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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 73 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 73/ मन्त्र 3
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिपदा विराडनुष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-७३
    37

    प्र वो॑ म॒हे म॑हि॒वृधे॑ भरध्वं॒ प्रचे॑तसे॒ प्र सु॑म॒तिं कृ॑णुध्वम्। विशः॑ पू॒र्वीः प्र च॑रा चर्षणि॒प्राः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । व॒: । म॒हे । म॒हि॒ऽवृधे॑ । भ॒र॒ध्व॒म् । प्रऽचे॑तसे । प्र । सु॒म॒तिम् । कृ॒णु॒ध्व॒म् ॥ विश॑: । पू॒र्वी: । प्र । च॒र॒ । च॒र्ष॒णि॒: । प्रा: ॥७३.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र वो महे महिवृधे भरध्वं प्रचेतसे प्र सुमतिं कृणुध्वम्। विशः पूर्वीः प्र चरा चर्षणिप्राः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । व: । महे । महिऽवृधे । भरध्वम् । प्रऽचेतसे । प्र । सुमतिम् । कृणुध्वम् ॥ विश: । पूर्वी: । प्र । चर । चर्षणि: । प्रा: ॥७३.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 73; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सेनापति के लक्षण का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे विद्वानो !] (वः) अपने लिये (महे) महान् (महिवृधे) बड़ों के बढ़ानेवाले, (प्रचेतसे) उत्तम ज्ञानी [दूरदर्शी राजा] के लिये (सुमतिम्) सुन्दर मति को (प्र) अच्छे प्रकार (भरध्वम्) धारण करो और (प्र) सामने (कृणुध्वम्) करो। [हे सभापते !] (चर्षणिप्राः) मनुष्यों के मनोरथ पूरा करनेवाला तू (पूर्वीः) प्राचीन (विशः) प्रजाओं को (प्र चर) फैला ॥३॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोग चतुर नीतिज्ञ सभापति के आश्रय से अपनी उन्नति करें और सभापति उन लोगों के मेल से अपना और प्रजा का ऐश्वर्य बढ़ावें ॥३॥

    टिप्पणी

    यह मन्त्र ऋग्वेद में है-७।३१।१० ॥ ३−(प्र) प्रकर्षेण (वः) युष्मभ्यम्। स्वकीयार्थम् (महे) महते (महिवृधे) महीनां महतां वर्धकाय (भरध्वम्) धारयत (प्रचेतसे) प्रकृष्टज्ञानाय। दूरदर्शिने (प्र) (सुमतिम्) शोभनां बुद्धिम् (कृणुध्वम्) कुरुत (विशः) प्रजाः (पूर्वीः) प्राचीनाः पितापितामहादिभ्यः प्राप्ताः (प्र चर) प्रसारय (चर्षणिप्राः) अ० २०।११।७। मनुष्याणां मनोरथपूरकः ॥

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    विषय

    स्तवन सुमति

    पदार्थ

    १. हे मनुष्यो! उस (महे) = महान्, (महिवृधे) = महान् वृद्धि करनेवाले प्रभु के लिए (प्रभरध्वम्) = स्तुति का भरण करो। (प्रचेतसे) = उस प्रकृष्ट ज्ञानवाले प्रभु के लिए (समतिम्) = कल्याणीमति को (प्रकृणुध्वम्) = प्रकर्षेण करनेवाले बनो। यह स्तुति व सुमति ही तुम्हें प्रभु की ओर ले-चलेगी। २. हे प्रभो! आप (पूर्वी) = पालन व पूरण करनेवाली (विश:) = प्रजाओं में (प्रचरः) = गतिवाले होते हो। वस्तुत: (चर्षणिप्रा:) = आप ही इन श्रमशील मनुष्यों का पूरण करते हो। जितना-जितना मैं प्रभु का भाव जागरित करूँगा उतना-उतना ही उन्नत होता जाऊँगा।

    भावार्थ

    प्रभु-प्राप्ति के लिए हम स्तवन की वृत्तिवाले बनें, सुमति का सम्पादन करें, अपना पालन व पूरण करने के लिए यत्नशील हों।

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    भाषार्थ

    हे मनुष्यो! (वः) तुम्हारी (महिवृधे) महावृद्धि करनेवाले, (महे) महान्-आत्मा की प्राप्ति के लिए, (प्र भरध्वम्) अपने आपको पूर्णतया विषयों से पराङ्मुख कर लो। इस प्रकार (प्रचेतसे) सर्वज्ञ परमेश्वर की प्राप्ति के लिए, (सुमतिम्) अपनी सुमति को (प्रकृणुध्वम्) और प्रकृष्ट बना लो। और हे परमेश्वर! आप (पूर्वीः) सद्गुणों से परिपूर्ण, या योगाभ्यास में परिपूर्ण (विशः) उपासकजनों में (प्रचर) विचरिये, उनके हृदयों में विचरिये। आप (चर्षणिप्राः) सब मनुष्यों को सुखों से भरपुर कर रहे हैं।

    टिप्पणी

    [भरध्वम्=भृ (हृ) हृग्रहोः भः छन्दसि; प्रत्याहार-साधना द्वारा इन्द्रियों को विषयों से हरना, हटाना। पूर्वोः=पूर्व पूरणे।]

