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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 94 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 94/ मन्त्र 9
    ऋषिः - कृष्णः देवता - इन्द्रः छन्दः - जगती सूक्तम् - सूक्त-९४
    72

    इ॒मं बि॑भर्मि॒ सुकृ॑तं ते अङ्कु॒शं येना॑रु॒जासि॑ मघवञ्छफा॒रुजः॑। अ॒स्मिन्त्सु ते॒ सव॑ने अस्त्वो॒क्यं सु॒त इ॒ष्टौ म॑घवन्बो॒ध्याभ॑गः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒मम् । बि॒भ॒र्मि॒ । सुऽकृ॑तम् । ते॒ । अ॒ङ्कु॒शम् । येन॑ । आ॒ऽरु॒जासि॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । श॒फ॒ऽआ॒रुज॑: ॥ अ॒स्मिन् । सु । ते । सव॑ने । अ॒स्तु॒ । ओ॒क्य॑म् । सु॒ते । इ॒ष्टौ । म॒घ॒ऽव॒न् । बो॒धि॒ । आऽभ॑ग:॥९४.९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इमं बिभर्मि सुकृतं ते अङ्कुशं येनारुजासि मघवञ्छफारुजः। अस्मिन्त्सु ते सवने अस्त्वोक्यं सुत इष्टौ मघवन्बोध्याभगः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इमम् । बिभर्मि । सुऽकृतम् । ते । अङ्कुशम् । येन । आऽरुजासि । मघऽवन् । शफऽआरुज: ॥ अस्मिन् । सु । ते । सवने । अस्तु । ओक्यम् । सुते । इष्टौ । मघऽवन् । बोधि । आऽभग:॥९४.९॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 94; मन्त्र » 9
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (मघवन्) हे महाधनी ! (इमम्) इस (सुकृतम्) दृढ़ बने हुए (अङ्कुशम्) अङ्कुश को (ते) तेरे लिये (बिभर्भि) मैं रखता हूँ, (येन) जिस [कारण] से (शफारुजः) शान्ति भंजकों को (आरुजासि) तू नष्ट करे। (अस्मिन्) इस (सवने) ऐश्वर्य के बीच (ते) तेरा (ओक्यम्) निवास (सु) भले प्रकार (अस्तु) होवे, (इष्टौ) यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण और दान] के बीच (सुते) सिद्ध किये हुए तत्त्व रस में (मघवन्) हे महाधनी ! (आभगः) बड़ा ऐश्वर्य (बोधि) जाना जाता है ॥९॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोग राजा की रक्षा के लिये अङ्कुश आदि हथियार धारण करके शत्रुओं को हटाकर ऐश्वर्य बढ़ावें ॥९॥

    टिप्पणी

    ९−(इमम्) दृश्यमानम् (बिभर्भि) धरामि (सुकृतम्) दृढनिर्मितम् (ते) तुभ्यम् (अङ्कुशम्) आयुधविशेषम् (येन) कारणेन (आरुजासि) आरुजसि। आभिमुख्येन पीडयसि (मघवन्) हे धनवन् (शफारुजः) अ० ८।३।२१। शम शान्तौ-अच्, मस्य फः, शफ+आ+रुजो भङ्गे-क्विप्। शान्तिसम्भञ्जकान् (अस्मिन्) (सु) सुष्ठु (ते) तव (सवने) ऐश्वर्ये (अस्तु) (ओक्यम्) ओकः। निवासः (सुते) संस्कृते तत्त्वरसे (इष्टौ) यज्ञे। देवपूजादिव्यवहारे (मघवन्) (बोधि) अबोधि। ज्ञायते (आभगः) समन्ताद् ऐश्वर्यम् ॥

