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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 37 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 37/ मन्त्र 3
    ऋषिः - अथर्वा देवता - चन्द्रमाः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शापनाशन सूक्त
    56

    यो नः॒ शपा॒दश॑पतः॒ शप॑तो॒ यश्च॑ नः॒ शपा॑त्। शुने॒ पेष्ट्र॑मि॒वाव॑क्षामं॒ तं प्रत्य॑स्यामि मृ॒त्यवे॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । न॒: । शपा॑त् । अश॑पत: । शप॑त: ।य: । च॒ । न॒: । शपा॑त् । शुने॑ । पेष्ट्र॑म्ऽइव । अव॑ऽक्षामम् । तम् । प्रति॑ । अ॒स्या॒मि॒ । मृ॒त्यवे॑ ॥३७.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यो नः शपादशपतः शपतो यश्च नः शपात्। शुने पेष्ट्रमिवावक्षामं तं प्रत्यस्यामि मृत्यवे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । न: । शपात् । अशपत: । शपत: ।य: । च । न: । शपात् । शुने । पेष्ट्रम्ऽइव । अवऽक्षामम् । तम् । प्रति । अस्यामि । मृत्यवे ॥३७.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 37; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    कुवचन के त्याग का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) जो (अशपतः) न शाप देनेवाले (नः) हम लोगों को (शपात्) शाप देवे, (च) और (यः) जो (शपतः) शाप देनेवाले (नः) हम लोगों को (शपात्) शाप देवे। (अवक्षामम् तम्) उस निर्बल को (मृत्यवे) मृत्यु के सामने (प्रति अस्यामि) मैं फैंके देता हूँ (इव) जैसे (पेष्ट्रम्) रोटी का टुकड़ा (शुने) कुत्ते के सामने ॥३॥

    भावार्थ

    जो अधर्मी धर्म्मात्माओं में दोष लगावें राजा उसको यथोचित दण्ड देवे ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(यः) कुभाषणशीलः (नः) अस्मान् (शपात्) शपेत्। पुरुषं भाषयेत् (अशपतः) अशापितः (शपतः) शापकारिणः (यः) (च) (नः) (शपात्) (शुने) कुक्कुराय (पेष्ट्रम्) सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्। उ० ४।१५९। इति पिष्लृ संचूर्णने−ष्ट्रन्। रोटिकाखण्डम् (इव) यथा (अवक्षामम्) क्षायो मः। पा० ८।२।५३। इति क्षै क्षये−निष्ठातकारस्य मः। अवक्षीणां दुर्बलम् (तम्) शप्तारम् (प्रति) प्रत्यक्षम् (अस्यामि) क्षिपामि (मृत्यवे) मरणाय ॥

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    विषय

    शुने पेष्ट्रम् इव अवक्षामम्

    पदार्थ

    १. समाज में कोई ऐसा व्यक्ति उपस्थित हो जाता है जो समाज के लिए हानिकर होता है। कई बार विवशता में समाज उसके लिए निन्दा का प्रस्ताव उपस्थित करता है। उस समय के लिए कहते हैं कि (यः) = जो (अशपत:) = किसी प्रकार के शाप का प्रयोग न करते हुए (न: शपात्) = हमें शाप देता है (च) = अथवा (य:) = जो (शपत:) = विवशता में निन्दा का प्रस्ताव करनेवाले (न:) = हमें (शपात्) = बुरा-भला कहता है, तो (शुने) = कुत्ते के लिए (अवक्षामम्) = सूखे (पेष्ट्रम्) = [piece] टुकड़ों की (इव) = भाँति (तम्) = उसे (मृत्यवे प्रत्यस्यामि) = मृत्यु के लिए फेंकता हैं, अर्थात् यह गाली देनेवाला व्यक्ति सारे समाज से दूषित किये जाने पर क्षीण होकर मृत्यु का शिकार हो जाता है।

    भावार्थ

    जो सारे समाज के लिए विद्वेष का कारण बनता है, यह समाज से निन्दित किया जाकर उदासीनता के कारण क्षीण होकर मृत्यु का ग्रास बन जाता है।

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    भाषार्थ

    (अशपतः) न शाप देते हुए ( नः) हमें (यः) जो (शपात्) शाप दे, (च) और (यः) जो प्रतिक्रियारूप में (शपतः) शाप देते हुए (नः) हमें (शपात्) पुनः शाप दे, (तम् ) उसे (मृत्यवे) मृत्यु के लिए (प्रति अस्यामि ) में फेंक देता हूं, (इव) जैसे (क्षामम्) सूखी (पेष्ट्रम्) पीठी को ( अव) नीचे भूमि पर (शुने) कुत्ते के लिए फेंक दिया जाता है ।

