अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 52/ मन्त्र 3
कण्वे॑भिर्धृष्ण॒वा धृ॒षद्वाजं॑ दर्षि सह॒स्रिण॑म्। पि॒शङ्ग॑रूपं मघवन्विचर्षणे म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥
स्वर सहित पद पाठकण्वे॑भि: । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । आ । धृ॒षत् । वाज॑म् । द॒र्षि॒ । स॒ह॒स्रिण॑म् ॥ पि॒शङ्ग॑ऽरूपम् । म॒घ॒ऽव॒न् । वि॒ऽच॒र्ष॒णे॒ । म॒क्षु ।गोऽम॑न्तम् । ई॒म॒हे॒ ॥५२.३॥
स्वर रहित मन्त्र
कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद्वाजं दर्षि सहस्रिणम्। पिशङ्गरूपं मघवन्विचर्षणे मक्षू गोमन्तमीमहे ॥
स्वर रहित पद पाठकण्वेभि: । धृष्णो इति । आ । धृषत् । वाजम् । दर्षि । सहस्रिणम् ॥ पिशङ्गऽरूपम् । मघऽवन् । विऽचर्षणे । मक्षु ।गोऽमन्तम् । ईमहे ॥५२.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा की उपासना का उपदेश।
पदार्थ
(धृष्णो) हे निर्भय ! [परमात्मन्] (धृषत्) दृढ़ता से (कण्वेभिः) बुद्धिमानों करके [किये हुए] (सहस्रिणम्) सहस्रों आनन्दवाले (वाजम्) वेग का (आ दर्षि) तू आदर करता है। (मघवन्) हे धनवाले ! (विचर्षणे) हे दूरदर्शी ! (पिशङ्गरूपम्) अवयवों को रूप देनेवाले, (गोमन्तम्) वेदवाणीवाले [तुझ] से (मक्षु) शीघ्र (ईमहे) हम प्रार्थना करते हैं ॥३॥
भावार्थ
वह परमात्मा परमाणुओं से सूर्य आदि बड़े-बड़े लोकों को बनानेवाला है, उस निर्भय की उपासना से मनुष्य धर्मात्मा होकर निर्भय होवें ॥३॥
टिप्पणी
३−(कण्वेभिः) मेधाविभिः (धृष्णो) हे प्रगल्भ (आ) (धृषत्) वर्तमाने पृषद्बृहन्महज्जगच्छतृवच्च। उ० २।८४। ञिधृषा प्रागल्भ्ये-अति, विभक्तेर्लुक्। निर्भयत्वेन (वाजम्) वेगम्। पौरुषम् (दर्षि) दृङ् आदरे-लट्, अदादित्वं छान्दसम्। आद्रियसे। सत्कारेण गृह्णासि (सहस्रिणम्) सहस्रहर्षोपेतम् (पिशङ्गरूपम्) अ० ९।४।२२। पिश अवयवे-अङ्गच्+रूप रूपकरणे-अच्। अवयवानां रूपकर्तारम् (मघवन्) हे धनवन् (विचर्षणे) अ० २०।।१। हे बहुदर्शिन् (मक्षु) शीघ्रम् (गोमन्तम्) वेदवाणीयुक्तम् (ईमहे) याचामहे ॥
विषय
वह बल!
पदार्थ
१. हे (धृष्णवो) = शत्रुओं का धर्षण करनेवाले प्रभो! आप (कण्वेभिः) = मेधावी पुरुषों के द्वारा उत्तम समझदार माता, पिता व आचार्य द्वारा वाजम् बल को (आदर्षि) = प्राप्त कराते हैं जोकि (धृषद्) = शत्रुओं का धर्षण करनेवाला है तथा (सहस्त्रिणम्) = [स हस् अथवा सहस्त्र] हमारे जीवन को आनन्दमय बनानेवाला है अथवा दीर्घजीवन का साधक है। २. हे (मघवन) = ऐश्वर्यशालिन! (विचर्षणे) = सर्वद्रष्टा प्रभो! हम आपसे (मक्षु) = शीघ्र उस जीवन की (ईमहे) = याचना करते हैं, जोकि (पिशंगरूपम्) = तेजस्वीरूपवाला व (गोमन्तम्) = प्रशस्त ज्ञानन्द्रियोंवाला है।
भावार्थ
हे प्रभो! आप उत्तम माता, पिता व आचार्यों द्वारा हमें उस बल को प्राप्त कराइए जिससे हम वासनारूप शत्रुओं का धर्षण करते हुए आनन्दमय जीवनवाले हों-तेजस्वी व प्रशस्त ज्ञानेन्द्रियोंवाले बनें। अगले सूक्त का ऋषि भी मेध्यातिथि ही है -
भाषार्थ
(धृष्णो) पापों का पराभव करनेवाले हे परमेश्वर! (कण्वेभिः) कण-कण द्वारा भक्ति का संचय करनेवाले मेधावी उपासकों, या इन्द्रियों का निमीलन करनेवाले ध्यानावस्थित उपासकों द्वारा चाहा गया (धृषद् वाजम्) पापधर्षक बल (आदर्षि) हमें आदरपूर्वक प्राप्त कराइए, जो बल कि (सहस्रिणम्) हजारों का उपकार करनेवाला हो। (मघवन्) हे बलरूपी धन के स्वामी! (विचर्षणे) हे सर्वद्रष्टा! (ईमहे) हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमें (गोमन्तम्) प्रशस्त इन्द्रियों समेत (पिशङ्गरूपम्) सूर्य सदृश तेजस्वी रूप (मक्षू) शीघ्र प्रदान कीजिए।
टिप्पणी
[कण्वेभिः=मेधाविनः (सायण)। कण्व=कण+व (वाला), या कण् निमीलने। पिशङ्ग=सुन्दर आकृतिवाला; पिश्= To shape, fashion, form (आप्टे)+अङ्ग। मक्षू=क्षिप्रम् (निघं০ २.१५)। गो= इन्द्रियां (उणादिकोश २.६७)।]
विषय
ईश्वर स्तुति।
भावार्थ
