Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 30 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 30/ मन्त्र 2
    ऋषि: - उपरिबभ्रव देवता - शमी छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - पापशमन सूक्त
    2

    यस्ते॒ मदो॑ऽवके॒शो वि॑के॒शो येना॑भि॒हस्यं॒ पुरु॑षं कृ॒णोषि॑। आ॒रात्त्वद॒न्या वना॑नि वृक्षि॒ त्वं श॑मि श॒तव॑ल्शा॒ वि रो॑ह ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य:। ते॒ । मद॑: । अ॒व॒ऽके॒श: । वि॒ऽके॒श: । येन॑ । अ॒भि॒ऽहस्य॑म् । पुरु॑षम् । कृ॒णोषि॑ । आ॒रात् । त्वत् । अ॒न्या । वना॑नि । वृ॒क्षि॒ । त्वम् । श॒मि॒ । श॒तऽव॑ल्शा । वि । रो॒ह॒ ॥३०.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यस्ते मदोऽवकेशो विकेशो येनाभिहस्यं पुरुषं कृणोषि। आरात्त्वदन्या वनानि वृक्षि त्वं शमि शतवल्शा वि रोह ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य:। ते । मद: । अवऽकेश: । विऽकेश: । येन । अभिऽहस्यम् । पुरुषम् । कृणोषि । आरात् । त्वत् । अन्या । वनानि । वृक्षि । त्वम् । शमि । शतऽवल्शा । वि । रोह ॥३०.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 30; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (शमि) हे शान्ति करनेवाली [सरस्वती !] (यः) जो (ते) तेरा (मदः) आनन्द (अवकेशः) शुद्ध प्रकाशवाला और (विकेशः) विविध प्रकाशवाला है, (येन) जिससे (पुरुषम्) पुरुष को (अभिहस्यम्) बड़ा खिलने योग्य (कृणोषि) तू करती है। (त्वत्) तुझ से (अन्या) भिन्न [अविद्यारूप] (वनानि) माँगने के कर्मों को (आरात्) दूर (वृक्षि) मैंने छोड़ दिया है। (त्वम्) तू (शतवल्शा) सैकड़ों अङ्कुर वा शाखावाली होकर (वि) विविध प्रकार से (रोह) प्रकट हो ॥२॥

    भावार्थ - योगी जन विद्या की प्राप्ति से अज्ञान को मिटा कर “ऋतम्भरा” बुद्धि द्वारा अनेक सुख पाते हैं ॥२॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    O Shami, exhilarating is your juice which gives a man long loose hanging and dishevelled hair by which you make the man smile with pleasure. I remove the plants growing close around so that you grow luxuriant with a hundred branches.


    Bhashya Acknowledgment
    Top