अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 126/ मन्त्र 3
ऋषिः - अथर्वा
देवता - दुन्दुभिः
छन्दः - पुरोबृहती विराड्गर्भा त्रिष्टुप्
सूक्तम् - दुन्दुभि सूक्त
44
प्रामूं ज॑या॒भी॒मे ज॑यन्तु केतु॒मद्दु॑न्दु॒भिर्वा॑वदीतु। समश्व॑पर्णाः पतन्तु नो॒ नरो॒ऽस्माक॑मिन्द्र र॒थिनो॑ जयन्तु ॥
स्वर सहित पद पाठप्र । अ॒मूम् । ज॒य॒ । अ॒भि । इ॒मे । ज॒य॒न्तु॒ । के॒तु॒ऽमत् । दु॒न्दु॒भि: । वा॒व॒दी॒तु॒। सम् । अश्व॑ऽपर्णा: । प॒त॒न्तु॒ । न॒: । नर॑: ।अ॒स्माक॑म् । इ॒न्द्र॒ । र॒थिन॑:। ज॒य॒न्तु॒ ॥१२६.३॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रामूं जयाभीमे जयन्तु केतुमद्दुन्दुभिर्वावदीतु। समश्वपर्णाः पतन्तु नो नरोऽस्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु ॥
स्वर रहित पद पाठप्र । अमूम् । जय । अभि । इमे । जयन्तु । केतुऽमत् । दुन्दुभि: । वावदीतु। सम् । अश्वऽपर्णा: । पतन्तु । न: । नर: ।अस्माकम् । इन्द्र । रथिन:। जयन्तु ॥१२६.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राजा और सेना के कर्तव्यों का उपदेश।
पदार्थ
(अमूम्) उस [शत्रुसेना] को (प्र) अच्छे प्रकार (जय) जीत ले, (इमे) यह (केतुमत्) ध्वजा पताकावाले शूर (अभि) सब ओर से (जयन्तु) जीत लेवें, (दुन्दुभिः) ढोल (वावदीति) ऊँचे स्वर से बजता है। (अश्वपर्णाः) घुड़चढ़ों के पक्ष [सेना दल]वाले (नः) हमारे (नरः) नायक लोग (सम्) ठीक रीति से (पतन्तु) धावा करें, (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले राजन् ! (अस्माकम्) हमारे (रथिनः) अच्छे-अच्छे रथों पर चढ़े हुए वीर (जयन्तु) जीतें ॥३॥
भावार्थ
राजा अपने शूर वीरों से दुन्दुभि बजा कर घुड़चढ़े सैन्यकों का दल बना कर शत्रुओं पर धावा करके जीत लेवे ॥३॥
टिप्पणी
३−(प्र) प्रकर्षेण (अमूम्) शत्रुसेनाम् (अभि) सर्वतः (जयन्तु) (केतुमत्) विभक्तेर्लुक्। प्रशस्तध्वजयुक्ताः शूराः (वावदीति) भृशं वदति (सम्) सम्यक् (अश्वपर्णाः) अश्वानामश्ववाराणां पर्णाः पक्षाः पार्श्वा येषां ते (पतन्तु) धावन्तु (नः) अस्माकम् (नरः) नायकाः (अस्माकम्) (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् सेनापते (रथिनः) प्रशस्तरथारूढाः शूराः (जयन्तु) ॥
विषय
शत्रु-पराजय-स्वकीय विजय
पदार्थ
१. हे (इन्द्र) = बल के कार्यों को करनेवाले सेनापते! (अमूम्) = उस दूर दृश्यमान सेना को (जय) = जीत । (इमे) = ये हमारे सैनिक (अभिजयन्तु) = शत्रुओं के अभिमुख जाते हुए जय को प्राप्त हों। (केतुमत् दुन्दुभिः वावदीतु) =[प्रज्ञानवत् उच्चस्तराम्] यह दुन्दुभिः खूब ऊँचे शब्द करे। (नः नरः) = हमारे सेनानायक (अश्वपर्णा:) = [अश्वपतनाः] अश्वारूढ़ होते हुए (सम्पतन्तु) = युद्धभूमि में इधर-उधर जाएँ। हे इन्द्र-शत्रुविद्रावक प्रभो! (अस्माकं रथिन:) = हमारे रथारोही (जयन्तु) = विजयी हों।
भावार्थ
यह उच्चस्वर से बजाई जाती हुई रणभेरी शत्रुओं को परास्त करती है और हमें विजयी बनाती है। हमारे घुड़सवार शत्रु-सैन्य में इधर-उधर विचरें तथा हमारे रथी विजयी हों।
विशेष
अगले सूक्त में 'उचित जीवन-मार्ग पर चलने से मनुष्य शत्रुओं को भून डालता है', अत: 'भृगु' कहलाता है, अङ्ग-प्रत्यङ्ग में रसवाला यह 'अङ्गिराः' है।
भाषार्थ
(अमूम्) उस शत्रुसेना को (इन्द्र) हे सम्राट् (प्रजय) जीत, (इमे) ये हमारे सैनिक (अभि) अभिमुख हुई शत्रुसेना को (जयन्तु) जीत लें। इस विजय को (केतुमत्) झण्डों समेत (दुन्दुभिः) सैन्यढोल (वावदोतु) बार-बार उद्घोषित करे (नः) हमारे (नरः) घुड़सवार नर (अश्वपर्णाः) अश्वरूपी अङ्गों वाले हुए, (सम् पतन्तु) युगपत् शत्रु सेना पर पतन करें, धावा करें, और (अस्माकम्) हमारे (रथिनः) रथारोही सैनिक भी (जयन्तु) विजय प्राप्त करें।
टिप्पणी
