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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 29 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 29/ मन्त्र 1
    ऋषिः - भृगु देवता - यमः, निर्ऋतिः छन्दः - विराड्गायत्री सूक्तम् - अरिष्टक्षयण सूक्त
    106

    अ॒मून्हे॒तिः प॑त॒त्रिणी॒ न्येतु॒ यदुलू॑को॒ वद॑ति मो॒घमे॒तत्। यद्वा॑ क॒पोतः॑ प॒दम॒ग्नौ कृ॒णोति॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒मून् । हे॒ति: । प॒त॒त्रिणी॑ । नि । ए॒तु॒ । यत् । उलू॑क: । वद॑ति । मो॒घम् । ए॒तत् । यत् । वा॒ । क॒पोत॑: । प॒दम् । अ॒ग्नौ । कृ॒णोति॑ ॥२९.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अमून्हेतिः पतत्रिणी न्येतु यदुलूको वदति मोघमेतत्। यद्वा कपोतः पदमग्नौ कृणोति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अमून् । हेति: । पतत्रिणी । नि । एतु । यत् । उलूक: । वदति । मोघम् । एतत् । यत् । वा । कपोत: । पदम् । अग्नौ । कृणोति ॥२९.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 29; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (4)

    विषय

    शुभ गुण ग्रहण करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (पतत्रिणी) नीचे गिरनेवाली (हेतिः) चोट (अमून्) उन [शत्रुओं] को (नि) नीचे (एतु) ले जावे। (उलूकः) अज्ञान से ढकनेवाला उल्लू के समान मूर्ख पुरुष (यत्) जो कुछ (वदति) बोलता है, (एतत्) वह (मोघम्) निरर्थक होवे। (यत्) क्योंकि (कपोतः) स्तुति योग्य अथवा कबूतर के समान तीव्र बुद्धि पुरुष (अग्नौ) विद्वानों के समूह में (वा) निश्चय करके (पदम्) अधिकार (कृणोति) करता है ॥१॥

    भावार्थ

    जहाँ पर विद्वान् मनुष्य अधिकारी होते हैं, वहाँ पर मूर्ख शत्रुओं के वचन और कर्म निष्फल होते हैं ॥१॥ इस मन्त्र का दूसरा और तीसरा पाद ऋग्वेद में है−म० १०।१६५ ॥४॥

    टिप्पणी

    १−(अमून्) धर्माद् दूरे वर्तमानान् शत्रून् (हेतिः) हवनशक्तिः (पतत्रिणी) अधोगामिनी (नि) नीचैः (एतु) अन्तर्गतण्यर्थः। गमयतु (यत्) यत्किञ्चित् (उलूकः) उलूकादयश्च। उ० ४।४१। इति वल संवरणे, ऊक। अज्ञानेनाच्छादकघूकवद् मूर्खः शत्रुः (वदति) कथयति (मोघम्) मुह अविवेके−घञ्, कुत्वम्। अनर्थकम् (एतत्) वचनम् (यत्) यस्मात् (वा) अवधारणे (कपोतः) सू० २७।१। स्तुत्यः पुरुषः। यद्वा कपोतवत् तीव्रबुद्धिः (पदम्) अधिकारम् (अग्नौ) विद्वत्समूहे (कृणोति) करोति ॥

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    विषय

    उलूक:

    पदार्थ

    १. (पतत्रिणी) = पतन की कारणभूत (हेति:) = हनन [विनाश] करनेवाली यह लोभबृति (अमून) = हमसे दूरस्थ हमारे शत्रुओं को (नि एत) = निश्चय से प्राप्त हो। लोभवृति के शिकार हमारे शत्रु ही हों। हम इस लोभवृत्ति से बचे ही रहें। २. (यत्) = जब (उलूक:) = [उच समवाये] प्रभु से समवाय वाला-स्तवन द्वारा प्रभु से मेलवाला यह स्तोता (वदति) = प्रभु के नामों का उच्चारण करता है तब (एतत् मोषम्) = सब शत्रुओं का आक्रमण व्यर्थ होता है, (यत् वा) = अथवा जब (कपोत:)= आनन्द का पोत प्रभु (आग्नौ) = प्रगतिशील जीवन में (पदम् कृणोति) = पग रखता है, अर्थात् जब कपोत इस अग्नि को प्राप्त होता है। प्रभु की उपस्थिति में उपासक 'काम, क्रोध, लोभ' आदि से आक्रान्त नहीं होता।

