अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 66 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 66/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - चन्द्रः, इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    पदार्थ -

    (शत्रुः) शत्रु (न) हम पर (अभिदासन्) चढ़ाई करता हुआ (निर्हस्तः) निहत्था (अस्तु) होवे, [और ये भी,] (ये) जो (सेनाभिः) अपनी सेनाओं के साथ (युधम्) युद्ध करने के लिये (अस्मान्) हम पर (आयन्ति) चले आते हैं। (इन्द्र) हे प्रतापी सेनापति इन्द्र ! [उन सब को] (महता) बड़े (वधेन) वध के साथ (समर्पय) मार गिरा, (एषाम्) इन सब का (अघहारः) दुःखदायी प्रधान (विविद्धः) आर-पार छिदकर (द्रातु) भाग जावे ॥१॥

    भावार्थ -

    चतुर सेनापति शत्रुओं और उनकी सेनाओं को अपनी सुशिक्षित सेना द्वारा हरा कर भगा देवे ॥१॥

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