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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 107 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 107/ मन्त्र 3
    ऋषिः - शन्ताति देवता - विश्वजित् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - विश्वजित् सूक्त
    38

    विश्व॑जित्कल्या॒ण्यै मा॒ परि॑ देहि। कल्या॑णि द्वि॒पाच्च॒ सर्वं॑ नो॒ रक्ष॒ चतु॑ष्पा॒द्यच्च॑ नः॒ स्वम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    विश्व॑ऽजित् । क॒ल्या॒ण्यै᳡। मा॒ । परि॑ । दे॒हि॒ । कल्या॑णि । द्वि॒ऽपात् । च॒ । सर्व॑म् । न॒: । रक्ष॑ । चतु॑:ऽपात् । यत् । च॒ । न॒: । स्वम् ॥१०७.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    विश्वजित्कल्याण्यै मा परि देहि। कल्याणि द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद्यच्च नः स्वम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    विश्वऽजित् । कल्याण्यै। मा । परि । देहि । कल्याणि । द्विऽपात् । च । सर्वम् । न: । रक्ष । चतु:ऽपात् । यत् । च । न: । स्वम् ॥१०७.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 107; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सब सुख की प्राप्ति के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (विश्वजित्) हे संसार के जीतनेवाले परमेश्वर ! (कल्याण्यै) कल्याणी, मङ्गल करनेवाली [शाला अथवा ओषधि विशेष] को (मा) मुझे (परिदेहि) सौंप। (कल्याणि) हे कल्याणि (नः) हमारे (सर्वम्) सब.... म० १ ॥३॥

    भावार्थ

    मन्त्र एक तथा दो के समान ॥३॥ (कल्याणी) ओषधि विशेष भी है, जिसका नाम मासपर्णी है ॥

    टिप्पणी

    ३−(कल्याण्यै) कल्यं शुभम् अण्यते शब्द्यते। अकर्तरि च कारके०। [पा० ३।३।१९। कल+अण शब्दे जीवने च−घञ्, ङीप्। हे मङ्गलकारिणि शाले मासपर्णि वा। अन्यद्गतम् ॥

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    विषय

    कल्याण्यै

    पदार्थ

    १. (विश्वजित्) = संसार के विजेता हे प्रभो! आप (मा) = मुझे (कल्याण्यै) = शुभों की साधिका याग आदि क्रिया के लिए (परिदेहि) = अर्पित कीजिए। आपकी प्रेरणा से सुरक्षित घर में मैं यज्ञादि करनेवाला बनूं। २. हे (कल्याणि) = शुभ-साधिके यज्ञादि क्रिये! तू (नः) = हमारे (सर्वम्) = सब द्विपात् दोपाये मनुष्यादि को (च) = तथा (चतुष्पात्) = गवादि पशुओं को (रक्ष) = रक्षित कर, (च) = तथा (यत् नः स्वम्) = जो हमारा धन है, उसे भी रक्षित कर।

    भावार्थ

    प्रभु हमें याज्ञादि शुभ-साधिका क्रियाओं में प्रवृत्त करें। इन क्रियाओं को करते हुए हम सभी प्रकार से सुरक्षित हों।

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    भाषार्थ

    (विश्वजित्) हे विश्वविजयी परमेश्वर! (कल्याण्यै) निज कल्याणी शक्ति के प्रति (मा) मुझे (परिदेहि) प्रदान कर, सुपुर्द कर, समर्पित कर। (कल्याणि) हे परमेश्वरीय कल्याणी शक्ति (शेष पूर्ववत्, मन्त्र १)

    टिप्पणी

    [त्रायमाणा शक्ति द्वारा पालित हो कर प्रार्थी, परमेश्वर की कल्याणकारिणी शक्ति का प्रार्थी है। पालित होकर प्रार्थी कल्याण मार्ग पर ही चलने का अभिलाषी है। मन्त्र में यह भी दर्शाया है कि कल्याण मार्ग और गृहस्थ जीवन में विरोध नहीं। सन्तानों, पशुओं तथा धन सम्पत की प्राप्ति में भी व्यक्ति कल्याण मार्गी हो सकता है। शेष पूर्ववत् मन्त्र (१)।]

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    विषय

    विश्वविजयिनी राजशक्ति का वर्णन।

    भावार्थ

    हे (विश्वजित्) सर्वविजयी राजन् ! (मा) मुझे (कल्याण्यै परि देहि) देश की कल्याणकारिणी परिषद् के आधीन रख। हे (कल्याणि) कल्याणकारिणि परिषद् ! (द्विपात् चतुष्पात् च) दोपाये और चोपाये (यत् च नः सर्वम् स्वम्) और जो भी हमारा सब धन है उसकी (रक्ष) रक्षा कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शंतातिर्ऋषिः। विश्वजित् देवता। अनुष्टुभः। चतुर्ऋचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Of Safety and Security

    Meaning

    O Vishvajit, spirit of divine courage and victory at heart, dedicate me to the divine spirit of good and universal service and welfare. O spirit of good, universal service and welfare, protect and promote all our people, all our animals, and all that is our wealth, power and excellence in the world.

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    Translation

    O conqueror of all, entrust me to the virtuous power. O virtuous power, may you protect all bipeds, and quadrupeds which are our wealth.

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    Translation

    Let this Vishvajit hand over me to Kalyani, the medicinal herb known as Glycine Debitis or welfare state and let this Kalyani protect all our bipeds and quadrupeds and whatever is thrown as our own vitality.

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    Translation

    O All-conquering God, entrust me to Thy benevolent power. O benevolent power of God, guard all our men, guard all our quadrupeds, and our wealth!

    Footnote

    कल्याणी is also the name of a medicine, which is called मासपर्णी.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(कल्याण्यै) कल्यं शुभम् अण्यते शब्द्यते। अकर्तरि च कारके०। [पा० ३।३।१९। कल+अण शब्दे जीवने च−घञ्, ङीप्। हे मङ्गलकारिणि शाले मासपर्णि वा। अन्यद्गतम् ॥

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