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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 46 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 46/ मन्त्र 3
    ऋषिः - यम देवता - दुःष्वप्ननाशनम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - दुःष्वप्ननाशन
    54

    यथा॑ क॒लां यथा॑ श॒फं यथ॒र्णं सं॒नय॑न्ति। ए॒वा दुः॒ष्वप्न्यं॒ सर्वं॑ द्विष॒ते सं न॑यामसि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यथा॑ । क॒लाम् । यथा॑ । श॒फम् । यथा॑ । ऋ॒णम् । स॒म्ऽनय॑न्ति । ए॒व । दु॒:ऽस्वप्न्य॑म् । सर्व॑म् । द्वि॒ष॒ते । न॒या॒म॒सि॒ ॥४६.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यथा कलां यथा शफं यथर्णं संनयन्ति। एवा दुःष्वप्न्यं सर्वं द्विषते सं नयामसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यथा । कलाम् । यथा । शफम् । यथा । ऋणम् । सम्ऽनयन्ति । एव । दु:ऽस्वप्न्यम् । सर्वम् । द्विषते । नयामसि ॥४६.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 46; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    स्वप्न के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (यथा यथा) जैसे जैसे (कलाम्) सोलहवाँ अंश और (यथा) जैसे (शफम्) आठवाँ अंश [देकर] (ऋणम्) ऋण को (संनयन्ति) लोग चुकाते हैं। (एव) वैसे ही (सर्वम्) सब (दुःस्वप्न्यम्) नींद में उठे बुरे विचार को (द्विषते) वैरी के लिये (सम् नयामसि) हम यथावत् छोड़ते हैं ॥३॥

    भावार्थ

    जैसे मनुष्य अपने आय का सोलहवाँ वा आठवाँ अंश देकर ऋण चुकाते हैं, वैसे ही स्वप्न के कुविचारों को वैरी पर छोड़ते हैं ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(यथा यथा) येनैव प्रकारेण (कलाम्) आयस्य षोडशांशम् (शफम्) गवादिपादचतुष्टयस्य द्विखुरत्वाद् एकस्य खुरस्याष्टमांशग्रहणम्। अष्टमांशम् (ऋणम्) पुनर्देयत्वेन गृहीतं धनम् (संनयन्ति) सम्प्रदानेन गमयन्ति (एव) एवम् (दुःस्वप्न्यम्) कुनिद्राभवं विचारम् (सर्वम्) (द्विषते) द्वेष्ट्रे जनाय (सम्) सम्यक् (नयामसि) प्रापयामः ॥

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    विषय

    यथा कला तथा शफम्

    पदार्थ

    १. (यथा) = जैसे (कलाम्) = एक-एक कला करके-सोलहवाँ भाग करके (यथा शफम्) = जैसे आठवाँ भाग करके (यथा ऋणम्) = जैसे सारे ऋण को (संनयन्ति) = चुका देते हैं, (एव) = इसीप्रकार (सर्व दुःवयम्) = दुःस्वप्नजनित सब भय को (द्विषते) = देष करनेवाले मनुष्य के लिए (संनयामसि) = प्राप्त कराते हैं। हमारे शत्रु ही दु:ष्वप्नों को प्राप्त करें।

    भावार्थ

    जैसे थोड़ा-थोड़ा करके सारा ऋण उतर जाता है, उसी प्रकार हम गाढ़निद्रा का अभ्यास करके स्वप्नों को शत्रुओं के पास भेज देते हैं।

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    भाषार्थ

    (यथा) जिस प्रकार (कलाम्) [कृष्णपक्ष की] चान्द्रकला को [एक-एक करके सूर्यरश्मियां] आमावस्या में (सं नयन्ति) ले जाती हैं, लीन कर देती हैं (यथा) जिस प्रकार [लोहकार] (शफम्) अश्व और बैल के खुर को लोहे की खुरी लगाने के लिए (सं नयन्ति) तरासते तथा छील कर अपगत करते हैं, (यथा) जिस प्रकार ऋणी पुरुष (ऋणम्) ऋण की राशि को शनैः शनैः (संनयन्ति) सम्प्रदान द्वारा समीकृत करते हैं, (एवा) इसी प्रकार (सर्व दुष्वप्न्यम्) सव दुःस्वप्न और उसके दुष्परिणामों को (द्विषते) अप्रियपक्ष के लिये (संनयामसि) परस्पर मिलकर हम प्राप्त करते जाते हैं ।

