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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 53 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 53/ मन्त्र 1
    ऋषिः - बृहच्छुक्र देवता - द्यौः, पृथिवी, शुक्रः, सोमः, अग्निः, वायुः, सविता छन्दः - जगती सूक्तम् - सर्वतोरक्षण सूक्त
    64

    द्यौश्च॑ म इ॒दं पृ॑थि॒वी च॒ प्रचे॑तसौ शु॒क्रो बृ॒हन्दक्षि॑णया पिपर्तु। अनु॑ स्व॒धा चि॑कितां॒ सोमो॑ अ॒ग्निर्वा॒युर्नः॑ पातु सवि॒ता भग॑श्च ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    द्यौ: । च॒ । मे॒ । इ॒दम् । पृ॒थि॒वी । च॒ । प्रऽचे॑तसौ । शु॒क्र: । बृ॒हन् । दक्षि॑णया । पि॒प॒र्तु॒ । अनु॑ । स्व॒धा । चि॒कि॒ता॒म् । सोम॑: । अ॒ग्नि: । वा॒यु: । न॒: । पा॒तु॒ । स॒वि॒ता । भग॑: । च॒ ॥५३.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    द्यौश्च म इदं पृथिवी च प्रचेतसौ शुक्रो बृहन्दक्षिणया पिपर्तु। अनु स्वधा चिकितां सोमो अग्निर्वायुर्नः पातु सविता भगश्च ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    द्यौ: । च । मे । इदम् । पृथिवी । च । प्रऽचेतसौ । शुक्र: । बृहन् । दक्षिणया । पिपर्तु । अनु । स्वधा । चिकिताम् । सोम: । अग्नि: । वायु: । न: । पातु । सविता । भग: । च ॥५३.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 53; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    स्वास्थ्य की रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (प्रचेतसौ) उत्तम ज्ञान देनेवाले (द्यौः) आकाश (च) और (पृथिवी) पृथिवी (च) और (बृहन्) बड़ा (शुक्रः) प्रकाशमान सूर्य (मे) मेरे लिये (इदम्) इस घर को (दक्षिणया) दक्षिणा [दान वा प्रतिष्ठा] से (पिपर्तु) भरपूर करे। (सोमः) चन्द्रमा और (अग्निः) अग्नि (अनु) अनुग्रह करके (स्वधा) अन्न को (चिकिताम्) जतावे, (वायुः) वायु (च) और (सविता) सबका उत्पन्न करने हारा (भगः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (नः) हमारी (पातु) रक्षा करे ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वररचित पदार्थों से यथावत् उपकार लेकर सदा सुखी रहें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(द्यौः) आकाशः (च च) समुच्चये (मे) मह्यम् (इदम्) पुरोवर्ति गृहम् (पृथिवी) (च) (प्रचेतसौ) प्रचेतः प्रज्ञानं याभ्यां सकाशात् ते। प्रकृष्टज्ञानदात्र्यौ (शुक्रः) शोचमानो दीप्यमानः सूर्य्यः (बृहन्) महान् (दक्षिणया) अ० ५।७।१। दानेन। प्रतिष्ठया (पिपर्तु) प्रपूरयतु (अनु) अनुग्रहेण (स्वधा) अन्नम् (चिकिताम्) कित ज्ञाने−अन्तर्गतण्यर्थः। ज्ञापयतु (अग्निः) पावकः (वायुः) पवनः (नः) अस्मान् (पातु) रक्षतु (सविता) सर्वोत्पादकः (भगः) भगमैश्वर्यं यस्य सः। भगवान् परमेश्वरः (च) ॥

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    विषय

    जीवन को उत्तम बनानेवाली दस बातें

    पदार्थ

    १. (द्यौः च पृथिवी च) = युलोक व पृथिवीलोक (मे) = मेरे लिए (इदम्) = इस अभिलषित फल को दें। मेरा मस्तिष्करूप धुलोक व शरीररूप पृथिवीलोक दोनों ही क्रमश: दीप्त व दृढ़ हों। इसप्रकार ये मुझे इष्ट जीवन प्रास कराएँ। ये मेरे लिए (प्रचेतसौ) = प्रकृष्टज्ञान का साधन बनें। २. (बृहत्) = वृद्धि का कारणभूत (शुक्र:) = वीर्य (दक्षिणया) = दान की वृत्ति के साथ (पिपर्तु) = मेरा पालन व पूरण करे । ब्रह्मचर्याश्रम में मैं मस्तिष्क व शरीर का उत्तम विकास करता हुआ ज्ञानी बनूं तो गृहस्थ में वीर्य को नष्ट न करता हुआ दान की वृत्तिवाला बनूं। ३. अब वानप्रस्थ में (स्वधा) = आत्मतत्त्व का धारण (सोमः) = सौम्यता व (अग्निः) = आगे बढ़ने की भावना (अनु चिकिताम्) = अनुकूल ज्ञान को देनेवाली हों। ४. अन्त में (वायुः) = [वा गतौ] निरन्तर क्रियाशीलता (सविता) = सूर्य की भौति प्रकाश व प्रेरणा प्राप्त करना (च) = और (भग:) = [भज सेवयाम्] प्रभु-उपासन (नाः पातु) = हमारा रक्षण करे।

