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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 54 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 54/ मन्त्र 2
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - अग्नीषोमौ छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अमित्रदम्भन सूक्त
    47

    अ॒स्मै क्ष॒त्रम॑ग्नीषोमाव॒स्मै धा॑रयतं र॒यिम्। इ॒मं रा॒ष्ट्रस्या॑भीव॒र्गे कृ॑णु॒तं यु॒ज उत्त॑रम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्मै । क्ष॒त्रम् । अ॒ग्नी॒षो॒मौ॒ । अ॒स्मै । धा॒र॒य॒त॒म् । र॒यिम् । इ॒मम् । रा॒ष्ट्रस्य॑ । अ॒भि॒ऽव॒र्गे । कृ॒णु॒तम् । यु॒जे। उत्ऽत॑रम् ॥५४.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्मै क्षत्रमग्नीषोमावस्मै धारयतं रयिम्। इमं राष्ट्रस्याभीवर्गे कृणुतं युज उत्तरम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अस्मै । क्षत्रम् । अग्नीषोमौ । अस्मै । धारयतम् । रयिम् । इमम् । राष्ट्रस्य । अभिऽवर्गे । कृणुतम् । युजे। उत्ऽतरम् ॥५४.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 54; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राज्य की रक्षा के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (अग्नीषोमौ) हे सूर्य और चन्द्रमा ! तुम दोनों (अस्मै) इस पुरुष के लिये (क्षत्रम्) राज्य को और (अस्मै) इसके लिये (रयिम्) सम्पत्ति को (धारयतम्) दृढ़ करो। (इमम्) इस पुरुष को (राष्ट्रस्य) राज्य के (अभीवर्गे) मण्डल में (युजे) मित्र वर्ग के लिये (उत्तरम्) अधिक ऊँचा (कृणुतम्) करो ॥२॥

    भावार्थ

    जैसे सूर्य-चन्द्रमा नियमबद्ध होकर परस्पर आकर्षण आदि से जगत् का उपकार करते हैं, वैसे ही मनुष्य सब से प्रीति करके अपना राज्य और धन बढ़ावे ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(अस्मै) पुरुषाय (क्षत्रम्) राष्ट्रम् (अग्नीषोमौ) सूर्यचन्द्रौ (अस्मै) (धारयतम्) दृढीकुरुतम् (रयिम्) वैभवम् (इमम्) पुरुषम् (राष्ट्रस्य) राज्यस्य (अभीवर्गे) अ० ३।५।२। राज्यमण्डले (कृणुतम्) कुरुतम् (युजे) मित्रवर्गहिताय (उत्तरम्) उच्चतरम् ॥

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    विषय

    अग्नीषोमौ

    पदार्थ

    १. जीवन में 'अग्नि और सोम', 'ज्योति व आप:' का समन्वय आवश्यक है। अग्नि 'अग्रता, प्रचण्डता, उत्साह, वीरता' आदि का प्रतीक है और सोम 'शान्ति व नम्रता' का। दोनों का मेल जीवन को सुन्दर बनाता है। केवल अग्नि' जला देगा और केवल 'सोम' ठण्डा ही कर देगा, अतः मन्त्र में कहा है कि हे (अग्नीषोमौ) = अग्नि व सोमतत्त्वो! (अस्मै) = इस साधक के लिए (क्षत्रम्) = बल को (धारयतम) = धारण करो। (अस्मै) = इसके लिए (रयिम्) = धन को धारण करो। २. (इमम) = इसे (राष्ट्रस्य) = राष्ट्र के (अभिवर्ग) = मण्डल [circuit, compass] में (उत्तरं कृणुतम्) = उत्कृष्ट स्थिति में करो। प्रभु कहते हैं कि मैं इसे (युजे) = उत्कृष्ट कर्मों में लगाता हूँ। अग्नि और सोम का समन्वय हमें मार्ग-भ्रष्ट नहीं होने देता।

    भावार्थ

    अग्नि और सोम [तीव्रता व नम्रता] का समन्वय होने पर हमें बल व ऐश्वर्य प्राप्त होता है। अग्नीषोमौ' का उपासक राष्ट्र में उन्नत स्थिति में होता है। प्रभु इसे उत्कृष्ट कर्मों में लगाये रखते हैं।

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    भाषार्थ

    (अग्नीषोमौ) हे अग्रणी प्रधानमन्त्रिन् ! तथा हे सेनाध्यक्ष ! (अस्मै) इस सम्राट् के लिये (क्षत्रम्) क्षात्रबल को, तथा (अस्मै) इसके लिये (रयिम्) धन को (धारयतम्) सम्पुष्ट करो। (राष्ट्रस्य) राष्ट्र की (अभीवर्गे) चारों ओर की परिधि में (इमम्) इसे (उत्तरम्) सर्वोत्कृष्ट (कृणुतम्) करो, एतदर्थ (युजे) मैं पुराहित इसे राष्ट्र की धुरा में युक्त१ करता हूं, जोतता हूं।

    टिप्पणी

    [अग्नि तो रयि द्वारा पुष्ट करेगा, और सोम क्षात्रबल द्वारा। अग्नि है अग्रणी: (निरुक्त ७॥४।१४), तथा सोम है सेनाध्यक्ष। (यजु० १७॥४०)। अग्नीषोमौ= उभयपद द्विवचन। वैदिक प्रथा]। [१. अथवा नियुक्त।]

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    विषय

    राजा की नियुक्ति और कर्तव्य।

    भावार्थ

    हे (अग्नि-सोमौ) अग्नि = सेनापति और सोम = पुरोहित ब्राह्मण गण (अस्मै) इसी राजा के उपयोग के लिये (रयिम्) अपने ज्ञान और बल को (धारयतम्) धारण करो और (इमम्) इस राजा को (राष्ट्रस्य अभीवर्गे) राष्ट्र की रक्षा के कार्य में (कृणुतम्) समर्थ करो और इसी प्रयोजन के लिए मैं राष्ट्र का पुरोहित उसको (उत्तरम्) अन्यों से उत्कृष्ट जान कर (युजे) इस पद पर नियुक्त करता हूँ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः। अग्नीषोमौ देवते। अनुष्टभः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Protection and Progress of Rashtra

    Meaning

    O sun and moon, spirit of light, fire and peace of life, bear, sustain and glorify the dominion for the ruler, bear and bring wealth, honour and excellence for this order, establish this ruler in the class of exceptional greats and this way I commit him to rise higher and higher.

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    Translation

    O Lord adorable and blissful, may you bestow authority and riches on this sacrificer. May you place him rightly higher among the prominent chiefs of the kingdom.

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    Translation

    O teacher and priest! make wealth for this king. Make him capable in the sphere of defense and make him attain high state.

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    Translation

    O Commander-in-chief and priest, confirm the princely power in him, grant him wealth, Make him competent for protecting his dominion. For the same purpose, I set him on this exalted position!

    Footnote

    "Him" refers to the ring, and “I” to the priest.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(अस्मै) पुरुषाय (क्षत्रम्) राष्ट्रम् (अग्नीषोमौ) सूर्यचन्द्रौ (अस्मै) (धारयतम्) दृढीकुरुतम् (रयिम्) वैभवम् (इमम्) पुरुषम् (राष्ट्रस्य) राज्यस्य (अभीवर्गे) अ० ३।५।२। राज्यमण्डले (कृणुतम्) कुरुतम् (युजे) मित्रवर्गहिताय (उत्तरम्) उच्चतरम् ॥

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