अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 36/ मन्त्र 3
अ॒ग्निः परे॑षु॒ धाम॑सु॒ कामो॑ भू॒तस्य॒ भव्य॑स्य। स॒म्राडेको॒ वि रा॑जति ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒ग्नि: । परे॑षु । धाम॑ऽसु । काम॑: ।भूतस्य॑ । भव्य॑स्य । स॒म्ऽराट् । एक॑: । वि । रा॒ज॒ति॒ ॥३६.३॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्निः परेषु धामसु कामो भूतस्य भव्यस्य। सम्राडेको वि राजति ॥
स्वर रहित पद पाठअग्नि: । परेषु । धामऽसु । काम: ।भूतस्य । भव्यस्य । सम्ऽराट् । एक: । वि । राजति ॥३६.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ईश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(कामः) कामना के योग्य, (एकः) एक (सम्राट्) राजाधिराज (अग्निः) सर्वव्यापक परमात्मा (भूतस्य) बीते हुए और (भव्यस्य) होनहार काल के (परेषु) दूर-दूर (धामसु) धामों में (वि) विविध प्रकार (राजति) राज करता है ॥३॥
भावार्थ
हे मनुष्यो ! उस परमात्मा की उपासना करके अपनी उन्नति करो, जो अकेला ही इस सब संसार का स्वामी है ॥३॥
टिप्पणी
३−(अग्निः) सर्वव्यापकः परमेश्वरः (परेषु) दूरेषु (धामसु) स्थानेषु (कामः) कमु कान्तौ−घञ्। कमनीयः (भूतस्य) अतीतस्य (भव्यस्य) भविष्यतः कालस्य (सम्राट्) राजाधिराज (एकः) अद्वितीयः (वि) विविधम् (राजति) ईष्टे ॥
विषय
एक: सम्राट
पदार्थ
१. (अग्नि:) = वे अग्रणी प्रभु ही (परेषु धामसु) = उत्कृष्ट तेजों में स्थित हैं अथवा दुर-से-दूर स्थानों में व्याप्त हैं। वे ही (भूतस्य) = उत्पन्न जगतों के और (भव्यस्य) = उत्पस्यमान [उत्पन्न होनेवाले] लोगों के (काम:) = कामयिता हैं-'काम संकल्प' द्वारा जन्म देनेवाले हैं। २. वे (सम्राट्) = सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के शासक हैं, (एक:) = अद्वितीय हैं और (विराजति) = विशेषण दीप्यमान हैं।
भावार्थ
वे प्रभु दर-से-दूर स्थानों में भी व्याप्त हैं। उत्पन्न और उत्पत्स्यमान जगतों को काम-संकल्प द्वारा जन्म देनेवाले हैं। वे अद्वितीय सम्राट हैं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का शासन कर रहे|
भाषार्थ
(भूतस्य) भूतकाल के (भव्यस्य) और भविष्यत् काल के प्राणिजगत् का (कामः) काम्य अर्थात् प्रापणीय (अग्निः) सर्वाग्रणी परमेश्वर (परेषु) दूर-दूर के (धामसु) स्थानों में (विराजति) विराजमान है, ( एक:) वह अकेला (सम्राट) विश्व का सम्राट् है।
टिप्पणी
[परमेश्वर काम्य है, यथा "सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम्" (यजु० ३२।१३); वह इन्द्र अर्थात् जीवात्मा का प्रिय है, और सउको कामना का विषय है, प्रापणीय है। अथर्ववेद के अनुसार स्कम्भ-परमेश्वर जड़ जगत् का भी काम्य है-यह कवि शैली के अनुसार कहा है। यथा– (अथर्व० १०।७।४-६), "क्व प्रेप्सन् दीप्यत ऊर्ध्वो अग्निः" आदि।
विषय
ईश्वर की प्रार्थना
भावार्थ
(प्र०) ‘अग्निः प्रियेषु’ इति यजु०।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
स्वस्त्ययनकाम अथर्वा ऋषिः। अग्निर्देवता। गायत्रं छन्दः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Sole Spirit of Life
Meaning
Agni, the love, the lover and giver of fulfilment for and of all that is past and present and that which is yet to be, self-refulgent presence, rules over all and pervades even the farthest borders of the expansive universe, the sole lord, one, unique, matchless, without a second presence such as Agni Itself.
Translation
The adorable Lord, the desire of all the beings and would-be beings, shines in distant abodes as the only sovereign ruler.
Translation
The Self-refulgent God is the Lord of unfettered power (kam:) and is pervading even the most distant regions. He as the sole Imperial Lord gleams with His natural effulgence and ordain whatever exists and whatever is to come to exist.
Translation
God is the Fulfiller of the desires of men created in the past and yet to be created in future. He like a sole Imperial Lord rules over distant worlds.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(अग्निः) सर्वव्यापकः परमेश्वरः (परेषु) दूरेषु (धामसु) स्थानेषु (कामः) कमु कान्तौ−घञ्। कमनीयः (भूतस्य) अतीतस्य (भव्यस्य) भविष्यतः कालस्य (सम्राट्) राजाधिराज (एकः) अद्वितीयः (वि) विविधम् (राजति) ईष्टे ॥
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