अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 135/ मन्त्र 3
यद्गिरा॑मि॒ सं गिरा॑मि समु॒द्र इ॑व संगि॒रः। प्रा॒णान॒मुष्य॑ सं॒गीर्य॒ सं गि॑रामो अ॒मुं व॒यम् ॥
स्वर सहित पद पाठयत् । गिरा॑मि । सम् । गि॒रा॒मि॒ । स॒मु॒द्र:ऽइ॑व । स॒म्ऽगि॒र: । प्रा॒णान् । अ॒मुष्य॑ । स॒म्ऽगीर्य॑ । सम् । गि॒रा॒म॒: । अ॒मुम् । व॒यम् ॥१३५.३॥
स्वर रहित मन्त्र
यद्गिरामि सं गिरामि समुद्र इव संगिरः। प्राणानमुष्य संगीर्य सं गिरामो अमुं वयम् ॥
स्वर रहित पद पाठयत् । गिरामि । सम् । गिरामि । समुद्र:ऽइव । सम्ऽगिर: । प्राणान् । अमुष्य । सम्ऽगीर्य । सम् । गिराम: । अमुम् । वयम् ॥१३५.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
खान-पान का उपदेश।
पदार्थ
(यत्) जो कुछ वस्तु (गिरामि) मैं खाता हूँ, (सम्) यथाविधि (गिरामि) खाता हूँ, (इव) जैसे (संगिरः) यथाविधि खानेवाला (समुद्रः) समुद्र [खाकर पचा लेता है]। (अमुष्य) उस [पदार्थ] के (प्राणान्) जीवन शक्तियों को (संगीर्य) चबाकर (अमुम्) उस [पदार्थ] को (सम्) यथाविधि (वयम्) हम (गिरामः) खावें ॥३॥
भावार्थ
जो निरालसी मनुष्य विचारपूर्वक भोजन करके उसे पचाते हैं, वे बलवान् रहते हैं ॥३॥
टिप्पणी
३−(यत्) भोजनम् (गिरामि) गॄ निगरणे तुदादित्वात्−शः। ॠत इद्धातोः। पा० ७।१।१००। इत्वम्। भक्ष्यामि (सम्) सम्यक् (संगिरः) इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः। पा० ३।१।१३५। इति किरतेर्विधीयमानः कः प्रत्ययो गिरतेरपि। सम्यङ् निगरिता (संगीर्य्य) ॠत इत्वे। हलि च। पा० ८।२।७७। इति दीर्घः। यथाविधि भक्षयित्वा। अन्यत्पूर्ववत् ॥
विषय
सं-पान-संगरण
पदार्थ
१. (यत् पिबामि) = मैं जो जल पीता हूँ तो (संपिबामि) = शत्रु का निग्रह करके उसके रस को ही पी जाता है, उसी प्रकार (इव) = जैसेकि (समुद्रः) = समुद्र नदीमुख से सारे जल को लेकर (संपिबः) = सम्यक् पी जाता है। (वयम्) = हम भी (अमुष्य) = उस शत्रु के (प्राणान् संपाय) = प्राणापान आदि व्यापार को पीकर (अमुम्) = उस शत्रु को ही (संपिबाम:) = पी जाते हैं। २. (यत् गिरामि) = जो कुछ मैं खाता हूँ तो (संगिरामि) = शत्रु को ही निगल जाता हूँ। (इव) = जैसेकि (समुद्रः) = समुद्र (संगिरः) = नदी-जल को निगीर्ण कर लेता है। (वयम्) = हम भी (अमुष्य) = उस शत्रु के (प्रणान् संगीर्य) = प्राणों को निगलकर (अमुं संगिरामः) = उस शत्र को ही निगल जाते हैं।
भावार्थ
हम खाते-पीते इस दृष्टिकोण को न भूलें कि इस खान-पान से शक्ति का सम्पादन करके शत्रुओं को ही खा-पी जाना है, स्वाद का दृष्टिकोण तो हमें ही शत्रुओं का शिकार बना देगा।
विशेष
स्वस्थ शरीर के लिए वीतहव्य-पवित्र पदार्थों को खानेवाला ही होना चाहिए। यह 'वीतहव्य' शरीर को स्वस्थ बनाता हुआ अपने केशों को भी सुदृढ बनाता है। अगले दो सूक्तों का ऋषि यही है।
भाषार्थ
(यदु गिरामि) जो मैं निगलता हूं (सं गिरामि) सम्यक रूप में निगलता हूं, (समुद्र इव) समुद्र की तरह (सं गिरः) सम्यक् रूप में निगलता हूं, (अमुष्य) उस कामादि शत्रु के (प्राणान्) प्राणों को (सं गीर्य) सम्यक् रूप में निगल कर, (अमुम्) उसे भी (वयम्) हम (सं गिरामः) सम्यक् रूप में या मिलकर निगल जाते हैं।