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    विषय

    प्रभु-स्तवनरूप अंकुश

    पदार्थ

    १. हे प्रभो! (इमम्) = इस (ते) = आपके (सुक्तम्) = पुण्य के कारणभूत (अंकुशम्) = स्तवन को (बिभर्मि) = मैं धारण करता है। यहाँ स्तुति को अंकुश इसलिए कहा है कि यह हमें मार्ग पर चलने के लिए प्रेरक होती है। अंकुशहाथी को मार्गभ्रष्ट नहीं होने देता-इसी प्रकार स्तुति मनुष्य को मार्गभ्रष्ट होने से बचाती है। हे (मघवन्) = सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के स्वामिन् प्रभो! यह स्तुतिरूप अंकुश वह है, (येन) = जिससे (शफारुजः) = [शफ root of a tree] शरीररूप वृक्ष के मूल पर आघात करनेवाले 'काम, क्रोध, लोभ' को आप (आरुजासि) = छिन्न-भिन्न कर देते हो। 'काम' शरीर को, 'क्रोध' मन को तथा लोभ' बुद्धि को नष्ट कर देता है। इन तीनों शफारुजों को प्रभु का स्तवन नष्ट कर देता है। २. इनको नष्ट करके हम चाहते हैं कि (अस्मिन् सवने सुते) = इस जीवन-यज्ञ में सोम का सम्पादन होने पर (ओक्यम् अस्तु) = प्रभु का यहाँ निवास हो। हे (आभग:) = आभजनीय सर्वदा स्तवन के योग्य प्रभो! (इष्टौ सुते) = इस जीवन को यज्ञरूप में चलाने पर (बोधि) = आप हमारा ध्यान कीजिए। आपसे रक्षित होकर हम इस जीवन को यज्ञ का रूप दे सकेंगे।

    भावार्थ

    प्रभु का स्तवन हमारे जीवनरूप हाथी के लिए अंकुश के समान हो। हम जीवन को यज्ञमय बनाएँ। इस जीवन-यज्ञ में प्रभु का निवास हो।

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    भाषार्थ

    हे परमेश्वर! (सुकृतम्) प्रजा को सुकर्मी करनेवाले, (ते) आपके (इमम् अङ्कुशम्) इस न्यायाङ्कुश को (बिभर्मि) मैं अपने जीवन में धारण करता हूँ, (येन) सिज न्यायाङ्कुश द्वारा (मघवन्) हे ऐश्वर्यशाली! (शफारुजः) गौ आदि के खुर के स्पर्शमात्र से जैसे खुम्भ नष्ट हो जाती है, वैसे आप दुष्कर्मियों को (आ रुजासि) सम्पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं। (मघवन्) हे ऐश्वर्यशाली! (अस्मिन् सवने) इस भक्तिरसमय-उपासना-यज्ञ में (ते) आपका (सु ओक्यम्) उत्तम निवास (अस्तु) हो, और (इष्टौ) इस उपासना-यज्ञ में (सुते) प्रकट हुए भक्तिरस के आप (आ भगः) पूर्णतया भागी बनिए, और (बोधि) हमारी भावनाओं और इच्छाओं को जानिए।

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    विषय

    राजा, आत्मा और परमेश्वर।

    भावार्थ

    हे परमेश्वर ! मैं (ते) तेरे बनाये या दिये (सुकृतम्) पुण्याचरण रूप या उत्तम रीति से साधित (अंकुशं) अंकुश, प्रेरक बल या ज्ञान को अपने ऊपर शासक के रूप में (बिभर्मि) धारण करता हूं। (येन) जिससे हे (मघवन्) ऐश्वर्यवन् ! तू (शफारुजः) निन्दा वचनों से हृदय को पीड़ा देने वाले दुष्ट पुरुषों को भी तु (आ रुजासि) पीड़ित करता है। (ते) तेरे (अस्मिन् सवने) इस महान ऐश्वर्य या शासन में हमारा (ओक्यम्) निवास (सु अस्तु) उत्तम रीति से हो। और हे (मघवन्) ऐश्वर्यवन् ! (आ भगः) सब प्रकार से सेवन करने योग्य तू (सुते इष्टौ) उपासना रूप यज्ञ के सम्पादन करने के अवसर में (बोधि) हमारे अभिप्राय और स्तुति को जान।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    आंगिरसः कृष्ण ऋषिः। १-३, १०, ११ त्रिष्टुभः। ४-९ जगत्यः। एकादशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Brhaspati Devata

    Meaning

    I happily abide by this law and discipline of yours, Indra, which is divinely maintained and sustained, the law by which, O lord of power and glory, you punish those who strike life by their hoof and claw. May your presence abide in this holy seat of my yajna in the heart and soul. May your divine majesty, O lord of glory, know and fulfil our desire in this cherished act of love and faith. I happily abide by this law and discipline of yours, Indra, which is divinely maintained and sustained, the law by which, O lord of power and glory, you punish those who strike life by their hoof and claw. May your presence abide in this holy seat of my yajna in the heart and soul. May your divine majesty, O lord of glory, know and fulfil our desire in this cherished act of love and faith.