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    विषय

    परमेश्वर और राजा।

    भावार्थ

    हे विद्वान् पुरुषो ! (वः) तुम लोग (महे) उस महान् (महिवृधे) बड़े ऐश्वर्य को बढ़ाने वाले अथवा बड़े बड़े संकटों को काट डालने वाले (प्रचेतसे) उत्कृष्ट ज्ञानवान् परमेश्वर के लिये (प्र भरध्वम्) उत्तम विचारों का मनन करो। और (सुमतिं) शुभ बुद्धि या स्तुति (प्र कृणुध्वम्) करो। हे परमेश्वर तू (चर्षणिप्राः) मनुष्यों को समस्त ऐश्वर्यों से पूर्ण करने हारा होकर (विशः) मनुष्यों और प्रज़ाओं को (पूर्वीः) ज्ञान और बल में पूर्ण (प्र चर) कर। राजा के पक्ष में—हे मनुष्यो ! तुम (महि वृधे महे) बड़े बड़े शत्रुओं को गिराने वाले बड़े राजा के लिये (प्र भरध्वम्) भेटें लाओ। उसके प्रति (सुमतिं प्र कृणुध्वम्) उत्तम चित्त बनाये रखो। हे राजन् ! तू (चर्षणिप्राः) प्रजाओं की कामनाओं को पूर्ण करने वाला होकर (विशः) प्रजाओं को (पूर्वीः प्र चर) धन, बल आयुष्य में पूर्ण कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१-३ वसिष्ठः, ४-६ वसुक्रः। देवता—इन्द्रः। छन्दः—१-३ विराडनुष्टुप्ः, ४-५ जगती, ६ अभिसारिणीत्रिष्टुप्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    In dr a Devata

    Meaning

    Bear and bring homage, assistance and cooperation and offer positive thoughts and advice to Indra, your leader and ruler. Great is he, promoter of great people and the common wealth, and a leader wide¬ awake with deep and distant foresight. O leader and ruler of the land, be good to the settled ancient people and take care of the farming communities and other professionals so that all feel happy and fulfilled without frustration.

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    Translation

    O Ye men, you for yourselves develop and cherish a nice understanding in the belief of Divinity who is great, all intelligence and the strengthening force for great powers. O proctor of mainkind, you pervade all the subjects obounding in perfection.

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    Translation

    O Ye men, you for yourselves develop and cherish a nice understanding in the belief of Divinity who is great, all intelligence and the strengthening force for great powers. O proctor of mainkind, you pervade all the subjects obounding in perfection.

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    Translation

    O learned persons, fully entertain and cherish good thoughts and praise words for the Almighty, the source of all Prosperity and Progress, the Perfect Enlightener. O Fulfiller of the aspirations of the people, full fill the desires of the people to their heart's content.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह मन्त्र ऋग्वेद में है-७।३१।१० ॥ ३−(प्र) प्रकर्षेण (वः) युष्मभ्यम्। स्वकीयार्थम् (महे) महते (महिवृधे) महीनां महतां वर्धकाय (भरध्वम्) धारयत (प्रचेतसे) प्रकृष्टज्ञानाय। दूरदर्शिने (प्र) (सुमतिम्) शोभनां बुद्धिम् (कृणुध्वम्) कुरुत (विशः) प्रजाः (पूर्वीः) प्राचीनाः पितापितामहादिभ्यः प्राप्ताः (प्र चर) प्रसारय (चर्षणिप्राः) अ० २०।११।७। मनुष्याणां मनोरथपूरकः ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    সেনাপতিলক্ষণোপদেশঃ

    भाषार्थ

    [হে বিদ্বান !] (বঃ) নিজের জন্য (মহে) মহান্ (মহিবৃধে) মহৎদের বৃদ্ধিকারক, (প্রচেতসে) উত্তম জ্ঞানীর [দূরদর্শী রাজার] জন্য (সুমতিম্) সুন্দর মতিকে (প্র) উত্তম প্রকারে (ভরধ্বম্) ধারণ করো এবং (প্র) সামনে (কৃণুধ্বম্) ধাবন করো। [হে সভাপতি !] (চর্ষণিপ্রাঃ) মনুষ্যগণের মনোরথ পূরণকারী তুমি (পূর্বীঃ) প্রাচীন (বিশঃ) প্রজাদের (প্র চর) বিস্তার করো ॥৩॥

    भावार्थ

    বিদ্বানগণ চতুর নীতিজ্ঞ সভাপতির আশ্রয়ে নিজের উন্নতি করুক এবং সভাপতি সে সকল লোকেদের সম্মিলনে নিজের এবং প্রজার ঐশ্বর্য বৃদ্ধি করুক ॥৩॥ এই মন্ত্র ঋগ্বেদে আছে-৭।৩১।১০ ॥

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    भाषार्थ

    হে মনুষ্যগণ! (বঃ) তোমাদের (মহিবৃধে) মহাবৃদ্ধিকারী, (মহে) মহান্-আত্মার প্রাপ্তির জন্য, (প্র ভরধ্বম্) নিজেকে পূর্ণরূপে বিষয় থেকে পরাঙ্মুখ করো/করে নাও। এইভাবে (প্রচেতসে) সর্বজ্ঞ পরমেশ্বরের প্রাপ্তির জন্য, (সুমতিম্) নিজের সুমতিকে (প্রকৃণুধ্বম্) অধিক প্রকৃষ্ট করো। এবং হে পরমেশ্বর! আপনি (পূর্বীঃ) সদ্গুণ দ্বারা পরিপূর্ণ, বা যোগাভ্যাসে পরিপূর্ণ (বিশঃ) উপাসকদের মধ্যে (প্রচর) বিচরণ করুন, তাঁদের হৃদয়ে বিচরণ করুন। আপনি (চর্ষণিপ্রাঃ) সকল মনুষ্যদের সুখ দ্বারা ভরপুর/পরিপূর্ণ করছেন।

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