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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 1
    ऋषिः - जमदग्नि देवता - कामात्मा छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - कामात्मा सूक्त
    180

    यथा॑ वृ॒क्षं लिबु॑जा सम॒न्तं प॑रिषस्व॒जे। ए॒वा परि॑ ष्वजस्व॒ मां यथा॒ मां का॒मिन्यसो॒ यथा॒ मन्नाप॑गा॒ असः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यथा॑ । वृ॒क्षम् । लिबु॑जा । स॒म॒न्तम् । प॒रि॒ऽस॒स्व॒जे। ए॒व । परि॑ । स्व॒ज॒स्व॒ । माम् । यथा॑ । माम् । का॒मिनी॑ । अस॑: । यथा॑ । मत् । न । अप॑ऽगा: । अस॑: ॥८.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यथा वृक्षं लिबुजा समन्तं परिषस्वजे। एवा परि ष्वजस्व मां यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यथा । वृक्षम् । लिबुजा । समन्तम् । परिऽसस्वजे। एव । परि । स्वजस्व । माम् । यथा । माम् । कामिनी । अस: । यथा । मत् । न । अपऽगा: । अस: ॥८.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 8; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    विद्या की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (यथा) जैसे (लिबुजा) बढ़ानेवाले आश्रय के साथ उत्पन्न होनेवाली, बेल (वृक्षम्) वृक्ष को (समन्तम्) सब ओर से (परिषस्वजे=परिष्वजते) लिपट जाती है। (एव) वैसे ही [हे विद्या] (माम्) मुझ से (परिष्वजस्व) तू लिपट जा, (यथा) जिस से तू (माम् कामिनी) मेरी कामना करनेवाली (असः) होवे, और (यथा) जिस से तू (मत्) मुझ से (अपगाः) विछुरनेवाली (न)(असः) होवे ॥१॥

    भावार्थ

    ब्रह्मचारी पूरा तपश्चरण करके विद्या को इस प्रकार प्राप्त करे, जिस से वह सदा स्मरण करके उससे उपकार लेता रहे ॥१॥ इस मन्त्र का (यथा माम्−मन्नापगा असः) यह भाग−अ० १।३४।५। और २।३०।१। में आया है ॥

    टिप्पणी

    १−(यथा) येन प्रकारेण (वृक्षम्) स्वीकरणीयं द्रुमम् (लिबुजा) पॄभिदिव्यधि०। उ० १।२३। इति लिप वृद्धौ−कु, पस्य बः। जनी प्रादुर्भावे−ड, टाप्। लिबुना वर्धकेन आश्रयेण सह जायते सा। लता, वल्ली। लिबुजा व्रततिर्भवति लीयते विभजन्तीति−निरु० ६।२८। (समन्तम्) सर्वतः (परिषस्वजे) ष्वञ्ज परिष्वङ्गे, लडर्थे लिट्। परिष्वजते। आश्लिष्यति (एव) तथा (परि स्वजस्व) आश्लिष्य (माम्) ब्रह्मचारिणम्। अन्यद् यथा−अ० १।३४।५। (यथा) यस्मात्कारणात् (माम्) (कामिनी) कामयमाना (असः) त्वं भवेः (यथा) (मत्) मत्तः (नः) निषेधे (अपगाः) अपगन्त्री। वियोगिनी (असः) ॥

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    विषय

    पति-पत्नी का प्रेम

    पदार्थ

    १. (यथा) = जिस प्रकार (लिबुजा) = बेल (वृक्षम्) = आश्रयभूतवृक्ष को (समन्तं परिषस्वजे) = चारों ओर से लिपट जाती है, (एव) = इसीप्रकार तु (मां परिष्वजस्व) = मेरा आलिङ्गन कर । २. तेरी सारी वृत्ति इसप्रकार की हो (यथा) = जिससे तू (माम्) = मुझे (कामिनी अस:) = चाहनेवाली हो, (यथा) = जिससे तू (मत्) = मुझसे (अप-गा:) = दूर जानेवाली (न अस:) = न हो।

    भावार्थ

    पत्नी लता के समान हो तो पुरुष उसके आश्रयभूतवृक्ष के समान। पत्नी पति को ही चाहे, उससे दूर होने का विचार भी न करे।

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    भाषार्थ

    (यथा) जिस प्रकार (लिबुजा) लता (समन्तम्) सब ओर से (वृक्षम् ) वृक्ष को (परिषस्वजे) आलिङ्गित करती है (एवा) इसी प्रकार (माम्) मुझ को (परिष्वजस्व) तू आलिङ्गित कर, (यथा) ताकि (माम्) मुझे (कामिनी) कामना वाली (असः) तू हो, (यथा) ताकि (मत् अपगाः) मुझ से अलग हो जाने वाली ( न असः) न हो ।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में "हे जाये" द्वारा पत्नी को सम्बोधित किया है (सायण)। रुष्ट हुई जाया को मनाने का वर्णन हुआ है]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Love

    Meaning

    Just as the creeper wholly clasps the tree, so you embrace me wholly around so that you may wholly be mine loving me and you never go away from me.

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    Subject

    Kama (Love) - Atman

    Translation

    As a creéper embraces a tree on all its sides, so do embrace me, so that you may be desirous of me, so that you may never be deserting (going away from) me.

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    Translation

    Says husband to his wife—O wife! embrace me like the creeper which clasp around tree on all sides so that you may remain my darling and never be separated from me.

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    Translation

    Just as the creeper throws her arms on every side around the tree, so shouldst thou, O knowledge hold me in thine embrace, that thou mayst be in love with me, my darling, never to depart!

    Footnote

    See Atharva, 1-34-5 and 2-30-1.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(यथा) येन प्रकारेण (वृक्षम्) स्वीकरणीयं द्रुमम् (लिबुजा) पॄभिदिव्यधि०। उ० १।२३। इति लिप वृद्धौ−कु, पस्य बः। जनी प्रादुर्भावे−ड, टाप्। लिबुना वर्धकेन आश्रयेण सह जायते सा। लता, वल्ली। लिबुजा व्रततिर्भवति लीयते विभजन्तीति−निरु० ६।२८। (समन्तम्) सर्वतः (परिषस्वजे) ष्वञ्ज परिष्वङ्गे, लडर्थे लिट्। परिष्वजते। आश्लिष्यति (एव) तथा (परि स्वजस्व) आश्लिष्य (माम्) ब्रह्मचारिणम्। अन्यद् यथा−अ० १।३४।५। (यथा) यस्मात्कारणात् (माम्) (कामिनी) कामयमाना (असः) त्वं भवेः (यथा) (मत्) मत्तः (नः) निषेधे (अपगाः) अपगन्त्री। वियोगिनी (असः) ॥

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