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    Translation

    O Almighty Divinity, I bear in to action your control that, intiates in doing good undoing evils and through which you punish the men intending to trouble others. Under your this control there be my abode. O Bounteous Lord in the Yajna arranged you know our intentions.

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    Translation

    O Almighty Divinity, I bear in to action your control that initiates in doing good undoing evils and through which you punish the men intending to trouble others. Under your this control there be my abode. O Bounteous Lord in the Yajna arranged you know our intentions.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ९−(इमम्) दृश्यमानम् (बिभर्भि) धरामि (सुकृतम्) दृढनिर्मितम् (ते) तुभ्यम् (अङ्कुशम्) आयुधविशेषम् (येन) कारणेन (आरुजासि) आरुजसि। आभिमुख्येन पीडयसि (मघवन्) हे धनवन् (शफारुजः) अ० ८।३।२१। शम शान्तौ-अच्, मस्य फः, शफ+आ+रुजो भङ्गे-क्विप्। शान्तिसम्भञ्जकान् (अस्मिन्) (सु) सुष्ठु (ते) तव (सवने) ऐश्वर्ये (अस्तु) (ओक्यम्) ओकः। निवासः (सुते) संस्कृते तत्त्वरसे (इष्टौ) यज्ञे। देवपूजादिव्यवहारे (मघवन्) (बोधि) अबोधि। ज्ञायते (आभगः) समन्ताद् ऐश्वर्यम् ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজপ্রজাকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (মঘবন্) হে মহাধনী ! (ইমম্) এই (সুকৃতম্) দৃঢ়নির্মিত (অঙ্কুশম্) অঙ্কুশকে (তে) তোমার জন্য (বিভর্ভি) আমি রক্ষণ করি, (যেন) যা [যার কারণে] দ্বারা (শফারুজঃ) শান্তি ভঙ্গকারীদের (আরুজাসি) তুমি বিনাশ করো। (অস্মিন্) এই (সবনে) ঐশ্বর্যের মধ্যে (তে) তোমার (ওক্যম্) নিবাস (সু) উত্তমরূপে (অস্তু) হোক, (ইষ্টৌ) যজ্ঞে [দেবপূজা, সঙ্গতিকরণ এবং দান]-এর মাধ্যমে (সুতে) সিদ্ধকৃত তত্ত্বরসে (মঘবন্) হে মহাধনী ! (আভগঃ) সমস্ত ঐশ্বর্য বিদ্যমান এরূপ (বোধি) জানা যায়॥৯॥

    भावार्थ

    বিদ্বানগণ রাজার রক্ষার জন্য অঙ্কুশ আদি শস্ত্র ধারণ করে শত্রুদের পরাজিত করে ঐশ্বর্য বৃদ্ধি করে/করুক॥৯॥

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    भाषार्थ

    হে পরমেশ্বর! (সুকৃতম্) প্রজাকে সুকর্মীকারী, (তে) আপনার (ইমম্ অঙ্কুশম্) এই ন্যায়াঙ্কুশ (বিভর্মি) আমি নিজের জীবনে ধারণ করি, (যেন) সিজ ন্যায়াঙ্কুশ দ্বারা (মঘবন্) হে ঐশ্বর্যশালী! (শফারুজঃ) গাভী আদির খুরের স্পর্শমাত্র দ্বারা যেমন খুম্ভ/ছোটো ঘাস নষ্ট হয়ে যায়, তেমনই আপনি দুষ্কর্মীদের (আ রুজাসি) সম্পূর্ণরূপে নষ্ট-ভ্রষ্ট করেন। (মঘবন্) হে ঐশ্বর্যশালী! (অস্মিন্ সবনে) এই ভক্তিরসময়-উপাসনা-যজ্ঞে (তে) আপনার (সু ওক্যম্) উত্তম নিবাস (অস্তু) হোক, এবং (ইষ্টৌ) এই উপাসনা-যজ্ঞে (সুতে) প্রকটিত ভক্তিরসের আপনি (আ ভগঃ) পূর্ণরূপে ভাগী/অংশীদার হন, এবং (বোধি) আমাদের ভাবনা এবং ইচ্ছা-সমূহকে জ্ঞাত হন।

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