[अश्वपर्णाः= अश्वरूपी पंखों वाले। अश्वारोही सैनिकों को पक्षिरूप कहा है, अश्व मानों उनके पङ्ख हैं। वे मानों वेग से उड़कर शत्रुसेना पर सम्पात करें, मिलकर धावा करें, आक्रमण करें। वावदोतु= वद् + यङ्लुकि+ लोट् लकार। (विशेष वक्तव्य) सूक्त १२५ में रथ का, और सूक्त १२६ में दुन्दुभि का वर्णन कवितामय शब्दों में हुआ है। इन दोनों का सम्बन्ध राजा के साथ है। ये दोनों युद्ध के उपकरण है, साधन हैं। "राजसंयोत् युद्धोपकरणानि। तेषां रथः प्रथमागामी भवति" (निरुक्त ९।२।११)। रथ के पश्चात् निरुक्त में दुन्दुभिः, इषुधिः आदि युद्धोपकरणों का वर्णन हुआ है। एतदनुसार सूक्त १२५, १२६ में "वनस्पते, आस्थाता, इन्द्रस्य, मरुताम्, मित्रस्य, वरुणस्य, इन्द्रेण", आदि पदों के अर्थ राजसम्बन्धी किये हैं। सूक्त १२५, मन्त्र ३ में मित्रस्य का अर्थ "मित्र राजा" किया है, "An ally, The next neighbour of a King (आप्टे)।]
विषय
युद्धोपकरण दुन्दुभि, राजा और परमात्मा।
भावार्थ
हे इन्द्र ! राजन् ! (अमूम्) उस दूर देख पड़ने वाली शत्रु सेना को (प्र जय) उत्तम रीति से विजय कर (अभि इमे जयन्तु) और ये हमारे वीर भट विजय प्राप्त करें। यह (दुन्दुभिः) नक्कारा (केतुमत्) झण्डे वाला (वावदीतु) खूब शब्द करे। (नः नरः) हमारे वीर नेता सैनिक (अश्व-पर्णाः) घोड़े सहित दौड़ते हुए (संपतन्तु) एक साथ आक्रमण करें। और हे इन्द्र ! राजन् ! (अस्माकम् रथिनः) हमारे रथी, सवार लोग (जयन्तु) विजय करें। अध्यात्म में—हे पुरुष ! (अमूम्) उस दुर्वासना को (प्रजय) खूब जीत। (इमे अभि जयन्तु) ये तेरे इन्द्रियगण सब व्यसनों पर विजय प्राप्त करें। (केतुमत् दुन्दुभिर्वावदीतु) ज्ञानवान् गुरु तुझे उपदेश करे (नः नरः, संपतन्तु) हमारे नेता इन्द्रियगण अश्व=प्राण से वेगवान् होकर पदार्थों तक पहुँचे और वे ही (रथिनः) देह रूप रथ में चढ़ कर या प्राणरूप या रसरूप रथ में विराज कर विजयी हों। केनोपनिषद् की ब्रह्मविजय की कथा का यहां अवश्य परामर्श कर लेना उचित है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। वानस्पत्यो दुन्दुभिर्देवता। १, २ भुरिक् त्रिष्टुभौ, ३ पुरोबृहती विराड् गर्भा त्रिष्टुप्। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Clarion Call of the Brave
Meaning
Indra, mighty hero, rout and conquer those enemy forces. Let our forces win with flying colours. Let the drum resound, with the flag flying. United, our men on the wings of horse fall upon the enemy forces. Let our heroes of the chariot be ever victorious.
Translation
O resplendent Lord, the drum sounds repeatedly as a signal. May you recover the lost cattle of wisdom and bring it back here. Our leaders mounted (winged: with horses), as if, on speedy fly together. Let our car-borne fighting faculties against vice and nescience be triumphant. (Also Rg. VI.47.31)
Translation
Let this drum make the thing conquer those yonder and let these men of our army be victorious raising their flags, let the drum speak aloud as the signal of battle, let our men mounting on horses fly together and let our charioteers celebrate triumph, O mighty King !
Translation
O Commander, conquer the yonder troops of the enemy. May our heroes be victorious, Let the war drum beat loudly with the furling of the flag. Let our cavalry march forth. Let our car-warriors be triumphant!
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(प्र) प्रकर्षेण (अमूम्) शत्रुसेनाम् (अभि) सर्वतः (जयन्तु) (केतुमत्) विभक्तेर्लुक्। प्रशस्तध्वजयुक्ताः शूराः (वावदीति) भृशं वदति (सम्) सम्यक् (अश्वपर्णाः) अश्वानामश्ववाराणां पर्णाः पक्षाः पार्श्वा येषां ते (पतन्तु) धावन्तु (नः) अस्माकम् (नरः) नायकाः (अस्माकम्) (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् सेनापते (रथिनः) प्रशस्तरथारूढाः शूराः (जयन्तु) ॥
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