ॥৪॥
भावार्थ
এই সূর্য অন্তরিক্ষে পরিক্রমা করে আকর্ষণ, বৃষ্টি আদি দ্বারা পৃথিব্যাদি লোক-সমূহের উপকার করে ॥৪॥
भाषार्थ
(পৃশ্নিঃ) নানা রূপরঙবিশিষ্ট (অয়ম্) এই (গৌঃ) পৃথিবীলোক, (মাতরম্) অন্তরিক্ষে (অসদৎ) স্থিত, এবং পরমেশ্বরের সামর্থ্য দ্বারা, (পুরঃ) পূর্ব দিকে, (স্বঃ) প্রকাশমান (পিতরম্) নিজের পিতা সূর্যের দিকে (প্রয়ন্) প্রয়াণ করে, (অক্রমীৎ) উহার পরিক্রমা করছে।
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