टिप्पणी
[काम, क्रोध आदि शत्रु के प्राण हैं तत् सम्बंधी वासनाएं। वासनाओं के अभाव में तत्सम्बन्धी विषय स्वयमेव निवृत्त हो जाते हैं। मन्त्रों में अश्नामि, पिबामि, गिरामि द्वारा भोजन के खाने के प्रकारों का वर्णन हुआ है। "अश्नामि" खाना है चबाना, और "गिरामि" है गले द्वारा पेट में अन्न पहुंचाना, और इसके लिये "पिबामि" है जल पीना। कामादि को खाना, पीना, निगलना, निरुक्त प्रदर्शित 'पौरुषविधि" द्वारा उपपन्न होता है।]
विषय
वज्र द्वारा शत्रु नाश।
भावार्थ
(यद् गिरामि संगिरामि) जो कुछ मैं निगलूं उसको अच्छी प्रकार निगलुं। (संगिरः समुद्रः इव) ऐसा निगलूं जैसे समुद्र सब नदियों के जल को निगल जाता है। (अमुष्य प्राणान् संगीर्य) शत्रु के प्राणों या जीवन के साधनों को (संगीर्य) स्वयं निगल कर अर्थात् हड़प कर ही (वयं) हम (अमुं) उसको (सं गिरामः) हड़प सकते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शुक्र ऋषिः। मन्त्रोक्ता वज्रो देवता। अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥
मन्त्रार्थ
(यत्-गिरामि संगिरामि संगिरः समुद्रः-इव) जो मैं निगलता हूं उसे अन्दर पचाता हूं अङ्कीकार करता हूं सम्यक् निगरणशील समुद्र की भांति, जैसे समुद्र सारी नदियों को आत्मसात् करता है (अमुष्य प्राणान् सगीर्य) उस विरोधी शत्रु के प्राणों को यशवीर्यबलों को “प्राणो वै यशो वीर्यम्" (शत १०।६।४।६) सम्यक निगलने को (वयम् अमु संगिरामः) हम उस प्राणप्रद वायु को सम्यक् निगलते है- अङ्गीकार करते हैं ॥३॥
विशेष
ऋषिः-शुक्रः -(तेजस्वी "शुक्रं शोचतेर्ज्वलति कर्मण:) [ निरु० ८-१२] देवता-वज्रः- पाप से वर्जन कराने वाला आत्मपराक्रम [वीर्य एवं ओजः] "वीर्यं वै वज्र(शत० १।३।७।५ ) वज्रो वा ओजः [शत० ८।४।१।२७ ]
इंग्लिश (4)
Subject
Strength
Meaning
Whatever I swallow I swallow completely just like the sea which swallows and assimilates all the streams, and having consumed the vitality of the enemy, we exhaust him of his strength.
Translation
What swallow (girami), I swallow to the finish, swallow to the finish like ocean. Swallowing up the life of such and such person, may we swallow such and such person to the finish.
Translation
Whatever I swallow, I swallow it like the sea which swallows all. We swallowing the vitality of that man swallow him completely.
Translation
Whatever I devour, I devour well, just as the sea swallows completely the water of the streams. Swallowing that foe's vital breath, we swallow him completely up.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(यत्) भोजनम् (गिरामि) गॄ निगरणे तुदादित्वात्−शः। ॠत इद्धातोः। पा० ७।१।१००। इत्वम्। भक्ष्यामि (सम्) सम्यक् (संगिरः) इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः। पा० ३।१।१३५। इति किरतेर्विधीयमानः कः प्रत्ययो गिरतेरपि। सम्यङ् निगरिता (संगीर्य्य) ॠत इत्वे। हलि च। पा० ८।२।७७। इति दीर्घः। यथाविधि भक्षयित्वा। अन्यत्पूर्ववत् ॥
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