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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 27 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 27/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - रुद्रः, प्राचीदिशा, अग्निः, असितः, आदित्यगणः छन्दः - पञ्चपदा ककुम्मतीगर्भाष्टिः सूक्तम् - शत्रुनिवारण सूक्त
    173

    प्राची॒ दिग॒ग्निरधि॑पतिरसि॒तो र॑क्षि॒तादि॒त्या इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒स्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्राची॑ । दिक् । अ॒ग्नि: । अधि॑ऽपति: । अ॒सि॒त: । र॒क्षि॒ता । आ॒दि॒त्या: । इष॑व: । तेभ्य॑: । नम॑: । अधि॑पतिऽभ्य: । नम॑: । र॒क्षि॒तृऽभ्य॑: । नम॑: । इषु॑ऽभ्य: । नम॑: । ए॒भ्य॒: । अ॒स्तु॒ । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म:। तम् । व॒: । जम्भे॑ । द॒ध्म॒: ॥२७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः। तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। योस्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्राची । दिक् । अग्नि: । अधिऽपति: । असित: । रक्षिता । आदित्या: । इषव: । तेभ्य: । नम: । अधिपतिऽभ्य: । नम: । रक्षितृऽभ्य: । नम: । इषुऽभ्य: । नम: । एभ्य: । अस्तु । य: । अस्मान् । द्वेष्टि । यम् । वयम् । द्विष्म:। तम् । व: । जम्भे । दध्म: ॥२७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 27; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सेना व्यूह का उपदेश।

    पदार्थ

    (प्राची=प्राच्याः) पूर्व वा सन्मुखवाली (दिक्=दिशः) दिशा का (अग्निः) अग्नि [अग्नि विद्या में निपुण सेनापति] (अधिपतिः) अधिष्ठाता हो, (असितः) कृष्ण सर्प [के समान सेना व्यूह] (रक्षिता) रक्षक हो, (आदित्याः) सूर्य से संबन्धवाले (इषवः) बाण हों। (तेभ्यः) उन (अधिपतिभ्यः) अधिष्ठाताओं और (रक्षितृभ्यः) रक्षकों के लिये (नमो नमः) बहुत बहुत सत्कार वा अन्न और (एम्यः) इन (इषुभ्यः) बाणों [बाणवालों] के लिये (नमोनमः) बहुत-२ सत्कार वा अन्न (अस्तु) होवे (यः) जो [वैरी] (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) वैर करता है, [अथवा] (यम्) जिस [वैरी से] (वयम्) हम (द्विष्मः) वैर करते हैं, [हे शूरो] (तम्) उसको (वः) तुम्हारे (जम्भे) जबड़े में (दध्मः) हम धरते हैं ॥१॥

    भावार्थ

    (आदित्याः इषवः) बाण अर्थात् सब अस्त्र शस्त्र सूर्य वा बिजुली वा अग्नि के प्रयोग से चलनेवाले हों। शत्रु दो प्रकार के होते हैं, एक वे जो अपनी दुष्टता से धर्मात्माओं को बुरा जानते हैं, दूसरे वे जिनको धर्मात्मा लोग उनकी दुष्टता के कारण बुरा समझते हैं। उक्त दिशा में (अग्नि) पदवाला सेनापति (असित) नाम काले साँप के समान सेना व्यूह से ऐसे दुष्टों को जीतकर सैनिकों सहित यशस्वी होकर धर्मात्माओं की रक्षा करे ॥१॥

    टिप्पणी

    १−प्राची। प्राच्याम्। सू० २६ मा० १। इत्यत्रोक्तप्रकारेण रूपसिद्धिः। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तिलोपः। प्राच्याः। पूर्वायाः। अभिमुखीभूतायाः (दिक्) विभक्तिलोपः। दिशः (अग्निः) अग्निविद्यायां कुशलः पुरुषः (अधिपतिः) अधिष्ठाता। स्वामी (असितः) अ० १।२३।३। अबद्धः। कृष्णवर्णः सर्पः-इति सायणः। कृष्णसर्पवत् सेनाव्यूहः (रक्षिता) रक्षकः (आदित्याः) अ० १।९।१। दित्यदित्यादित्य० पा० ४।१।५८। इति आदित्य-ण्य प्रत्ययः। आदित्यस्य सूर्यस्य सम्बन्धिनः। सूर्यविद्युदग्निप्रयोगेण सिद्धाः (इषवः) अ० १।१३।४। आयुधानि-इति सायणः। इषुरीषतेर्गतिकर्मणो वधकर्मणो वा-निरु० ९।१८। बाणाः। अस्त्रशस्त्राणि। इषुधारिणः। शूराः (तेभ्यः) दूरस्थेभ्यः। (नमः नमः) अतिशयेन सत्कारोऽन्नं वा। नमः=अन्नम्-निघ० २।८। (एभ्यः) समीपस्थेभ्यः (यः) दुष्टः। शत्रुः (द्वेष्टि) बाधते (द्विष्मः) बाधामहे (वः) युष्माकम्। शूराणाम् (जम्भे) जभि नाशे-घञ्। हनौ [Jaw] (दध्मः) धारयामः। अन्यत् सुगमम् ॥

