अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 118 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 118/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कौशिक देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - आनृण्य सूक्त
    पदार्थ -

    (यत्) यदि (अक्षाणाम्) इन्द्रियों के (गत्नुम्) पाने योग्य विषय के (उपलिप्समानाः) लाभ की इच्छा करते हुए हमने (हस्ताभ्याम्) दोनों हाथों से (किल्बिषाणि) अनेक पाप (चकृम) किये हैं। (उग्रंपश्ये) तीव्र दृष्टि वाली, (उग्रजितौ) उग्र होकर जीतनेवाली, (अप्सरसौ) अन्तरिक्ष में विचरनेवाली अप्सरायें सूर्य भूमि दोनों (अद्य) आज (नः) हमारे (तत्) उस (ऋणम्) ऋण को (अनु) अनुग्रह करके (दत्ताम्) दे देवें ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य इन्द्रियों को वश में करके सूर्य और पृथिवी अर्थात् संसार के सब पदार्थों से विज्ञानपूर्वक उपकार लेकर अपना कर्त्तव्य करें ॥१॥

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