    टिप्पणी

    [परमेश्वर का भक्त परमेश्वर को कहता है कि हम शाप देने की दुष्प्रवृत्ति से रहित हैं, परन्तु मानुष दुर्बलता के कारण शाप देने वाले को यदि हम प्रतिक्रिया रूप में शाप दे देते हैं, और इस हमारी प्रतिक्रिया में शाप देने वाला पुनः हमें शाप देता है तो हम प्रतिक्रिया में उसे पुनः शाप न देकर तेरे प्रति फेंक देते हैं, तू ही मृत्युरूप हुआ उसे यथोचित दण्ड दे। वह हमारे लिये, कुत्ते के लिये फेंकी सूखी पीठी के सदृश है । शुने और मृत्यवे यह हीनोपमा है। 'शप्ता और क्षाम-पेष्ट्र" यह यथार्थ उपमा है] मानुष दुर्बलता यथा (अथर्व० ७।१११।१); तथा (अथर्व० ६।४५।२, ६।९६।३) । अव =अवस्तात् भूमौ; यथा "शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम्। वायसानां कृमीनां च शनकैनिर्वपेद् भुवि ।। मनु० ।।

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    विषय

    कठोर भाषण से बचना

    भावार्थ

    (नः) हममें से (यः) जो (अशपतः) गाली या कठोर वचन न कहते हुओं के प्रति (शपात्) कठोर वचन कहता है या (यः च) जो (शपतः नः) कठोर वचन कहते हुओं के भी प्रति (शपात्) कठोर वचन कहता है (तं) उस पुरुष को (शुनः) कुत्ते की (अवक्षामम्) सूखी (पेष्टू इब) रोटी के समान (मृत्यवे) मौत के आगे (प्रत्यस्यामि) डाल दूं। कठोर वचन या गाली देते हुए पुरुष के प्रति मनुष्य अपनी प्रबल इच्छा-शक्ति का इसी प्रकार प्रयोग करे और विचारे कि कठोर वक्ता के कठोर वचन स्वयं उसी को दण्ड देते हैं उसके दिल को कष्ट पहुँचाते हैं हम पर उसका प्रभाव न पड़े जैसे कि आग का पानी के तालाब पर नहीं पड़ता। वह अपने कठोर वचनों से बिजली से मरे वृक्ष के समान भीतर भीतर जलता रहता है और जो व्यर्थ हम पर जले और बके या उसे समझाने के लिए हमारे कुछ कठोर कहने पर पागल होकर हम पर बके झके तो उसको तुच्छ सा जानकर अपनी मौत मरने देना चाहिए स्वयं उस पर हाथ न चलाना चाहिए।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    स्वस्त्ययनकामोऽथर्वा ऋषिः। चन्द्रमा देवता। अनुष्टुप्। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    No Course Please

    Meaning

    Whoever curses us who do not curse anybody, and whoever curses us even though we too may revile the curse, we throw off that insufferable curse unto death, i.e., to naught, as we throw a piece of bone to a dog.

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    Translation

    Whoever curses us while we do not curse and who curses us while we curse him, the base one, I throw to death like a bone to a dog.

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    Translation

    Like one who throws the loaf of bread to dog I throw to death that frustrated man who plans evil designs against us who ate innocent to any ill-will against anyone and who bears ill-will against us who are conscious to throw away evils.

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    Translation

    Who curses us, without being cursed, or, cursed, who curses us again, I cast him, a poor fellow, to Death, as to a dog one throws a piece of bread.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(यः) कुभाषणशीलः (नः) अस्मान् (शपात्) शपेत्। पुरुषं भाषयेत् (अशपतः) अशापितः (शपतः) शापकारिणः (यः) (च) (नः) (शपात्) (शुने) कुक्कुराय (पेष्ट्रम्) सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्। उ० ४।१५९। इति पिष्लृ संचूर्णने−ष्ट्रन्। रोटिकाखण्डम् (इव) यथा (अवक्षामम्) क्षायो मः। पा० ८।२।५३। इति क्षै क्षये−निष्ठातकारस्य मः। अवक्षीणां दुर्बलम् (तम्) शप्तारम् (प्रति) प्रत्यक्षम् (अस्यामि) क्षिपामि (मृत्यवे) मरणाय ॥

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