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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 47 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 47/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अङ्गिरस् देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - दीर्घायुप्राप्ति सूक्त
    98

    अ॒ग्निः प्रा॑तःसव॒ने पा॑त्व॒स्मान्वै॑श्वान॒रो वि॑श्व॒कृद्वि॒श्वशं॑भूः। स नः॑ पाव॒को द्रवि॑णे दधा॒त्वायु॑ष्मन्तः स॒हभ॑क्षाः स्याम ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒ग्नि: । प्रा॒त॒:ऽस॒व॒ने । पा॒तु॒ । अ॒स्मान् । वै॒श्वा॒न॒र: । वि॒श्व॒ऽकृत् । वि॒श्वऽशं॑भू: । स: । न॒: । पा॒व॒क: । द्रवि॑णे । द॒धा॒तु॒ । आयु॑ष्मन्त: । स॒हऽभ॑क्षा: । स्या॒म॒ ॥४७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्निः प्रातःसवने पात्वस्मान्वैश्वानरो विश्वकृद्विश्वशंभूः। स नः पावको द्रविणे दधात्वायुष्मन्तः सहभक्षाः स्याम ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अग्नि: । प्रात:ऽसवने । पातु । अस्मान् । वैश्वानर: । विश्वऽकृत् । विश्वऽशंभू: । स: । न: । पावक: । द्रविणे । दधातु । आयुष्मन्त: । सहऽभक्षा: । स्याम ॥४७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 47; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    आत्मा की उन्नति का उपदेश।

    पदार्थ

    (वैश्वानरः) सब नरों का हितकारी, (विश्वकृत्) जगत् का बनानेवाला, (विश्वशंभूः) संसार को सुख पहुँचानेवाला (अग्निः) सर्वव्यापक परमेश्वर (प्रातःसवने) प्रातःकाल के यज्ञ में (अस्मान्) हमारी (पातु) रक्षा करे। (स) वह (पावकः) शुद्ध करनेवाला जगदीश्वर (नः) हमको (द्रविणे) धन के बीच (दधातु) रक्खे, (आयुष्मन्तः) उत्तम आयुवाले और (सहभक्षाः) साथ-साथ भोजन करनेवाले (स्याम) हम रहें ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमेश्वर के महा उपकारों को देखकर पुरुषार्थ करके धन प्राप्त करें और परस्पर सहायक होकर सुख भोगें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(अग्निः) सर्वव्यापकः परमेश्वरः (प्रातःसवने) प्रातःकालस्य यज्ञे (पातु) रक्षतु (अस्मान्) धार्मिकान् (वैश्वानरः) अ० १।१०।४। सर्वनरहितः (विश्वकृत्) सर्वस्य जगतः कर्ता (विश्वशंभूः) भू−क्विप्। सर्वस्मिन् जगति सुखस्य भावयिता (सः) परमेश्वरः (नः) अस्मान् (पावकः) शोधकः (द्रविणे) अ० २।२९।३। धने (दधातु) धरतु (आयुष्मन्तः) प्रशस्तेन जीवनेन युक्ताः (सहभक्षाः) सहभोजनाः (स्याम) भवेम ॥

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    विषय

    गायत्रं प्रात:सवनम्

    पदार्थ

    १. (अग्नि:) = अग्रणी प्रभु प्रातःसवने जीवन के (प्रात:सवने) = में-गायत्र-सवन में अस्मान् पातु-हमारा रक्षण करे। (वैश्वानरः) = सब मनुष्यों का हित करनेवाले, (विश्वकृत्) = सम्पूर्ण संसार का निर्माण करनेवाले, (विश्वशंभू:) = दुःख-शमन द्वारा सम्पूर्ण जगत् में शान्ति स्थापित करनेवाले (स:) = वे (पावकः) = पवित्र करनेवाले प्रभु (नः) = हमें (द्रविणे दधातु) = धन में धारण करें। २. इन धनों के द्वारा हम (आयुष्मन्तः) = दीर्घजीवनवाले व (सहभक्षाः स्याम) = मिलकर खानेवाले-मिलकर भोजन करनेवाले-अकेले न खानेवाले बनें।

    भावार्थ

    जीवन के प्रात:सवन में हम प्रभु को 'अग्नि व पावक', आगे ले-चलनेवाले व पवित्र करनेवाले के रूप में देखें। हम आगे बढ़ें, जीवन को पवित्र बनाएँ। हम सबका हित करनेवाले, निर्माणात्मक कर्मों में प्रवृत्त व शान्त बनें। धनों का सविनियोग करते हुए दीर्घजीवी व मिलकर भोजन करनेवाले बनें।