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    विषय

    प्राची दिशा

    व्याख्याः शृङ्गी ऋषि कृष्ण दत्त जी महाराज

    सबसे प्रथम प्राची दिक्, दक्षिणी दिक्, प्रतीची दिक्, उदीची दिक् ध्रुवा, दिक ऊर्ध्वा दिक् ईशान कोणें और दक्षिणाय कृति कहलाती है ये अष्ट भुजाएं कहलाती हैंयह जो प्रकृति का सर्वत्र ब्रह्माण्ड, प्रकृति की जो रचना हो रही है वह सबसे प्रथम पूर्व दिशा से प्रकाश आता हैवह प्रातःकाल में अदिति, सूर्य उदय होता है इसीलिए उस मां का सबसे प्रथम भुज प्राची दिक्, हमारे यहाँ पूर्व दिशा में आता है जिसमें अदिति उत्पन्न होते हैं।

    वह प्रकाश का भण्डार हैप्रातः काल होते ही प्रत्येक मानव पूर्व मुख हो करके वह याग करता हैक्योंकि पूर्वाभिमुख होकर के याग इसीलिए, क्योंकि वह प्रकाश का भण्डार हैं वह मां इस प्रकृति का एक भुज कहलाता हैउसके एक भुज में प्रकाश है।

    वह प्रकाश कैसा है? पूर्व दिशा से ही सूर्य उदय होता हैवह ऊषा और कान्ति के सहित आता हैप्रातःकालीन जब सूर्य उदय होती है, तो ऊषा और कान्ति प्रसाद रूप में मानव को प्राप्त होती हैहे मानव! तू उस प्रसाद को प्राप्त करने वाला बनजब ऊषाकाल होता है उस ऊषाकाल में, अन्तरिक्ष में लालिमा होती है, वह लालिमा मानव के नेत्र का प्रकाश बन करके मानव को अमृत बिखेरती रहती हैप्रत्येक मानव अमृत को पान करता रहता है।

    हमारे ऋषि मुनियों ने कहा कि जो साधना करने वाले पुरुष हैं, जो गृह में रहने वाले पुरुष हैं, वे सदैव जागरूक हो जाएं और वे पूर्वाभिमुख हो करके, अपना ध्यान अथवा साधना करने में सदैव रत्त रहेंक्योंकि वह प्रकाश का भण्डार हैक्योंकि प्रकाश ही तो मानव का जीवन हैप्रकाश के आने पर कांति बन करके आती है, अन्धकार समाप्त हो जाता हैक्योंकि अन्धकार अज्ञान का प्रतीक है और प्रकाश ज्ञान का प्रतीक माना गया है।

    सबसे प्रथम ये पूर्व कहलाता हैयह देवी कि एक भुजा कहलाती है, मां काली की एक भुजा कहलाती है।

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    विषय

    प्राची दिक्

    पदार्थ

    १. (प्राची दिक्) = [प्र अञ्च] आगे बढ़ने की दिशा है। इसमें उदित होकर सूर्य आगे और-आगे बढ़ता है। इसीप्रकार इस दिशा का संकेत प्राप्त करके जो आगे बढ़ता चलता है, वह एक दिन इस प्रगति का (अधिपतिः) = स्वामी होता है। इसका नाम (अग्नि:) = अग्नि हो जाता है। इसने आगे बढ़ते हुए अपने आपको अग्रस्थान पर प्राप्त कराया है। इस प्रगति का (रक्षिता) = रक्षक (असित:) = अ+सित है-अबद्ध है। जो विषयों से बद्ध नहीं हुआ वही प्रगति के मार्ग का पथिक होता है। इस प्रगति के लिए निरन्तर आगे बढ़ते हुए (आदित्या:) = सूर्य (इषवः) = प्रेरक हैं। सूर्य से प्रेरणा प्राप्त करके हम सूर्य के समान निरन्तर आगे बढ़ते हैं। २. (तेभ्यः नम:) = उन्नति-पथ पर चलनेवालों के लिए नमस्कार हो। (रक्षितृभ्यः नमः) = उन्नति के रक्षकों के लिए नमस्कार हो। (इषुभ्यः) = उन्नति की प्रेरणा देनेवालों के लिए (नमः) नमस्कार हो। (एभ्य:) = इन सबके लिए हमारा नमस्कार अस्तु हो। (य:) = जो अकेला (अस्मान् द्वेष्टि) = हम सबके साथ द्वेष करता है और (यम्) = जिससे (वयम्) = हम सब (द्विष्मः) = प्रीति नहीं करते (तम्) = उस समाज-द्वेषी को (व:) = आपके (जम्भे) = न्याय के जबड़े में (दध्मः) = स्थापित करते हैं। स्वयं दण्ड देने की अपेक्षा यही उचित है कि उसे अधिकारियों को सौंप दिया जाए। स्वयं दण्ड देने से तो अव्यवस्था ही बढ़ेगी।

