अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 130/ मन्त्र 2
अ॒सौ मे॑ स्मरता॒दिति॑ प्रि॒यो मे॑ स्मरता॒दिति॑। देवाः॒ प्र हि॑णुत स्म॒रम॒सौ मामनु॑ शोचतु ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒सौ । मे॒ ।स्म॒र॒ता॒त् । इति॑ । प्रि॒य: । मे॒ । स्म॒र॒ता॒त् । इति॑ । देवा॑: । प्र । हि॒णु॒त॒ । स्म॒रम् । अ॒सौ । माम् । अनु॑ । शो॒च॒तु॒ ॥१३०.२॥
स्वर रहित मन्त्र
असौ मे स्मरतादिति प्रियो मे स्मरतादिति। देवाः प्र हिणुत स्मरमसौ मामनु शोचतु ॥
स्वर रहित पद पाठअसौ । मे ।स्मरतात् । इति । प्रिय: । मे । स्मरतात् । इति । देवा: । प्र । हिणुत । स्मरम् । असौ । माम् । अनु । शोचतु ॥१३०.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
स्मरण सामर्थ्य बढ़ाने का उपदेश।
पदार्थ
(असौ) वह [स्मरण सामर्थ्य] (मे) मेरा (स्मरतात्) स्मरण रक्खे, (इति) बस यही, (प्रियः) वह प्यारा [सामर्थ्य] (मे) मेरा (स्मरतात्) चिन्तन करे, (इति) बस यही। (देवाः) हे विद्वानो ! (स्मरम्) उस स्मरण सामर्थ्य को... म० १ ॥२॥
भावार्थ
जो मनुष्य विद्याओं को स्मरण रख कर उपयोग करते हैं, वे ही संसार में प्रिय होते हैं ॥२॥
टिप्पणी
२−(असौ) स्मरः (मे) अधीगर्थदयेशां कर्मणि। पा० २।३।५२। इति षष्ठी। मम (स्मरतात्) स्मृ लोटि तातङ्। स्मरतु (इति) वाक्यसमाप्तौ (प्रियः) हितकरः। अन्यद्गतम् ॥
विषय
कामवासना की उत्पत्ति कहाँ
पदार्थ
१. (रथजिताम्) = रमण के साधनभूत पदार्थों का विजय [संग्रह] करनेवाले पुरुषों का तथा (राथजितेयीनाम्) = रमण-साधन पदार्थों को जीतनेवाले पुरुषों की (अप्सरसाम्) = इन सुन्दर स्त्रियों का अर्थ (अयं स्मर:) = यह 'काम' है। काम-वासना का सम्बन्ध इन रथजितों व राथजितेयी अप्सराओं से ही है। 'रमणसाधन पदार्थों का संग्रह व शारीरिक सौन्दर्य'काम-वासना की उत्पत्ति के साधन बनते हैं। २. हे (देवा:) = देवो! (स्मरम्) = इस 'काम' को (प्रहिणुत) = मुझसे दूर ही भेजो, (असौ माम् अनुशोचतु) = यह काम मेरा शोक करता रहे कि 'किस प्रकार उस पुरुष के हृदय में मेरा निवास था और किस प्रकार मुझे वहाँ से निकलना पड़ गया। २. (असौ) = वह काम में (स्मरतात्) = मुझे स्मरण करता रहे (इति) = बस । मे (प्रियः) = मेरा बड़ा प्रिय था, इति (स्मरतात्) = इसप्रकार मेरा स्मरण करके दुखी होता रहे। २. हे देवो! आप ऐसी कृपा करो कि (यथा) = जिससे (असौ मम स्मरतात्) = वह काम मेरा स्मरण करे, (अहं कदाचन अमुष्य न) = मैं कभी उसका स्मरण न करूँ। मुझसे वियोग के कारण 'काम' दुःखी हो। 'काम' से पृथक् होकर मैं दुःखी न हो।
भावार्थ
कामवासना की उत्पत्ति वहीं होती है, जहाँ रमणसाधन पदार्थों के संग्रह व सौन्दर्य की ओर झुकाव हो। देवों की कृपा से काम मुझसे दूर हो जाए। स्थान-भ्रंश के कारण 'काम' दुःखी हो। मैं कभी इस काम का स्मरण न करूँ।
भाषार्थ
(असौ) वह (मे) मुझे (स्मरतात् इति) स्मरण करे (प्रियः) मेरा प्रिय (मे) मुझे (स्मरतात् इति) स्मरण करे, (देवाः) हे दिव्य शक्तियों ! (स्मरम्) कामवासना को (प्रहिणुत) उसमें प्रेरित तथा प्रवृद्ध करो, (असौ) ताकि वह (माम् अनु) मेरा अनुस्मरण करके (शोचतु) शोकान्वित हो।
विषय
स्त्री पुरुषों का परस्पर प्रेम और स्मरण।
भावार्थ
(असौ) वह प्रियतमा स्त्री (मे) अपने मुझ प्रियतम पति का (स्मरतात्) स्मरण करे (इति) इस प्रकार पति निरन्तर अपनी स्त्री के विषय में चिन्तन करे और (मे प्रियः) मेरा प्रियतम पति (मे स्मरतात्) मेरा स्मरण करे (इति) इस प्रकार पत्नी निरन्तर अपने पति के विषय में चिन्तन करे। हे (देवाः) विद्वान् पुरुषो ! (स्मरं प्र हिणुत) स्त्री पुरुषों में इस प्रकार के परस्पर स्मरण कराने वाले प्रेम भाव को जागृत करो। जिससे (असौ) वह दूरदेशस्थ प्रेमी (माम्) मुझ प्रेमपात्र को (अनु शोचतु) वियोग में भी स्मरण करे और मेरे दुःख से दुःखी हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वाङ्गिरा ऋषिः। स्मरो देवता। २, ३ अनुष्टुभौ। १ विराट् पुरस्ताद बृहती। चतुर्ऋचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Divine Love and Memory
Meaning
May that cosmic omniscience remember me for my sake: this is all. Let the darling Divine remember me for my sake: this is all. O divinities of nature and brilliant sages, pray invoke and promote this divine knowledge, and may that divine mind enlighten and sanctify me.
Translation
So that may so and so (asau) remember me; so that my beloved remember me; O bounties of Nature, send forth the passionate love. Let so and so wail for me.
Translation
Let my wife remember me and she remember me—“Let my husband remember me". Let the physical forces working in the body and in the external world increase this sexual desire (in husband and wife) so that either of them may remember either.
Translation
May that power of recollection keep my knowledge in memory, may that lovely memory retain what I have learnt. O learned persons fully develop this power of remembrance. May this memory ever remain fresh and pure in me!
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(असौ) स्मरः (मे) अधीगर्थदयेशां कर्मणि। पा० २।३।५२। इति षष्ठी। मम (स्मरतात्) स्मृ लोटि तातङ्। स्मरतु (इति) वाक्यसमाप्तौ (प्रियः) हितकरः। अन्यद्गतम् ॥
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