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    भाषार्थ

    (वैश्वानरः) सब नर-नारी रूप प्राणियों का हितकारी, (विश्वकृत्) विश्व का कर्ता, (विश्वशंभुः) समग्र जगत् में दुःख के शमन द्वारा सुखोत्पादक (अग्निः) सर्वाग्रणी, ज्ञानस्वरूप तथा पापदग्धा परमेश्वर (प्रातः सवने) ब्रह्मचर्य के २४ वर्ष पर्यन्त प्रातः सवन में (अस्मान्) हम ब्रह्मचारियों की (पातु) रक्षा करे। (सः) वह (पावकः) पवित्र करने वाला परमेश्वर (नः) हमें (द्रविणे) शारीरिक बल में, तथा वीर्य या प्राणरूपी धन में (दधातु) धारित-पोषित करे, (आयुष्मन्तः) ताकि हम दीर्घायु से सम्पन्न हुए (सहभक्षाः स्याम) ब्रह्मचर्याश्रम में परस्पर साथ मिल कर भोजन करने वाले हों।

    टिप्पणी

    [सायण भाष्य में मन्त्र का याज्ञिक अर्थ है। परन्तु ब्रह्मचर्य विषयक आधिभौतिक अर्थ निम्नलिखित प्रमाण के आधार पर किया गया है। यथा "पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विशति वर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीद सर्वं वासयन्ति॥१॥ अथ यानि चतुश्चत्वारिशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिन सवनं चतुश्चत्वारिशदक्षरा त्रिष्टुप् त्रैष्टुभं माध्यन्दिन सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीद सर्व रोदयन्ति॥३॥ अथ यान्यष्टाचत्वारिशद्वर्षाणि तत्तृतीयसवनमष्टाचत्वारिशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वावाऽऽदित्या एते हीद सर्वमाददते॥५॥ (छान्दोग्य ३।१६)। अर्थात् "पुरुषः" देह पुरि में शयन करने वाला जीवात्मा "यज्ञ" अर्थात् अतीव शुभ गुणों से संगत और सत्कर्तव्य है। इस का अवश्य है कि २४ वर्ष पर्यन्त जितेन्द्रिय अर्थात् ब्रह्मचारी रहकर वेदादि विद्या और सुशिक्षा का ग्रहण करे। तो उस के शरीर में प्राण बलवान् होकर सब शुभ गुणों के वास कराने वाले होते हैं॥१॥ मध्यम ब्रह्मचर्य यह है, जो मनुष्य ४४ वष पर्यन्त ब्रह्मचारी रह कर वेदाभ्यास करता है उस के प्राण, इन्द्रियां, अन्तः करण, और आत्मा बल मुक्त हो के सब दुष्टों को रुलाने और श्रेष्ठों का पालन करने हारे होते हैं ॥३॥ उत्तमब्रह्मचर्य ४८ वर्ष पर्यन्त का तीसरे का होता है। जो ४८ वर्ष पर्यन्त यथावत् ब्रह्मचर्य करता है उस के प्राण अनुकूल होकर सकल विद्याओं का ग्रहण करते हैं॥४॥ सत्यार्थप्रकाश, तृतीय समुल्लास, दयानन्द। अग्निः-अग्रणीर्भवति। त्रिभ्य आख्यातेभ्यो जायते-इति शाकपूणिः, इतात् अक्तात् दग्धाद्वा, नीतात् (निरुक्त ७।४।१४)। द्रविणम् धनं द्रविणमुच्यते यदेनदभिद्रवन्ति, बलं वा द्रविणं यदेनेनाभिद्रवन्ति (निरुक्त ८/१)

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Self-Protection

    Meaning

    May Agni, self-refulgent, universal guide, all creative, all-blissful divine Spirit of the universe, purify us at the morning session of yajna. May the fiery sanctifier establish us in wealth, honour and excellence of the world, and may we all together, living happy and healthy, enjoy the beauty of life.

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    Subject

    Agnih

    Translation

    May the adorable Lord, benefactor of all men, creator of all and bestower of peace and happiness on all, guard us at the morning sacrifice (pritah savana). May he, the purifier, place us ‘among riches. May we have long life enjoying food together. (Saha-bhaksal)

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    Translation

    May the All-inspiring, All-creating, All-blissful, Self-refulgent God guard us at the first meeting of the yajna. May All-purifying Lord endow us with riches and may we enjoy the life of eating food together.

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    Translation

    May God, the Lover of mankind, the Creator of the universe, the Bringer of peace and prosperity unto all, guard us in the first stage of our life. May He, the purifier of all, give us riches: may we have long life enjoying food together.

    Footnote

    First stage: The early period of Vasu Brahmcharya. Together: With our relatives and friends.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अग्निः) सर्वव्यापकः परमेश्वरः (प्रातःसवने) प्रातःकालस्य यज्ञे (पातु) रक्षतु (अस्मान्) धार्मिकान् (वैश्वानरः) अ० १।१०।४। सर्वनरहितः (विश्वकृत्) सर्वस्य जगतः कर्ता (विश्वशंभूः) भू−क्विप्। सर्वस्मिन् जगति सुखस्य भावयिता (सः) परमेश्वरः (नः) अस्मान् (पावकः) शोधकः (द्रविणे) अ० २।२९।३। धने (दधातु) धरतु (आयुष्मन्तः) प्रशस्तेन जीवनेन युक्ताः (सहभक्षाः) सहभोजनाः (स्याम) भवेम ॥

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