    भावार्थ

    हम 'प्राची दिक्' का ध्यान करते हुए आगे बढ़ें। इस दिशा के अधिपति 'अग्नि' बनें। विषयों से अबद्ध होकर आगे बढ़ते चले जाएँ। सूर्य से आगे बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त करें। इन सब अग्नि आदि के लिए आदर का भाव रखें। जो द्वेष करे, उसे उन्हें सौंप दें, जिससे वे उसे उचित दण्ड आदि की व्यवस्था से द्वेषरहित करें।

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    भाषार्थ

    (प्राची दिक्) पूर्व की दिशा है, (अग्नि: अधिपति) अग्नि अधिपति है। (असितः) यह सीमाबद्ध नहीं, (रक्षिता) रक्षण करता है, (आदित्य) आदित्य की रश्मियाँ (इषवः) इषुरूप हैं। (तेभ्यः) उन के प्रति (नमः) हमारा प्रह्णीभाव हो, (अधिपतिभ्यः नमः) उन अधिपतियों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (रक्षितृभ्यः नमः ) उन रक्षकों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (इषुभ्यः नमः) इषुरुप उनके प्रति प्रह्णीभाव हो, (एभ्यः) इन सबके प्रति (नमः) प्रह्णीभाव (अस्तु) हो। (यः) जो (अस्मान् द्वेष्टि) हमारे साथ द्वेष करता है, (यम् वयम् द्विष्मः) और जिसके साथ प्रतिक्रियारूप हम द्वेष करते हैं (तम्) उसे (व: जम्भे) तुम्हारी दाढ़ में (दध्मः) हम स्थापित करते हैं।

    टिप्पणी

    [अभिप्राय है द्वेष्टा को आदित्य रश्मियों के प्रति सुपुर्द करते हैं। यन्त्र द्वारा आदित्य रश्मियों को एकत्रित कर उन द्वारा उसे जला देते हैं। नमः=णम प्रह्वत्वे शब्दे च। प्रह्णीभाव है उनके प्रति झुकना, उन्हें सर्वोपरि शक्ति मानकर उनका प्रयोग करना।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Protective ircle of Divine Powers

    Meaning

    Agni, lord of light and omniscience, is the ruling lord and guardian spirit upfront of the eastern quarter, protecting us against darkness, evil and ignorance, his arrows, protective powers, being sun-rays and the Aditya pranas. Honour and adoration to all of them! Worship and prayers to the ruling lord, salutations to the protective powers, honour and admiration to the arrows, praise and admiration for all these. O lord, whoever bears hate and jealousy toward us, or whoever we hate and reject, all that we deliver unto your divine justice.

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    Subject

    Regions : lords,defenders and arrows

    Translation

    Northern region Agni(fire) is its Lord, ‘Asitah is its defender, Adityah the arrows, our homage to them; homage to the Lords, homage to defenders, homage to the arrows, homage to all of them. Him who hates us and whom we do hate, we commit to your jaws.

    Comments / Notes

    Hymn / Sookta 3.27
    Regions Adhipati(Regent) Warder Arrow
    East Agni Asit Aditya
    South Indra Tirašcirājī Pitr
    West Varuna Prdākū Anna
    North Soma Svajah Ašani
    Nadir Visņu Kalmāgagrīva Vīrudha
    Zenith Brhaspati Savity Varga

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    Translation

    The self-refulgent God is the Lord of the east, His unfettered powers are His protection for us, the Vital airs are His Arrows, we pay our compliment to His arrows, we pay our compliment to Lord Paramount, we Pay our compliment to His unfettered protective powers, we pay our compliment to His arrows, whoso-ever ignorantly envies us and whomsoever we ignorantly envy. We place Him in the Jaws of His arrows, the vital airs,

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    Translation

    A Commander, expert in the science of fiery instruments is regent of the East, its warder is a man of independent nature, free from-shackles, men of glory, knowledge, eloquence, self-respect are its arrows. Worship to these the regents, these the warders, and to the arrows. Yea, to these all be worship. Within your jaws of justice we lay the man who hateth us and whom we dislike.