    भावार्थ

    ब्रह्मचर्याश्रम में हम मस्तिष्क व शरीर का विकास करें। गृहस्थ में वीर्य का रक्षण करते हुए दान की वृत्तिवाले बनें । वानप्रस्थ में आत्मतत्व की धारणा, सौम्यता व आगे बढ़ने की भावनावाले हों। अन्त में निरन्तर क्रियाशील, प्रकाशदायी, उपासनामय जीवनवाले हों।

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    भाषार्थ

    (प्रचेतसौ) प्रकृष्ट चेतना देने वाले (द्यौ: च पृथिवी च) द्युलोक और पृथिवी लोक (मे) मुझे (इदम्) यह [प्रचैतन्य] प्रदान करें, (बृहन् शुक्रः) बड़ा सूर्य (दक्षिणया) वृद्धि द्वारा (पिपर्तु) मेरा पालन करें; (स्वधा) अन्न (अनु चिकिताम्) निरन्तर ज्ञानप्रद हो, ( सोमः, अग्निः, वायुः, सविता, च भगः) चन्द्रमा, अग्नि, वायु, सविता और उदीयमान सूर्य, [इन में से प्रत्येक] (नः पातु) हमारी रक्षा करे।

    टिप्पणी

    [दक्षिणया दक्ष वृद्धौ (भ्वादिः) स्वधा अन्ननाम (निघं० २।७), सात्विक अन्न ज्ञानप्रद होता है, राजस चञ्चलताप्रद और तामस शारीरिक बलप्रद। शुक्र: =प्रदीप्त सूर्य; सविता =प्रत्यग्र उदित सूर्यः भगः= अनुदित परन्तु उदीयमान सूर्य (निरुक्त)। परमेश्वर से प्रार्थना की गई है कि ये सब हमारा पालन करें]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Health Protection by Nature

    Meaning

    May heaven and earth, both inspiring stimulants of knowledge and awareness, both father and mother, source givers of knowledge, the sun and vital living energy, and the expansive space, all bless me with their gifts of life. May Soma, the moon and the blessed peace of nature, Agni, life energy, omniscient God and the brilliant teacher, Vayu, cosmic wind and pranic energy, Savita, lord creator, and Bhaga, lord giver of the glory of life, protect and promote me and lead me to knowledge and all round awareness in accordance with their nature and potential in response to my receptivity. (This mantra obviously is a prayer for natural and divine protection during this life, but there are certain words which suggest that it is a prayer, for life and efficiency during the next life too. The words are ‘dyau, prthivi’: Prthivi is mother and dyau is father according to Taittiriya Brahmana 2, 7, 16, 3. Another word is ‘Shukra’ which means the seed of life as in Yajurveda 21, 34 and 6, 27, and in Rgveda 3, 6, 3.)

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    Subject

    Earth and others as in the verses

    Translation

    May favourably inclined heaven. and earth, and the great " bright one (the sun) sustain all this of mine with liberal gift May the lord blissful and adorable favour me with provisions. May the omnipresent (vayu), the impeller and bestower of fortunes protect us.

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    Translation

    Let, in my re-incarnation after death, father and mother celebrated with scholarship protect my this body, the mighty energy of the world guard my body with its operative force, let matter which is the material cause of the universe keep us in its fold under the ordinance and governance of God and let moon, fire, air, and sun and morning light be protecting force to save us.

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    Translation

    May father and mother, like Heaven and Earth, wise pair, protect this body of mine. May lofty God, nourish me with His power of knowledge and action. May my mental faculty accept the knowledge granted by God and act according to it. May God, the Creator, Omniscient, All-pervading, the Urger, Dignified always rear us.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(द्यौः) आकाशः (च च) समुच्चये (मे) मह्यम् (इदम्) पुरोवर्ति गृहम् (पृथिवी) (च) (प्रचेतसौ) प्रचेतः प्रज्ञानं याभ्यां सकाशात् ते। प्रकृष्टज्ञानदात्र्यौ (शुक्रः) शोचमानो दीप्यमानः सूर्य्यः (बृहन्) महान् (दक्षिणया) अ० ५।७।१। दानेन। प्रतिष्ठया (पिपर्तु) प्रपूरयतु (अनु) अनुग्रहेण (स्वधा) अन्नम् (चिकिताम्) कित ज्ञाने−अन्तर्गतण्यर्थः। ज्ञापयतु (अग्निः) पावकः (वायुः) पवनः (नः) अस्मान् (पातु) रक्षतु (सविता) सर्वोत्पादकः (भगः) भगमैश्वर्यं यस्य सः। भगवान् परमेश्वरः (च) ॥

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