    टिप्पणी

    [द्विषते = द्विष अप्रीतौ (अदादिः), अर्थात् सात्विक स्वप्नों के द्वारा, दुस्वप्नों के साथ हम प्रेम करना त्यागते जाते हैं, उन्हें द्वेषपक्ष में प्राप्त करते जाते हैं]।

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    विषय

    स्वप्न का रहस्य।

    भावार्थ

    (यथा) जैसे (कलां) कला,१\१६ वां भाग कर के या (यथा शफम्) १\८ वां भाग करके (यथा ऋण) जिस प्रकार ऋण को (सं नयन्ति) चुका देते हैं। उसी प्रकार (सर्वं दुःष्वय्न्यम्) समस्त प्रकार के दुःस्वप्नों को (द्विषते) अपने अप्रीतिभाजन पुरुष का ऋण सा जानकर (सं नयामसि) सर्वथा त्याग दें। अर्थात् दुःस्वप्न आदि के दुर्विचार नीच घृणित पुरुषों के लिए रहने दें। उनमें सदाचारी आर्यपुरुष अपने को न गिरावें। अर्थात् जिस प्रकार कला = १६ वां सोलहवां हिस्सा करके या एक आठवां एक आठवां हिस्सा करते करते पूरा ऋण चुका देते हैं इस प्रकार हम बुरे विचारों को भी (द्विषते) शत्रु का ऋण सा ही मानकर, शनैः शनैः क्रमशः उनको ऐसे छोड़ते जायं मानो हम में बुरे भावरूप अपने शत्रु का कर्जा धारते हैं। उसे शीघ्र चुकाकर मुक्त हो जायें।

    टिप्पणी

    (च०) ‘आप्तय सं नया’ इति ऋ०। ‘अनेहसोऽवदूतयः सु ऊतयो व ऊतयः’ इति ऋग्वेदेऽधिकः पाठः। तत्र त्रित आप्त्य ऋषिः। आदित्या उषाश्व देवते।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अंगिरा ऋषिः। स्वप्नो दुःस्वप्ननाशनं वा देवता। १ ककुम्मती विष्टारपंक्तिः, २ त्र्यवसाना शक्वरीगर्भा पञ्चपदा जगती। ३ अनुष्टुप्। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Dream

    Meaning

    Just as people pay one sixteenth or one eighth of the principal and get free of the loan, so do we pay back for the dream: take back the evil ones and let these be share of the evil (we wish to get rid off).

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    Translation

    As a sixteenth (kala), as an eighth (Sapham), as a whole debt (yathamam), they bring together all evil-dreaming (duh-svapnam) for him who hates us. (Also Re. VIII.47.17)

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    Translation

    As men discharge a debt, as they pay up 1/8 and 1/16, so the whole evil dream do we pay and assign to jealousy or aversion which is our internal foe.

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    Translation

    As men discharge a debt, by paying one sixteenth or one eighth of their income, so all the evil thoughts of the dream do we pay and assign unto our foe.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(यथा यथा) येनैव प्रकारेण (कलाम्) आयस्य षोडशांशम् (शफम्) गवादिपादचतुष्टयस्य द्विखुरत्वाद् एकस्य खुरस्याष्टमांशग्रहणम्। अष्टमांशम् (ऋणम्) पुनर्देयत्वेन गृहीतं धनम् (संनयन्ति) सम्प्रदानेन गमयन्ति (एव) एवम् (दुःस्वप्न्यम्) कुनिद्राभवं विचारम् (सर्वम्) (द्विषते) द्वेष्ट्रे जनाय (सम्) सम्यक् (नयामसि) प्रापयामः ॥

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