    Footnote

    One should not hate another person. None should take the law into his own hands. One who deserves punishment for his misdeeds should be handed over to the justice-loving people for punishment. East is spoken of as the abode of martial independent and learned persons. East is symbolic of progress, advancement. Sun rises in the East and advances by and by. Your refers to the regent, warders and learned, eloquent persons, who have figuratively been spoken of as arrows or instruments to be used for advancement.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−प्राची। प्राच्याम्। सू० २६ मा० १। इत्यत्रोक्तप्रकारेण रूपसिद्धिः। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तिलोपः। प्राच्याः। पूर्वायाः। अभिमुखीभूतायाः (दिक्) विभक्तिलोपः। दिशः (अग्निः) अग्निविद्यायां कुशलः पुरुषः (अधिपतिः) अधिष्ठाता। स्वामी (असितः) अ० १।२३।३। अबद्धः। कृष्णवर्णः सर्पः-इति सायणः। कृष्णसर्पवत् सेनाव्यूहः (रक्षिता) रक्षकः (आदित्याः) अ० १।९।१। दित्यदित्यादित्य० पा० ४।१।५८। इति आदित्य-ण्य प्रत्ययः। आदित्यस्य सूर्यस्य सम्बन्धिनः। सूर्यविद्युदग्निप्रयोगेण सिद्धाः (इषवः) अ० १।१३।४। आयुधानि-इति सायणः। इषुरीषतेर्गतिकर्मणो वधकर्मणो वा-निरु० ९।१८। बाणाः। अस्त्रशस्त्राणि। इषुधारिणः। शूराः (तेभ्यः) दूरस्थेभ्यः। (नमः नमः) अतिशयेन सत्कारोऽन्नं वा। नमः=अन्नम्-निघ० २।८। (एभ्यः) समीपस्थेभ्यः (यः) दुष्टः। शत्रुः (द्वेष्टि) बाधते (द्विष्मः) बाधामहे (वः) युष्माकम्। शूराणाम् (जम्भे) जभि नाशे-घञ्। हनौ [Jaw] (दध्मः) धारयामः। अन्यत् सुगमम् ॥

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    हिंगलिश (1)

    Subject

    On our Front side प्राची दिशा – हमारे सम्मुख

    Word Meaning

    जीवन में प्रगति के लिए अग्रसर होने के लिए - आगे की दिशा में चलने के लिए ‘अग्नि’ का स्वामित्व है. जो स्वतंत्र और आत्मनिर्भर है ,जिस के भौतिक और मानसिक स्वरूप ऊर्जा हैं . जिन को हमारे लक्ष्य पर पहुंचाने के साधन रूप बाण सूर्य की किरणें है वे भौतिक ऊर्जा और प्रकाश द्वारा हमारे शरीर और मन दोनों को जीवन में सब परिस्थितियों का अवलोकन करके पूरे उत्साह से अपने लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देते हैं प्राची पूर्व की दिशा में सूर्याग्नि अधिपति स्वामी है, जो स्वतंत्र हैं और सीमा बद्ध नहीं हैं . इन की रश्मियां (पृथ्वी पर आने वाले ) बाण स्वरूप हैं जो( भिन्न भिन्न प्रकार से) हमारी रक्षा करते हैं. इस सूर्य देवता को हम नमन करते हैं. उस के इन रक्षक बाणों के प्रति हम नमन करते हैं | और जो हम से द्वेष करने वाले (तमप्रिय) रोगादि शत्रु हैं उन्हें ईश्वरीय न्याय पर छोड़ते हैं. For making progress in this world, one has to move forward. For making progress energy is the enabling force. Energy independently manifests itself as a physical resource as well as positively motivated drive for us to make progress and move in forward direction in life. For this energy the solar radiations not only show us by lighting our path literally by removing darkness physically, but also instill positive thoughts to motivate us in forward direction. Sun in the East as an infinite and independent source through solar radiations directed like missiles provides the trigger to arise from restful slumber of the night to set about our activities in life afresh with dawn of a new day. Sun also blesses us with energy and protection to us (in many forms known as photobiology in science. Sun protects our health by providing hormone vitamin D, Sun by photosynthesis is provider of nutrition through plants, and a natural sterilizer of environments.) We are forever grateful to Sun for these bounties and leave those who do not follow the laws of nature and are our enemies such as sloth and pathogens at His disposal to deal with.

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