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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 64 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 64/ मन्त्र 3
    ऋषिः - अथर्वा देवता - विश्वे देवाः, मनः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - सांमनस्य सूक्त
    111

    स॑मा॒नी व॒ आकू॑तिः समा॒ना हृद॑यानि वः। स॑मा॒नम॑स्तु वो॒ मनो॒ यथा॑ वः॒ सुस॒हास॑ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒मा॒नी । व॒: । आऽकू॑ति: । स॒मा॒ना । हृद॑यानि । व॒: । स॒मा॒नम् । अ॒स्तु॒ । व: । मन॑: । यथा॑ । व॒: । सुऽस॑ह । अस॑ति॥६४.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    समानी । व: । आऽकूति: । समाना । हृदयानि । व: । समानम् । अस्तु । व: । मन: । यथा । व: । सुऽसह । असति॥६४.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 64; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    संगति के लाभ का उपदेश।

    पदार्थ

    (वः) तुम्हारा (आकूतिः) निश्चय, उत्साह, अथवा सङ्कल्प (समानी) एकसा और (वः) तुम्हारे (हृदयानि) हृदय [हार्दिक कर्म] (समाना) एक से होवें। (वः) तुम्हारा (मनः) मन [मनन कर्म] (समानम्) एकसा (अस्तु) होवे, (यथा) जिससे (वः) तुम्हारी (असति) गति (सुसह) बड़ा सहाय करनेवाली होवे ॥३॥

    भावार्थ

    मनुष्य धर्म के विचारों में प्रीतिपूर्वक एकमत होकर अपने सब काम समाज द्वारा सिद्ध करके सुख बढ़ावें ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(समानी) एकरूपा (वः) युष्माकम् (आकूतिः) अध्यवसाय उत्साह आप्तरीतिः संकल्पो वा (समाना) अविरुद्धानि (हृदयानि) हार्दिककर्माणि (वः) (समानम्) तुल्यम् (अस्तु) भवतु (वः) युष्माकम् (मनः) मननम्। सङ्कल्पविपकल्पात्मकेन्द्रियव्यापारः (यथा) येन प्रकारेण (वः) युष्माकम् (सुसह) अव्ययम्। सुष्ठु धर्मेण सह सहायिका भवतु (असति) अमेरतिः। उ० ४।५९। इति अस गतौ−अति। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तेर्लुक्। असतिः। गतिः ॥

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    विषय

    'आकृति, हृदय व मन' की समानता

    पदार्थ

    १. हे सांमनस्य की कामनावाले पुरुषो! (व:) = तुम्हारा (आकूति:) = संकल्प (समानी) = समान हो। (व:) = तुम्हारे (हृदयानि) = संकल्पजनक अन्त:करण (समाना) = एकरूप हों। २. (व:) = तुम्हारा (मनः) = सुख आदि का अनुभव करनेवाला मन (समानम् अस्तु) = एकरूप हो, (यथा) = जिससे (व:) = तुम्हारा (सुसह) = उत्तमता से मिलकर कार्यों का करना असति हो।

    भावार्थ

    तुम्हारे संकल्प, हृदय और मन एक हों, जिससे तुम मिलकर कार्यों को कर सको।

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    भाषार्थ

    (वः) तुम्हारा (आकूतिः) संकल्प (समानी) एकरूप हो, (वः) तुम्हारे (हृदयानि) हृदय (समाना= समानानि) एकरूप हों [हार्दिक भावनाएं एकरूप हों]। [हार्दिक भावनाएं एकरूप हों]। (वः) तुम्हारा (मनः) मनन (समानम्) एकरूप (अस्तु) हो, (यथा) जिस प्रकार से (वः) तुम्हारा (सु सह) उत्तम पारस्परिक मेल (असति) बना रहे। अथवा पारस्परिक सहायता बनी रहे।

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    विषय

    एकचित्त होने का उपदेश।

    भावार्थ

    हे पुरुषो ! (वः) आप लोगों की (आकूतिः) संकल्प, कामना भी (समानी) एक समान हो। और (वः) आप लोगों के (हृदयानि) हृदय भी (समाना) समान हों। (वः मनः) आप लोगों के मन (समानम्) समान (अस्तु) हों। (यथा) जिससे (वः) आप लोगों के सब कार्य (सह) एक साथ मिलकर (सु असति) उत्तम रूप से हुआ करें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। साम्मनस्यं देवता। १, २ अनुष्टुभौ। २ त्रिष्टुप्। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    United Social Order of Humanity

    Meaning

    Let your intention, resolution and destination be one and equal. Let your hearts be one in unison. Let your mind and understanding be one united so that you may be happy and advancing together to the one common goal.

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    Translation

    Let your determination be one and the same (common). Let your hearts be in harmony with each other. Let you minds be one and united, so that all goes well with you. (CE.Rg X.191.4)

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    Translation

    O ye mankind! let your object of life be one and the same, let your hearts be equal (in feeling) and let your minds be united together so that there may be an excellent common status of life for all.

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    Translation

    One and the same be your resolve, be all your hearts in harmony: one and the same be all your minds, so that all your enterprises may succeed happily.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(समानी) एकरूपा (वः) युष्माकम् (आकूतिः) अध्यवसाय उत्साह आप्तरीतिः संकल्पो वा (समाना) अविरुद्धानि (हृदयानि) हार्दिककर्माणि (वः) (समानम्) तुल्यम् (अस्तु) भवतु (वः) युष्माकम् (मनः) मननम्। सङ्कल्पविपकल्पात्मकेन्द्रियव्यापारः (यथा) येन प्रकारेण (वः) युष्माकम् (सुसह) अव्ययम्। सुष्ठु धर्मेण सह सहायिका भवतु (असति) अमेरतिः। उ० ४।५९। इति अस गतौ−अति। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तेर्लुक्। असतिः। गतिः ॥

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