हे (मघवन्) ऐश्वर्यवन् ! हे (विचर्षणे) समस्त जगत् के द्रष्टः ! हे (धृष्णो) सबको वश करनेहारे ! समस्त संसार के भार सहने हारे ! आप (कण्वेभिः) मेधावी पुरुषों द्वारा (धृषद्) घर्षण करने, शत्रुओं का पराजय करने वाले (सहस्रिणम्) सहस्रों प्रकार के (वाजम्) ऐश्वर्य या बल का (आ दर्षि) प्रदान करते हैं। हम भी (मक्षू) निरन्तर उसी (पिशङ्गरूपम्) पीत वर्ण के (गोमन्तम्) गौ आदि पशुओं से युक्त ऐश्वर्य की (ईमहे) याचना करते हैं। अध्यात्म में—हम (गोमन्तं पिशङ्गरूपम् ईमहे) वाणी से युक्त अथवा गौ-प्राणों से युक्त तेजोमय आत्मा को साक्षात् करना चाहते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मेध्या तिथि ऋषिः। इन्दो देवता। बृहत्यः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
Indra, lord of universal vision, resolute will and irresistible action, ruler and commander of the world’s wealth, power and force, we pray, conceive, plan and bring about for the intelligent people of action and ambition a social order of golden beauty and progressive achievement, full of a hundred-fold prosperity of lands and cows, education and culture, and invincible will, strength and advancement free from indecision and delay in action
Translation
O All-beholding All conquerring, Almighty God, you defeating the tendencies of ignorance by the learned men give thousand-fold powers. We ask you for yellow-metaled wealth enriched with cows.
Translation
O All-beholding All conquering, Almighty God, you defeating the tendencies of ignorance by the learned men give thousand-fold powers. We ask you for yellow-metaled wealth enriched with cows.
Translation
O Lord of conquest and sustenance. Thou honourest the wise persons with thousand-fold prowess and wealth, capable of subduing others. O Lord of Fortunes and seers of all, we ever pray for the splendorous and brilliant state of beatitude.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(कण्वेभिः) मेधाविभिः (धृष्णो) हे प्रगल्भ (आ) (धृषत्) वर्तमाने पृषद्बृहन्महज्जगच्छतृवच्च। उ० २।८४। ञिधृषा प्रागल्भ्ये-अति, विभक्तेर्लुक्। निर्भयत्वेन (वाजम्) वेगम्। पौरुषम् (दर्षि) दृङ् आदरे-लट्, अदादित्वं छान्दसम्। आद्रियसे। सत्कारेण गृह्णासि (सहस्रिणम्) सहस्रहर्षोपेतम् (पिशङ्गरूपम्) अ० ९।४।२२। पिश अवयवे-अङ्गच्+रूप रूपकरणे-अच्। अवयवानां रूपकर्तारम् (मघवन्) हे धनवन् (विचर्षणे) अ० २०।।१। हे बहुदर्शिन् (मक्षु) शीघ्रम् (गोमन्तम्) वेदवाणीयुक्तम् (ईमहे) याचामहे ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
পরমাত্মোপাসনোপদেশঃ
भाषार्थ
(ধৃষ্ণো) হে নির্ভীক ! [পরমাত্মন্] (ধৃষৎ) দৃঢ়তাপূর্বক (কণ্বেভিঃ) বুদ্ধিমানদের দ্বারা [কৃত] (সহস্রিণম্) সহস্র আনন্দযুক্ত (বাজম্) বেগের (আ দর্ষি) আপনি আদর করেন। (মঘবন্) হে ধনবান ! (বিচর্ষণে) হে দূরদর্শী ! (পিশঙ্গরূপম্) অবয়ব-সমূহকে রূপ প্রদানকারী, (গোমন্তম্) বেদবাণীযুক্ত [আপনার] নিকট (মক্ষু) শীঘ্র (ঈমহে) আমরা প্রার্থনা করি ॥৩॥
भावार्थ
পরমাত্মা পরমাণু-সমূহ দ্বারা সূর্যাদি সমগ্র বৃহৎ লোক সমূহের রচিয়তা, সেই নির্ভীক পরমাত্মার উপাসনার মাধ্যমে মনুষ্য ধর্মাত্মা হয়ে নির্ভীক হোক।।৩।
भाषार्थ
(ধৃষ্ণো) পাপের পরাভবকারী হে পরমেশ্বর! (কণ্বেভিঃ) কণা-কণা দ্বারা ভক্তির সঞ্চয়কারী মেধাবী উপাসক, বা ইন্দ্রিয়-সমূহের নিমীলনকারী ধ্যানাবস্থিত উপাসকদের দ্বারা কাম্য (ধৃষদ্ বাজম্) পাপধর্ষক বল (আদর্ষি) আমাদের আদরপূর্বক প্রাপ্ত করান, যে বল (সহস্রিণম্) সহস্রের উপকারী । (মঘবন্) হে বলরূপী ধনের স্বামী! (বিচর্ষণে) হে সর্বদ্রষ্টা! (ঈমহে) আমরা আপনার প্রতি প্রার্থনা করি, আপনি আমাদের (গোমন্তম্) প্রশস্ত ইন্দ্রিয় সমেত (পিশঙ্গরূপম্) সূর্য সদৃশ তেজস্বী রূপ (মক্ষূ) শীঘ্র প্রদান করুন।
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