    भावार्थ

    हम प्रभु से मेलवाले बनकर प्रभु के नामों का उच्चारण करें, तब वे आनन्द के पोत प्रभु हमारे हृदयों में आसीन होंगे और तब लोभ आदि शत्रुओं का हमपर आक्रमण न हो सकेगा।

     

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    भाषार्थ

    (पतत्रिणी) पंखों वाली पक्षिणी के सदृश अल्पकाय (हेतिः) अस्त्र रूप हमारा वायुयान, (अमुन्) उन [शत्रुओं की ओर ] (न्येतु ) नितरां जाय। (यत्) यह जो (उलूकः) उल्लू ( वदति) कहता है, (एतत् ) यह (मोघम् ) व्यर्थ है, अज्ञान विजृम्भित है। (यद् वा ) अथवा [ जो यह कहता है] कि (कपोतः) हमारा वायुयान (अग्नौ) युद्धाग्नि में ( पदम्, कृणोति) पैर पसार रहा है [यह भी व्यर्थ है] ।

    टिप्पणी

    [उलूक का अभिप्राय उल्लू-पक्षी नहीं, अपितु वह मनुष्य है जो कि इस प्रकार का कथन करता है। अज्ञानी और बेवकूफ को उल्लू कहते भी हैं। मोघम्=मुह वैचित्ये (दिवादिः) चितिशून्यता, संज्ञानराहित्य; चिती संज्ञाने (भ्वादिः)]।

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    विषय

    राजदूतों के व्यवहार

    भावार्थ

    (यत्*) जब (उलूकः) उल्लू के समान कुटिल गुप्त दूत (मोघम्) व्यर्थ बात (वदति) बोलता है (यद्वा) या जब (कपोतः) विद्वान् दूत भी (अग्नौ) अग्नि में, अग्नि के समान तेजस्वी राजा और (पदम् कृणोति) अपना अधिकार जमाना चाहता है तब (पतत्रिणी) पक्षों वाली (हेतिः) घातक सेना (अमून) उन शत्रुनों पर (नि-एतु) चढ़े।

    टिप्पणी

    *‘यदुलूको वदति मोघमेतद् यत्कपोतः पदमग्नौ कृणोति। यस्य दूतः प्रहित एष एतत्तस्मै यमाय नमोऽस्तु मृत्यवे’ इति ऋ०। कपोतो नैर्ऋत ऋषिः। कपोतोपहतौ वैश्वदेवं देवता इति ऋग्वेदे प्रजापतिरिति क्षेमकरणः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृगुर्ऋषिः। यमो निर्ऋतिश्च देवते। १-२ विराड् नामगायत्री। ३ त्र्यवसाना सप्तपदा विराडष्टिः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Response to Adversaries

    Meaning

    Let the flying missile fall upon those adversaries whose Uluka, bird-like messenger, vascillates and speaks all this that he speaks in vain, or when the Kapota, pigeonary clever messenger, puts his foot in the fire in the hall.

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    Subject

    Yamah: Nir-rti (Perdition)

    Translation

    On them yonder, may this winged weapon fall. What the owl (ulika) screeches, or the pigeon makes its track into the fire, may that be ineffective.

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    Translation

    When the owl screeches out in vain, or when the pigeon throws its foot in fire (without some apparent cause) the misery like the bird falls on the men in the region.

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    Translation

    May the onrushing, cruel army fall on the yonder foes. Whatever, a foolish person full of darkness like an owl says, is ineffective. A person farsighted and intelligent like a pigeon, establishes his authority in an assembly of the learned.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अमून्) धर्माद् दूरे वर्तमानान् शत्रून् (हेतिः) हवनशक्तिः (पतत्रिणी) अधोगामिनी (नि) नीचैः (एतु) अन्तर्गतण्यर्थः। गमयतु (यत्) यत्किञ्चित् (उलूकः) उलूकादयश्च। उ० ४।४१। इति वल संवरणे, ऊक। अज्ञानेनाच्छादकघूकवद् मूर्खः शत्रुः (वदति) कथयति (मोघम्) मुह अविवेके−घञ्, कुत्वम्। अनर्थकम् (एतत्) वचनम् (यत्) यस्मात् (वा) अवधारणे (कपोतः) सू० २७।१। स्तुत्यः पुरुषः। यद्वा कपोतवत् तीव्रबुद्धिः (पदम्) अधिकारम् (अग्नौ) विद्वत्समूहे (कृणोति) करोति ॥

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