अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 64/ मन्त्र 3
त्वं हि शश्व॑तीना॒मिन्द्र॑ द॒र्ता पु॒रामसि॑। ह॒न्ता दस्यो॒र्मनो॑र्वृ॒धः पति॑र्दि॒वः ॥
स्वर सहित पद पाठत्वम् । हि । शश्व॑तीनाम् । इन्द्र॑ । द॒र्ता । पु॒राम् । असि॑ ॥ ह॒न्ता । दस्यो॑: । मनो॑: । वृ॒ध: । पति॑: । दि॒व: ॥६४.३॥
स्वर रहित मन्त्र
त्वं हि शश्वतीनामिन्द्र दर्ता पुरामसि। हन्ता दस्योर्मनोर्वृधः पतिर्दिवः ॥
स्वर रहित पद पाठत्वम् । हि । शश्वतीनाम् । इन्द्र । दर्ता । पुराम् । असि ॥ हन्ता । दस्यो: । मनो: । वृध: । पति: । दिव: ॥६४.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (त्वम्) तू (हि) ही [शत्रुओं की] (शश्वतीनाम्) सब (पुराम्) नगरियों का (दर्ता) तोड़नेवाला, (दस्योः) डाकू का (हन्ता) मारनेवाला और (मनोः) ज्ञानी का (वृधः) बढ़ानेवाला, (दिवः) सुख का (पतिः) स्वामी (असि) है ॥३॥
भावार्थ
परमात्मा सब विघ्नों को मिटाकर अपने भक्तों की उन्नति करके सुख देता है ॥३॥
टिप्पणी
३−(त्वम्) (हि) एव (शश्वतीनाम्) बह्वीनाम्। सर्वासाम् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (दर्ता) विदारयिता (पुराम्) शत्रुनगरीणाम् (असि) (हन्ता) घातकः (दस्योः) परधनापहर्तुः (मनोः) मननशीलस्य। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
पुरां दर्ता-मनोर्वृधः
पदार्थ
१. हे (इन्द्र) = शत्रुविद्रावक प्रभो! (त्वं हि) = आप ही (शश्वतीनाम्) = [बहीनाम्] अनेक (पुराम्) = काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रुओं की नगरियों के (दर्ता असि) = विदारण करनेवाले हैं। २. इन नगरियों का विध्वंस करके आप (दस्यो:) = हमारा उपक्षय करनेवाले के हन्ता असि नष्ट करनेवाले हैं। (मनो: वृधः) = विचारशील पुरुष का वर्धन करनेवाले हैं तथा (दिवः पति:) = प्रकाश व स्वर्ग के स्वामी हैं।
भावार्थ
शत्रु-पुरियों का विद्रावण करके दस्यु-हनन के द्वारा प्रभु विचारशील पुरुष का वर्धन करते हैं और जीवन को प्रकाशमय व स्वर्गवाला बनाते हैं।
भाषार्थ
(इन्द्र) हे परमेश्वर! (त्वम्) आप (हि) ही, (शश्वतीनाम्) शाश्वतकाल से परम्परा द्वारा होनेवाली (पुराम्) शरीररूपी नगरियों का (दर्ता असि) विदारण करनेवाले हैं, आप ही उपासकों के (दस्योः) उपक्षयकारी अविद्या आदि के (हन्ता) हननकर्त्ता हैं, (मनोः) श्रवण, मनन, निदिध्यासन करनेवाले को (वृधः) बढ़ाते हैं, (दिवः पतिः) और द्युलोक के पति स्वामी और रक्षक हैं।
विषय
ईश्वर और राजा।
भावार्थ
हे इन्द्र सेनापते ! (त्वं हि) तू निश्चय से (शश्वतीनाम्) शत्रुओं की सदा से चली आयीं समस्त (पुराम्) नगरियों या गढ़ों को (दर्त्ता असि) तोड़ने वाला है। तू (दस्योः हन्ता) डाकूजन का नाशक और दण्ड देने वाला और (मनोः) मननशील प्रजाजन का (वृधः) बढ़ाने वाला और (दिवः पतिः) ज्ञानी पुरुषों का या तेजस्वी राजपद का पति है। परमेश्वर के पक्ष में—हे प्रभो ! तू (शश्वतीनाम्) अनादिकाल से चली आईं इन समस्त (पुराम् दर्त्ता असि) देहरूप नगरियों को तोड़ने वाला देह-बन्धनों का नाशक है। (दस्योः) क्षयकारी प्रज्ञान का नाशक और (मनोः) ज्ञान का वर्धक और आत्म-प्रकाश का पालक है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
१-३ नृमेधाः। ४-६ गोसूक्त्यश्वसूक्तिनौ। इन्द्रो देवता। उष्णिहः॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
Indra, you are catalyser, breaker and maker, of the eternal forms of existence in cosmic dynamics, destroyer of the destroyer and promoter of thoughtful people. You are the guardian of the light of life, sustainer of the heavens of joy.
Translation
O Almighty God, are really the annihilator of the worlds having permanency in existence. You are the smiter of clouds and are the Lord of heaven.
Translation
O Almighty God, are really the annihilator of the worlds having permanency in existence. You are the smiter of clouds and are the Lord of heaven.
Translation
O Mighty Lord of Destruction, king or commander. Thou art the smasher of the constant heavenly bodies at the time of deluge (or forts of the foe) the Destroyer of Tire wicked forces of ignorance and darkness, the Impeller of the thoughtful and Protector of the forces of light and knowledge.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(त्वम्) (हि) एव (शश्वतीनाम्) बह्वीनाम्। सर्वासाम् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (दर्ता) विदारयिता (पुराम्) शत्रुनगरीणाम् (असि) (हन्ता) घातकः (दस्योः) परधनापहर्तुः (मनोः) मननशीलस्य। अन्यत् पूर्ववत् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
পরমাত্মগুণোপদেশঃ
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে ইন্দ্র ! [পরম ঐশ্বর্যবান্ পরমাত্মন্] (ত্বম্) আপনি (হি) ই [শত্রুদের] (শশ্বতীনাম্) সমস্ত (পুরাম্) নগরীর (দর্তা) বিধ্বংসকারী, (দস্যোঃ) দস্যুদের (হন্তা) ঘাতক এবং (মনোঃ) জ্ঞানীদের (বৃধঃ) বর্ধণকারী, (দিবঃ) সুখের (পতিঃ) স্বামী (অসি) হন ॥৩॥
भावार्थ
পরমাত্মা সমস্ত বিঘ্ন দূর করে নিজ ভক্তগণের উন্নতি বিধান করে সুখ-সমৃদ্ধি নিশ্চিত করেন ॥৩॥
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (ত্বম্) আপনি (হি) ই, (শশ্বতীনাম্) শাশ্বতকাল থেকে পরম্পরা দ্বারা হওয়া/বর্তমান (পুরাম্) শরীররূপী নগরীর (দর্তা অসি) বিদারক, আপনিই উপাসকদের (দস্যোঃ) উপক্ষয়কারী অবিদ্যাদির (হন্তা) হননকর্ত্তা, (মনোঃ) শ্রবণ, মনন, নিদিধ্যাসন অভ্যাসীকে (বৃধঃ) বর্ধিত করেন, (দিবঃ পতিঃ) এবং দ্যুলোকের পতি, স্বামী ও রক্ষক।
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