अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 128/ मन्त्र 3
ऋषिः - अथर्वाङ्गिरा
देवता - सोमः, शकधूमः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - राजा सूक्त
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अ॑होरा॒त्राभ्यां॒ नक्ष॑त्रेभ्यः सूर्याचन्द्र॒मसा॑भ्याम्। भ॑द्रा॒हम॒स्मभ्यं॑ राज॒ञ्छक॑धूम॒ त्वं कृ॑धि ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒हो॒रा॒त्राभ्या॑म् । नक्ष॑त्रेभ्य: । सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसा॑भ्याम् । भ॒द्र॒ऽअ॒हम् । अ॒स्मभ्य॑म् । रा॒ज॒न् । शक॑ऽधूम । त्वम् । कृ॒धि॒ ॥१२८.३॥
स्वर रहित मन्त्र
अहोरात्राभ्यां नक्षत्रेभ्यः सूर्याचन्द्रमसाभ्याम्। भद्राहमस्मभ्यं राजञ्छकधूम त्वं कृधि ॥
स्वर रहित पद पाठअहोरात्राभ्याम् । नक्षत्रेभ्य: । सूर्याचन्द्रमसाभ्याम् । भद्रऽअहम् । अस्मभ्यम् । राजन् । शकऽधूम । त्वम् । कृधि ॥१२८.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
आनन्द पाने का उपदेश।
पदार्थ
(शकधूम) हे समर्थ सूर्य आदि लोकों के कँपानेवाले (राजन्) परमेश्वर ! (त्वम्) तू (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (अहोरात्राभ्याम्) दिन और रात्रि से, (नक्षत्रेभ्यः) नक्षत्रों से और (सूर्याचन्द्रमसाभ्याम्) सूर्य और चन्द्रमा से (भद्राहम्) शुभ दिन (कृधि) कर ॥३॥
भावार्थ
मनुष्य सब काल में, सब स्थान में, सब पदार्थों से उपकार लेकर परमेश्वर की महिमा विचारते हुए सदा सुखी रहें ॥३॥
टिप्पणी
३−(अहोरात्राभ्याम्) अहःसर्वैकदेश०। पा० ५।४।८७। इत्यकारः समासान्तः। अहश्च रात्रिश्च ताभ्यां सकाशात् (नक्षत्रेभ्यः) अश्विन्यादिभ्यः (सूर्याचन्द्रमसाभ्याम्) अकारश्छान्दसः समासान्तः। सूर्यचन्द्राभ्याम् (भद्राहम्) शुभदिनम् (अस्मभ्यम्) अस्मदर्थम् (राजन्) शासितः (शकधूम) म० १। समर्थानां सूर्यादिलोकानां कम्पक (त्वम्) (कृधि) कुरु ॥
विषय
'आधिदैविक आपत्ति' निराकरण
पदार्थ
१. हे (शकधूम राजन्) = शक्ति के द्वारा शत्रुओं को कम्पित करनेवाले राजन् ! (त्वम्) = आप (अहोरात्राभ्याम) = दिन और रात से (नक्षत्रेभ्यः) = अश्विनी-भरणी आदि नक्षत्रों से तथा (सूर्याचन्द्रमसा भ्याम्) = सूर्य और चन्द्रमा से (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (भद्राहं कृधि) = पुण्याह [पुण्य-दिन] को करने की कृपा करें।
भावार्थ
राष्ट्रव्यवस्था के उत्तम होने पर 'दिन-रात, सूर्य-चन्द्र व नक्षत्र' सब प्रजा के लिए कल्याणकारक होते हैं, अर्थात् सुव्यवस्थित राष्ट्र में आधिदैविक आपत्तियों नहीं आती।
भाषार्थ
(शकधूम राजन्) हे राजा रूप शक्तिशाली धूम ! (प अहोरात्राभ्याम्) दिन और रात से (नक्षत्रेभ्यः) नक्षत्रों से, (सूर्याचन्द्रमसाभ्याम्) और चन्द्रमा से (त्वम्) तू (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (भद्राहम्) भद्रदिन (कृधि) कर१।
टिप्पणी
[अस्मभ्यम्= हम राष्ट्रजनों के लिये (मन्त्र १)। योगाभ्यासी में शकधूम के प्रकट हो जाने पर राष्ट्र के जनों के लिये प्राकृतिक शक्तियां सुख दायक हो जाती है।२] [१. अथवा "प्रतिदिन-रात आध्यात्मिक खद्योतों से, आध्यात्मिक सूर्य-चन्द्रमा से सुखदायक तथा कल्याणकारी दिन, हे शकधूम ! तू हमारे लिये कर। आध्यात्मिक खद्योत है जभ्यास में चमकते तारागण, आध्यात्मिक सूर्य है अर्क, और आध्यात्मिक चन्द्रमा है शशी" (श्वेता उप० २।११)। २. पूर्णयोगी को प्राकृतिक शक्तियों पर प्रभुत्व प्राप्त हो जाता है। वह राष्ट्र के लिये प्राकृतिक शक्तियों द्वारा सुख प्रदान करा सकता है (योग ३।४४;४८,४९)।]
विषय
राजा का राज्यारोहण।
भावार्थ
हे (शकधूम) अपनी शक्ति से सब शत्रु को कंपाने हारे राजन् ! (त्वं) तू (अहोरात्राभ्याम्) दिन, रात (नक्षत्रेभ्यः) समस्त नक्षत्रों और (सूर्याचन्द्रमसाभ्याम्) सूर्य और चन्द्रमा द्वारा (अस्मभ्यं) हमारे लिये (भद्राहम् कृधि) कल्याण और सुखकारी दिन को नियत कर। अर्थात् शुभ अवसर दे जिसमें दिन रात सूर्य और चांद भी चमकें, नक्षत्र भी खिलें और प्रजाएं आनन्दित हों।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वाङ्गिरा ऋषिः। नक्षत्राणि राजा चन्द्रः सोमः शकधूमश्च देवताः। १-३ अनुष्टुभः। चतुर्ऋचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Ruler’s Election
Meaning
O Ruler, mighty star among planets, make the day auspicious for us by day and night, by the planets and by the sun and moon.
Translation
O shining cow-dung-smoke (saka dhuma), may you make a good day for day and night, for constellations, for sun and moon, and good day for us.
Translation
Let there be fair and favorable weather to the day and night, to the stars and sun and moon. O Shakdhuma Rajan! (the King who is dreadful for enemies) you make fair, fine and favorable weather for us in the Kingdom.
Translation
Fair weather to the day and night, and to the stars and sun and moon, give favorable weather unto us, thou king, who makes all quake with his might.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(अहोरात्राभ्याम्) अहःसर्वैकदेश०। पा० ५।४।८७। इत्यकारः समासान्तः। अहश्च रात्रिश्च ताभ्यां सकाशात् (नक्षत्रेभ्यः) अश्विन्यादिभ्यः (सूर्याचन्द्रमसाभ्याम्) अकारश्छान्दसः समासान्तः। सूर्यचन्द्राभ्याम् (भद्राहम्) शुभदिनम् (अस्मभ्यम्) अस्मदर्थम् (राजन्) शासितः (शकधूम) म० १। समर्थानां सूर्यादिलोकानां कम्पक (त्वम्) (कृधि) कुरु ॥
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